रिव्यूज

वेब रिव्यू – सिनेमा की बदनाम गलियों की दास्तां सुनाती ‘तमिल रॉकर्स’

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Written by Tejas Poonia

तमिल रॉकर्स वेब सीरीज भारतीय फिल्‍म पायरेसी पर है। कहने को यह स्वीकार किया जा सकता है कि यह सीरीज सच्‍ची घटनाओं पर आधारित है। इस 19 अगस्‍त सोनी लिव ओटीटी पर रिलीज़ की गई सीरीज के पहले सीजन में कुल 8 एपिसोड हैं। और आठों सीजन बॉलीवुड लोचा टीम देख चुकी है तो आइए बतातें हैं कैसी है सीरीज।

‘हमारे हीरो हमारे भगवान मन्दिर में नहीं स्क्रीन पर आते हैं।’ और ‘सिनेमा में लॉजिक नहीं मैजिक चलता है।’ साथ ही ‘सिनेमा एक समय चक्र है।’ जिसमें ‘सिर्फ़ टैलेंट, मेहनत, प्रॉफिट, लॉस के बारे में नही बल्कि यह तो मुक़ाबला, लालच, जिंदगी और मौत का सवाल के बीच झूलता है।

सिनेमा समाज की जब तक कड़वी सच्चाई सामने लेकर आता रहा है। जब तब इसने हमारे सभी इमोशन को जिंदा किया है। लेकिन साथ ही जब तब यह काल्पनिक कहानियों के माध्यम से हमारे इमोशन के साथ खेलता भी रहा है तो जब तक उन काल्पनिक कहानियों में मसालों के छौंक लगाकर भी परोसता रहा है।

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‘तमिल रॉकर्स’ सिनेमा की उन बदनाम गलियों की कहानी कहती है जहां ‘तमिल रॉकर्स’ नाम की वेबसाइट फिल्मों को लगातार पाइरेट करती आ रही है। एक बड़ा गैंग इनका बना हुआ है जो देश के किसी कोने में बैठकर फिल्मों को रिलीज होते ही या कई बार रिलीज से पहले अपनी साइट पर रिलीज करके लाखों-करोड़ों विज्ञापनों आदि माध्यम से कमाई कर रहे हैं। लेकिन असल दुनियाँ में जब सिनेमा वाले इनसे परेशान हैं तो इस कदर उन्होंने उन्हीं के ऊपर उन्हीं के नाम से यह सीरीज बना डाली।

शायद यह चेताने के लिए की एक दिन वे जरूर पाइरेसी पर विजय प्राप्त कर लेंगे। सीरीज में एक तमिल फिल्म ‘गरुड़ा’ के रिलीज की तैयारियां अंतिम चरण में है और ऐसे में तमिल रॉकर्स इनके पीछे लगकर वह लीक करने पर उतारू है वो भी उनकी फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले। अब ऐसे में एक पुलिसकर्मी जिसे सिनेमा में खास दिलचस्पी नहीं लेकिन उसकी बीवी लगभग हर फिल्म देखती है। जैसे ही गरुड़ा के रिलीज की बात उठती है तो उस पुलिसकर्मी के परिवार के साथ कुछ अनहोनी होती है और वह पुलिस वाला लग जाता है इन तमिल रॉकर्स के पीछे।

क्या वह उन तक पहुंच पाने में कामयाबी हासिल करता है? क्या पाइरेसी का सचमुच में खात्मा कर पाती है उसकी टीम? उसके परिवार के साथ कौन सी अप्रिय घटना घटित हुई? कैसे सबने काम किया पाइरेसी के खिलाफ या उसके साथ कैसे और कौन-कौन लोग खड़े थे फ़िल्म को लीक करने में ये सब 8 एपिसोड की इस लम्बी चौड़ी सीरीज में आप जानते हैं।

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कायदे से सीरीज अच्छी बन पड़ी है खास करके सिनेमा लवर्स के लिए। लेकिन उसी कायदे के साथ बता दें कि सीरीज में कमियां भी हैं बहुतेरी। कहानी को फैलने में इतना लम्बा समय लगता कि आप एक बारगी इससे बोर होने लगें। फिर बीच-बीच में वीएफएक्स भी परेशानी पैदा करता है। लेकिन जैसे ही धैर्यवान बनकर आप इसे देखते जाते हैं तो आपको तमिल रॉकर्स वाले पाइरेसी करने वालों पर ही नहीं बल्कि उन सबके प्रति घृणा का भाव आता है जो फिर भले पाइरेसी को बढ़ावा देने वाले फ़िल्म की टीम के कोई सदस्य ही हों।

