Sunday, December 5, 2021

वेब रिव्यू : मुसीबत में घिरे अपनों को बचाती ‘टब्बर’

‘टब्बर’ एक पंजाबी शब्द होता है जिसका अर्थ है ‘खानदान’ या ‘परिवार’। पिछले दिनों सोनी लिव पर आई यह सीरीज काफी सुर्खियां बटोर रही है।

कहानी है पंजाब के जालंधर के एक गांव की जिसमें रहने वाला ओंकार सिंह (पवन मल्होत्रा) का परिवार जिसमें, उसकी पत्नी सरगुन (सुप्रिया पाठक), बड़ा बेटा हरप्रीत सिंह उर्फ हैप्पी (गगन अरोड़ा) और छोटा बेटा तेगी (साहिल मेहता) रह रहे हैं। हरप्रीत सिंह उर्फ हैप्पी दिल्ली रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है। कुछ दिन के लिए घर आता है वह। और हमें पता चलता है कि उसके परिवार की चाह है कि वो यूपीएससी की परीक्षा पास करके आईपीएस अफसर बने। क्योंकि उसके पिता को पंजाब पुलिस में 12 साल तक नौकरी करने के बाद एक हादसे के कारण अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी।

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अब जब वह अपने घर आया तो उसके पीछे-पीछे महीप सोढ़ी (रचित बहल) नाम का एक लड़का उसके घर पहुंच जाता। और बैग बदलने की बात कहता है। अब क्या था उस बैग में? क्या वह बैग हैप्पी ने छुआ या किसी ओर ने? इसी बीच उस बैग के कारण घर में अफरा-तफरी मच जाती है जिसमें महीप की मौत हो जाती है। इसके साथ ही उसके भाई की अपनी मुसीबतें हैं जो उसने बेवजह पाली हुई हैं। आप उन्हें मुसीबत न कहकर ख्वाहिश कहें तो ज्यादा बेहतर होगा। खैर इसके बाद पता चलता है कि महीप उस इलाके से सबसे बड़े नेता और बिजनेसमैन अजीत सोढ़ी (रणवीर शोरी) का छोटा भाई है। लो जी नई मुसीबत। अब ऐसे ही करते करते लगभग इस सीरीज के सभी आठों एपिसोड में मौत और मर्डर की कहानी बुनी गई है। एक मुसीबत से बचने के चक्कर में कई नई मुसीबतें उस टब्बर के सामने आती हैं। अब इन एक के बाद एक आती इन मुसीबतों से कैसे ये पंजाबी परिवार अपने को, अपनों को बचा पाता है, यही सब इसकी कहानी में देखने को मिलता है।

अब यहां इस सीरीज में खास बात यह है कि इसके आरम्भ होते ही हर एपिसोड के साथ आपको ‘बाबा फरीद’ के दोहे देखने को मिलेंगे।

उठ फरीदा सुत्तिया, तूं दुनिया देखन जा।
शायद कोई मिल जाए बख़्शया, तूं वी बख़्शया जा।।

फरीदा जे तूं अक्ल लतीफ़ है, काले लिख न लेख।
आपने गिरेबान में सिर नीवां के वेख।।

कुछ इसी तरह के अन्य इस कहानी से जुड़ते हुए ही नहीं बल्कि असल जीवन के मायने दिखाते-समझाते दोहे भी इसमें देखने को मिलते है।

जार पिक्चर्स के बैनर तले बनी निर्देशक ‘अजीत पाल सिंह’ द्वारा निर्देशित सीरीज में पवन मल्होत्रा, सुप्रिया पाठक, गगन अरोड़ा, रणवीर शोरी, साहिल मेहता और परमवीर सिंह चीमा प्रमुख भूमिका में हैं। और ये सभी अपना काम बखूबी करते नजर आते हैं। बल्कि इन्हें देखते हुए, इनके अभिनय को देखते हुए आप इनसे एक्टिंग की क्लासें भी लें सकते हैं।

यह सीरीज क्राइम, थ्रिल, इमोशंस जैसे कई सारे मसाले अपने में समेटे हुए है। ‘कर्म’, ‘झूठ’, ‘सच’, ‘तुरेया’, ‘काला’, ‘इश्क़’, ‘हनेरा’, ‘बिरहा’ नाम से इसके आठ एपिसोड आपको एकदम बांधे रखते हैं। हालांकि इनकी संख्या या सीरीज के हर एपिसोड की लंबाई को कुछ कुतर दिया जाता तो यह और अधिक निखार पाती। कुछ एक सीन का रिपीटेशन इसके रंग को गाढ़ा जरूर बनाता है लेकिन इसी चक्कर में यह इत्मीनान से देखने लायक भी बन जाती है।

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इन सबके साथ ही सीरीज में अली मुगल, बाबला कोचर, कंवलजीत सिंह, नुपुर नागपाल, आकाशदीप साहिर, तरन बजाज, निशांत सिंह, लवली सिंह, मेहताब विर्क, रोहित खुराना और रचित बहल जैसे कलाकारों ने भी अपना भरपूर दमखम दिखाया है। पंजाब की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर तैयार की गई सीरीज की कहानी एक पंजाबी मध्यमवर्गीय परिवार के इर्द-गिर्द जब घूमती है तो यह केवल उस परिवार की नहीं बल्कि हमारी अपनी सी लगने लगती है। सीधे-सादे लोग, हंसते-खेलते बच्चे, माता-पिता के छोटे-छोटे सपने, बच्चों की छोटी-छोटी सी ख्वाहिशें लेकिन उन सबका अचानक एक दिन में सबकुछ बदल जाना, कितना कुछ यह सीरीज हमें दे जाती है इसका अंदाजा आपको इसे देखकर ही लगेगा।

अपने शीर्षक पर खरी उतरती इसकी कहानी कुछ सुनी-सुनाई सी लगती है। लेकिन बावजूद इसके इसमें लाइटिंग, सेटअप, लोकेशन, डायलॉग्स से लेकर बैकग्राउंड स्कोर तक में बहुत ही रियलिस्टिक सेटिंग बनाने में इसके निर्माताओं ने जो कामयाबी हासिल की है वह उम्दा है। इसी साल अपनी बहुचर्चित फिल्म ‘फायर इन द माउंटेन्स’ के लिए 19 वें लॉस एंजिलिस भारतीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का अवार्ड पाने वाले निर्देशक अजीत पाल सिंह ने अपने नाम के अनुरूप काम करते नजर आते हैं। यही वजह है कि सीरीज अपने साथ कौतूहलता लिए चलती है। बैकग्राउंड स्कोर और म्युजिक के लिए स्नेहा खानवलकर तारीफों की हकदार हैं।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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