Tuesday, September 27, 2022

रिव्यू: पुराने ज़ख्मों को हरा करती ‘वाशिंग मशीन’

साल 2013 से 2017 के बीच 5 लाख के करीबन भ्रूण हत्याओं को अंजाम दिया गया। वो भी अकेले राजस्थान में, ऐसा यह फ़िल्म बताती है। हम और आप तो कहां ही ऐसे रिकॉर्ड रखते हैं। आम जनता तो इनसे लेना-देना भी क्या। लेकिन ये ऐसा सब करने वाली भी यही हमारी आम जनता ही है।

भ्रूण हत्या को लेकर जब कड़े कानून बने, धाराएं बनाई गईं, नियम-कायदे कानून सख़्त किए गए तभी तो चेते हम लोग। भारत के प्रत्येक राज्य में आज भी चोरी-छुपे ही कुछ के। संख्या में ही सही भ्रूण हत्याओं पर पूरी तरह लगाम कहाँ कसी गई है?

फ़िल्म ‘वाशिंग मशीन’ भी 17 मिनट में उन्हीं पुराने जख्मों को हरा करती हुई नजर आती है। भ्रूण हत्याओं के चलते एक अच्छे खासे चिकित्सकों से लेकर झोला-छाप डॉक्टरों तक की चांदी हुई थी। लेकिन अपने फायदों के लिए उन्होंने और बेटी को बोझ मान उसके खर्चों से बचने के लिए हमने भी तो अपने फायदों को ही तलाशा था न! तो फिर रोना-धोना किस बात का?

अगर आज भी राजस्थान, हरियाणा,पंजाब आदि जैसे कई अनेक राज्यों में अगर बेटियों-बहुओं की कमी पड़ रही है तो, पड़ने दीजिए न! हमारे खर्च ही तो बच रहे हैं है न! ऊपर से सरकारें भी नादान हैं है न! ‘बेटी नहीं लाओगे तो बहू कहाँ से पाओगे?’ ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ।’ जैसे स्लोगन और नारों के साथ-साथ कभी-कभी हमें सरकारों का भी धन्यवाद दे देना चाहिए। उनकी बनाई नीतियों के कारण ही आज भी बहुतेरी बेटियां सुरक्षित हैं, उन्हें कोख में नहीं मारा जा रहा है।

फ़िल्म में कोई बड़ी लीड स्टार कास्ट नज़र नहीं आती। लेकिन सभी अपने-अपने रोल को राजस्थान की भाषा में ही संवादों को बोलते हुए अपना काम कर ही जाती है। सिनेमैटोग्राफी ठीक है। लेकिन कहानी के मुताबिक सेट ठीक तो लगता है बावजूद उसके उसमें कुछ गलतियां भी नजर आती हैं। हालांकि इन्हें गलती नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि जिस तरह की, जिस परिवेश और समय की यह कहानी कहती है उसी के अनुसार उसे रचा गया है।

Review Washing Machine

फ़िल्म के बीच बेहद छोटे-छोटे लोकगीत रखकर इसका रंग गाढ़ा किया गया है जो इसे देखते हुए आपको उस परिवेश में ले जाती है। कैमरावर्क, फ़िल्म का लुक, एडिटिंग, बैकग्राउंड स्कोर अच्छे हैं लेकिन इतने भी नहीं है कि वे आपको इस कदर भावुकता की चाशनी में डुबो ही दे कि आप वाह-वाही करने लगें।

डायरेक्टर ‘आंनद सिंह चौहान’ ने ही इसका स्क्रीनप्ले लिखा है और कहानी भी। कहानी के मुताबिक स्क्रीनप्ले कसा हुआ है। ‘आनन्द सिंह चौहान’ इस फ़िल्म के माध्यम से इतना भरोसा तो जीत ही लेते हैं कि उन्हें कम संसाधनों में भी अच्छा सिनेमा बनाने वाला निर्देशक कहना सही निर्णय होगा। ‘राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’, ‘जयपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’ , ‘यथा कथा इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’ सहित कई और फेस्टिवल में इनाम के साथ-साथ तारीफें पाने वाली इस फ़िल्म को एक बार देखना कोई घाटे का सौदा नहीं होगा।

ऐसी फिल्में फेस्टिवल्स के सिनेमा में ही ज़्यादा देखी जाती हैं। और ऐसी फिल्मों को ही फेस्टिवल का सिनेमा भी कहा जाता है। ऐसी फ़िल्म के प्रोड्यूसर्स भी पुराने ज़ख्मों को कुरेद कर आपको और हमें यह याद दिलाते रहते हैं कि सनद रहे बेटियां बची रहेंगीं तभी यह समाज भी बचा रहेगा। ‘परमानन्द रामदेव’ , ‘अंकिता पटेल’ , ‘प्रवीण चौधरी’ , ‘भवानी सिंह चौहान’ , ‘प्रधान्या सिंह चौहान’ अभिनीत यह फ़िल्म जब भी ओटीटी पर आए एक बार देखिएगा जरूर। भले ही अब कन्या भ्रूण हत्याएं बन्द सी हो गईं हों लेकिन जितनी भी हुई है अब तक उनकी यादों के लिए ही सही।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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