एक फ़िल्म का ईमानदार फाइनेंसर ऐसा कभी नहीं चाहेगा कि उसका कोई भी प्रोजेक्ट लीक हो। लेकिन यदा कदा फाइनेंसर तो क्या उस प्रोजेक्ट के स्पॉनसर, प्रोडयूसर्स, एक्टर्स, मैनेजर, एडिटर, डी आई वाले तक भी प्रोजेक्ट्स को लीक कर जाते हैं। फिर उत्पन्न होते हैं विवाद।

सीरीज कहती है कि केंद्र सरकार इसमें कुछ हस्तक्षेप करके इन्हें आसानी से पकड़ सकती है। लेकिन केंद्र तो क्या स्थानीय सरकारें, पुलिसकर्मियों के द्वारा ही जब घुस ली जाती हों जिस देश में, जिस देश में हर दूसरा-चौथा आदमी करप्ट हो तो उस देश में फिल्में तो क्या खुफिया जानकारियां तक बाहर ही नहीं आती बल्कि दुश्मन देशों तक पहुंच जाती हैं। कुछ ऐसा भी यह सीरीज सीखा जाती है।

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सीरीज की स्टार कास्ट में ‘अर्जुन विजय’, ‘वानी भोजन’, ‘ऐश्वर्य मेनन’, ‘अजगम पेरूमल’, ‘विनोदनी वैद्यनाथन’, ‘विनोद सागर’, ‘शरथ रवि’, ‘तरुण कुमार’ लगभग सभी अपना काम ठीक ठाक करते नजर आते हैं। कुछ एक एक्टिंग की और साथी कलाकारों की एक्टिंग की कमियों को छोड़ दिया जाए तो यह सीरीज आपको सिनेमा के प्रति ईमानदार बनाने का ज्ञान जरूर दे जाती है।

एडिटिंग वालों का काम सराहनीय है लेकिन लेखकों व डायरेक्टर्स की टीम मिलकर इसे थोड़ा कम लिखते या कम डायरेक्टर करते तो सम्भवतः एडिटर्स भी इसमें कसावट पैदा कर पाते ज्यादा। कागजों पर लिखते समय और उसे पर्दे पर फिल्माते समय स्क्रिप्ट में जो छेद हो जाते हैं अक्सर उनसे भी यह अछूती नहीं। फिर कुछ अच्छा है तो वो ये कि जिस तरह के गलिच इसमें इस्तेमाल किये गए हैं वे बड़े प्रभावी तरीके से सीरीज में रोचकता लाते हैं। यह बड़े बजट के अभाव में बनी सीरीज है यह तो साफ नजर आता लेकिन जो सिनेमाई प्रयोग इसमें किये गए हैं वे यदा कदा छोटे स्तर पर पहले भी देखे और सराहे जा चुके हैं।

इन सिनेमाई प्रयोगों के इस्तेमाल को बढ़ावा यह सीरीज जरूर देगी और देखना तब इस सीरीज का ही नाम लिया जाएगा। लेकिन अफसोस कि जो निर्देशक पहले ऐसा कर चुके हैं वे तमिल रॉकर्स के साये तले दबे से महसूस करेंगे। वैसे हिंदी में इसकी डबिंग ज्यादा जगहों पर आपको सीरीज से जुड़ती नजर नहीं आती। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम सहित कई भाषाओं में आई इस सीरीज को अगर आप ओरिजनल भाषा के जानकार हैं और देखते हैं तो यह आपको अच्छा अनुभव दे सकती है।

सीरीज के खत्म होने पर एक कसम वे लोग जरूर खाएं जो पाइरेसी को बढ़ावा देते हैं या पाइरेट सिनेमा देखते हैं। फिर कहते हैं अच्छा सिनेमा आजकल बनता कहाँ है? अरे अच्छा सिनेमा बनाने वालों की कमर तो ऐसे लोग ही तोड़ देते हैं तभी तो आपको देखने को मिलता है सिर्फ कचरा… कचरा… कचरा… तो अपने दिमाग को, दिल को, रुपये-पैसे और समय को कचरा प्रबंधन वालों का गोदाम नहीं बनाना चाहते तो अच्छे सिनेमा की कद्र करना सीखिए। इसमें प्रोपेगैंडा फैलाना या वैसे सिनेमा को बढ़ावा न देना भी उतना ही जरूरी है जितना आप बॉयकॉट ट्रेंड को आये दिन उछालते रहते हो।

सोनी लिव वालों की इस सीरीज को बॉलीवुड लोचा टीम देती है – तीन स्टार

About the author

Tejas Poonia

लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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