Sunday, April 11, 2021

मूवी रिव्यू-‘रूही’ डराटी कम है, हंसाटी भी कम है

Movie Review Roohi: लड़कियों को अगवा करके अपने क्लाईंट से उनकी ज़बर्दस्ती शादी करवाने वाले अपने बॉस के कहने पर भंवरा और कट्टनी एक लड़की को उठा तो लाए हैं लेकिन शादी हो गई है कैंसिल। अब जंगल वाली फैक्ट्री में इस लड़की संग ये दोनों ‘अकेले’ हैं। दिक्कत दरअसल यह है कि यह लड़की कभी तो नॉर्मल रहती है और कभी इसमें घुस आता है भूत। ओह सॉरी, भूत नहीं भूतनी। और वो भी सीनियर वाली यानी चुड़ैल। और चुड़ैल भी कैसी-मुड़िया पैरी, जिसके पैर मुड़े होते हैं-पंजे पीछे और एड़ी आगे। लेकिन इससे भी बड़ी दिक्कत यह कि इस नॉर्मल लड़की ‘रूही’ से भंवरा को प्यार हो गया है और इसके चुड़ैल वाले रूप ‘अफ्ज़ा’ से कट्टनी को। अब कौन करेगा इससे शादी? किसका घर आबाद होगा और किसकी होगी बर्बादी?

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Image Source: The Indian Express.com

हिन्दी फिल्मों में हॉरर का बाज़ार कुछ अलग तरह से सजाया जाता है। ‘स्त्री’ के रिव्यू (रिव्यू-सामाजिक सलवटों को इस्त्री करती ‘स्त्री’) में मैंने लिखा था-‘‘अपने यहां वो हॉरर फिल्में ज़्यादा चलती हैं जिनमें हॉरर के साथ रोमांस, म्यूज़िक, सैक्स, इमोशन जैसे मसालों को मिक्स किया जाए’’ ‘रूही’ में भी यह मिक्सा-मिक्सी करने की कोशिश की गई है। फिल्म को पूरे का पूरा हॉरर या चुड़ैल ड्रामा बनाने की बजाय इसमें सिचुएशंस और संवादों से कॉमेडी का तड़का लगाया गया है। कई जगह तो यह तड़का इतना मसालेदार है कि आप अपनी हंसी नहीं रोक पाते। लेकिन सिर्फ तड़के से दाल स्वाद बनती होती तो फिर दाल को कौन पूछता?

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Image Source: Rediff.com

दिक्कत इसकी कहानी के साथ नहीं है। कहानी तो बढ़िया ली गई कि लड़की को उठाने वालों को ही उसके साथ इश्क हो गया। नया ट्विस्ट यह भी डाला गया कि लड़की के दोनों रूपों से इश्क करने वाले दो लड़के मिल गए। यह उत्सुकता भी बनाई गई कि आखिर लड़की से शादी कौन करेगा और अंत में इसका हल भी दिखाया गया। दिक्कत दरअसल इस कहानी के आवरण के साथ है जो अगर कायदे से रचा जाता तो इस कहानी के चारों और लिपट कर इसे मज़बूत, वजनी और असरदार बना पाता। दिक्कत इसकी स्क्रिप्ट के साथ है जो न तो ‘मुड़िया पैरी’ की बैक-स्टोरी में जाती है न ही किसी और किरदार की। जिसका मकसद सिर्फ कॉमेडी पंचेज़ के सहारे दर्शकों को हंसाना भर होता है लेकिन जिसमें से कोई ठोस बात निकल कर नहीं आ पाती। और जो अंधविश्वास का समर्थन न करने का दावा करते-करते उसी के पक्ष में जा खड़ी होती है। मृगदीप सिंह लांबा और गौतम मेहरा की कलम चली कम और फिसली ज़्यादा है।

और पढ़े: मूवी रिव्यू-आऊटर पर खड़ी ‘द गर्ल ऑन द ट्रेन’

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Image Source: Mid-Day.com

फिल्म के किरदार हालांकि दिलचस्प रचे गए हैं। भंवरा पांडेय तुतलाता है। हालांकि पूरी तरह से टोटला नहीं है, बस ‘त’ को ‘ट’ बोलता है। कट्टनी कुरैशी उसका भी उस्ताद है जो चुड़ैल से ही इश्क कर बैठता है। इन दोनों किरदारों में राजकुमार राव और वरुण शर्मा ने ज़र्बदस्त समां बांधा है। हालांकि वरुण ‘फुकरे’ वाली इमेज में जकड़े जा चुके हैं। अपनी अदाकारी के अलावा ये दोनों अपनी फटाफट वाली संवाद अदायगी और बोले गए पंचेज़ से काफी मनोरंजन करते हैं। लेकिन इन पंचेज़ को ठीक से सुनने में इन किरदारों की भाषा आड़े आती है जो हिन्दी, हरियाणवी, राजस्थानी, बुंदेली, ब्रज आदि में बदलती रहती है। भई, सीधी-साफ हिन्दी रख देते तो क्या हर्ज़ था? कई जगह बैकग्राउंड म्यूज़िक इतना लाउड है कि संवाद आकर निकल जाता है और हम बगल वाले से ‘क्या बोला?’ पूछते रह जाते हैं।

जाह्न्वी कपूर ने इस बेहद कमज़ोर रोल को क्या देख कर चुना, यह वही बेहतर बता सकती हैं। एलेक्स ओ’नील और उनका किरदार फिल्म में था ही क्यों? मानव विज और सरिता जोशी अपना काम अच्छे से कर गए। फिल्म में सधे-पके कलाकारों की कमी ने भी इसे उस ‘स्त्री’ के स्तर तक नहीं जाने दिया जिसका सहारा लेकर इसे रचा और प्रचारित किया गया। गीत-संगीत ठीक-ठाक रहा, ऊपर से बुरके गए मसाले की तरह। कैमरा, स्पेशल इफैक्ट्स आदि अच्छे रहे। डायरेक्टर हार्दिक मेहता ने किरदारों और सिचुएशंस को तो रोचक गढ़ा ही, शूटिंग के लिए अनछुई लोकेशंस भी चुनीं मगर न तो वह क्लाइमैक्स में फिल्म को ढीला होने से बचा पाए और न ही इसे एक दमदार फिल्म बना कर हमारे दिलों में उतार पाए। असल में यह फिल्म इसमें दिखाई गई चुड़ैल की ही तरह है-मुड़िया पैरी, जो देख कहीं रही है, जा कहीं और रही है। जो हंसाती भी है, डराती भी है मगर कम-कम। लेकिन साल भर बाद थिएटरों में कोई बड़ी फिल्म आई है, थोड़ी हिम्मत दिखाइए, देख आइए। आप निराश नहीं होंगे।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि फिल्म कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

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Deepak Dua
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

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