Friday, September 17, 2021

कातिल ‘प्रेम गजरा’ और मासूम ‘चिली चिकन’

निर्देशक – शरद मल्होत्रा
लेखक – स्मृति सिंह , शरद मल्होत्रा
स्टार कास्ट – वृषाली चवन, इश्तियाक खान, विभा छिब्बर , विजय कश्यप

एक सीन देखिए ऑटोरिक्शा ड्राइवर अपनी पत्नी से प्रेम करता है। अगले सीन में एक बुजुर्ग आदमी बैंकॉक जाने की बात करता है। और कहता है – ‘कोई नागपुर जाता है तो संतरे साथ लेकर जाता है क्या।’ अब वह ड्राइवर नशे घर आता है बीवी को मारता पीटता है, फिर प्रेम करता है, उसके साथ सैक्स भी करता है।

अब आप कहेंगे आदमी है मारेगा तो प्यार भी करेगा और प्यार करेगा तो मारेगा भी। क्यों भाई ये जरूरी है क्या? किसने बनाया ये नियम? हम पितृसत्तात्मक लोगों ने जो नियम बनाए उस पर चलते हुए ही यह हश्र हुआ कि गाहे-बगाहे नहीं बल्कि हजारों बार सिनेमा लिखने वालों ने, उसे बनाने वालों ने इसे दिखाया। शायद सोच बदलने के लिए! शायद उस पितृसत्तात्मक सोच को दृढ़ करने के लिए! खैर जो भी हो।

साल 2018 से एमएक्स प्लेयर, अमेजन प्राइम पर डोलती, घुमती, फिरती एक बार फिर से अब डिज़्नी प्लस हॉट स्टार पर आई है। ‘प्रेम गजरा और चिली चिकन’ इस प्रेम गजरे की खुशबू तो अच्छी महसूस होती है लेकिन फिर यह खुशबू एक समय बाद इतनी तीखी हो जाती है कि उससे आपकी आंखें ही नहीं सब कुछ भीतर तक जलने लगता है। आप इस कातिल प्रेम गजरे यानी सुनील बने इश्तियाक खान के पात्र के साथ प्रेम करने लगते हैं लेकिन अगले ही पल वह नफरतों में भी बदलने की आहट छोड़ जाता है। वहीं मासूम चिली चिकन यानी सुनील की पत्नी इंदु जो कहीं काम करती है वो चाहती है पति को इतना प्रेम दे कि उसकी शराब छूट जाए। लेकिन इस मुई शराब को छुड़ाने में उसकी सांसे ही सांसत में आ जाती हैं। दूसरी और मालकिन विभा छिब्बर कुछ पलों के लिए आती हैं, लुभाती है लेकिन गायब हो जाती है। जैसे इस फ़िल्म की कहानी अचानक से गायब होती है।

short film review prem gajra chilli chicken

एक्टिंग के लिहाज से इश्तियाक खान जमकर अपने अभिनय का प्रदर्शन करते हैं। उन्हें हम कई बार पहले भी पर्दे पर और कुछ टीवी शोज़ में देख चुके हैं। ‘लूडो’, ‘तमाशा’, ‘भारत’, ‘फुकरे रिटर्न्स’, ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ जैसी बड़ी फिल्मों में इनके अभिनय को सराहा जा चुका है। वृषाली चवन का अभिनय ठीक रहा वहीं विभा छिब्बर कठोर, संग-दिल मालकिन के रूप में ओवर एक्टिंग ही कर गईं। निर्देशक शरद मल्होत्रा की यह पहली ही डेब्यू फिल्म है और उसी में उन्होंने कहानी को एकदम से खत्म करके अचंभित तो किया लेकिन इस बीच वे एक अधूरापन भी छोड़ गए। सम्भवतः साथी लेखक स्मृति सिंह को कहा हो मैं निर्देशन कर रहा हूँ तो कहानी मेरे मुताबिक खत्म होगी। इस पर 18 मिनट की फ़िल्म में इतने ही एड/विज्ञापनों का आना अखरता है। दर्शक कहानी से जुड़ने लगता है कि विज्ञापन उसे जुड़ने नहीं देता। लेखन, निर्देशन के बीच का यह रोड़ा इसकी सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, म्यूजिक पर असर तो नहीं डालता लेकिन इस कातिल और मासूम कहानी का कत्ल जरूर करता है।

इस फ़िल्म को इस लिंक पर क्लिक कर देखा जा सकता है।

https://www.hotstar.com/in/movies/prem-gajra-aur-chilli-chicken/1260059608/watch

रेटिंग – 2.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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