Wednesday, January 19, 2022

रिव्यू: ज़िंदगी का खेल खेलती ‘वाह ज़िंदगी’

एक बार एक महावत छोटा हाथी लेकर आया और उसने उसे जंजीर से बांध दिया। अब वह कुछ समय तक उसे तोड़ने की कोशिश करता रहा लेकिन तोड़ न पाया। अब उसने वह प्रयास करना बंद कर दिया। उसे लगने लगा कि वह उस जंजीर को कभी नहीं तोड़ पाएगा। लेकिन उस जंजीर को जब अशोक ने तोड़ा तो वह अपने समाज के लिए मिसाल बन गया और उसकी ज़िंदगी वाह जिंदगी बन गई।

राजस्थानी सिनेमा के इतिहास में पहली बार नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फ़िल्म ‘टर्टल’ के निर्देशक की एक और फ़िल्म ‘वाह ज़िंदगी’ ज़िंदगी के खेल में बाज़ी को हर हाल में जीतने की कहानी कहती है।

ज़िंदगी तो यूँ भी वाह! ही होनी चाहिए, नहीं! आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रमुख श्री रविशंकर का भी कुछ ऐसा ही मानना है। फ़िल्म ‘वाह जिंदगी’ जैसा कि इसके शुरू होने से पहले ही स्क्रीन पर लिखा आता है। रीना और अशोक चौधरी के जीवन से प्रेरित। दरअसल यह अशोक चौधरी कोई और नहीं स्वयं फ़िल्म के प्रोड्यूसर ही हैं।

‘टर्टल’ में जो कहानी कही गई है यह फ़िल्म उसी का विस्तार लगती है और कुछ साल बाद की कहानी को हमारे सामने लेकर आती है। जिसमें हम जान पाते हैं कि अशोक जिसे बचपन से ही अकाली कहा गया। जिसे मनहूस मानकर समाज ने अकाल का कारण करार देकर यह नाम दिया। वह अकाली खुद के जज़्बे और ज़िंदगी के खेल में जीतने की कोशिश करता नज़र आता है। अब वह कितना इसमें सफ़ल हुआ वह तो ज़ी5 पर आई फ़िल्म को देखकर ही आप पता लगा सकेंगे।

फ़िल्म में बड़ी स्टार कास्ट लेकर एक साथ ही फ़िल्म के निर्माता , निर्देशक यह कमी भी पूरी करते नज़र आते हैं। निर्देशक दिनेश यादव इसमें अशोक के जीवन की एक लंबी यात्रा तय करते हैं। जिसमें वे उसकी 8 साल की उम्र से लेकर 35 साल तक की उम्र का ख़ाका खींचते नज़र आते हैं। किस तरह अशोक ने अपने आपको साबित किया समाज और दुनिया के सामने वह भी नज़र आता है।

कॉमेडी के साथ असल जीवन की कहानी को हिज्जों के रूप में कल्पनाओं का पुट शामिल करते हुए जिस तरह का मायाजाल निर्देशक रचते हैं पर्दे पर वह लुभाता तो है किंतु कहीं-कहीं स्क्रिप्ट में बिखराव भी हल्का सा नजर आता है। लगता है जैसे प्रोड्यूसर के जीवन की गाथा को सुनते हुए वह जहां कहीं भावुक हुए वहीं पर स्क्रिप्ट के मामले में वह कहानी और स्क्रिप्ट में बखूबी कस पाई। बाकी एक आध जगह जीवन के असल रंग-रूप को मिक्स करते हुए वह पटरी से थोड़ा उतरने लगती है।

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फ़िल्म में एक सीन है, जब अशोक कहता है – सब कहानियां झूठी है दद्दा , हकीकत में ये सब पत्थर हैं दद्दा। इनका कोई मोल ना है। जवाब में संजय मिश्रा कहते हैं – पत्थर ना है सोना है ये पकड़ कर देख। म्हारे पुरखों की निशानी है। जायदाद, सोना ही समझ। आंखों का फर्क है बस। अहम् धनास्मि। मन्त्र को मतलब समझेगो तब जंतर निकलेगो।

तो ऐसा लगता है जैसे यह फ़िल्म हमारे जीवन में प्रकृति की उपादेयता और उसके द्वारा दी गई अमूल्य धरोहर के प्रति समझ पैदा करने की बात कर रहे हों। प्रेम में अपनों को दांव पर लगाना तथा जीवन में जीतना कई बार इतना जरूरी हो जाता है कि उसके चलते हम कुछ भी कर गुजरने को आतुर होते हैं। रुहीन एवं सूर्यपाल सिंह के साथ मिलकर लिखे गए डायलॉग्स और फ़िल्म की कहानी टर्टल के मुकाबले थोड़ी हल्की नजर जरूर आती है। लेकिन साथ ही यह वर्तमान सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ के प्लान को भी सहारा देती है।

संजय मिश्रा तो फ़िल्म की जान है ही। वे टर्टल की तरह इसमें भी छाए नजर आते हैं। जब भी रासजथानी भाषा में संजय मिश्रा संवाद बोलते हैं और उसी लुक के रूप में सामने दिखाई देते हैं तो लगता ही नहीं कि वे राजस्थान के बाहर के रहने वाले हैं। इसके अलावा ‘नवीन कस्तूरिया’ लगातार अपने आपको साबित कर रहे हैं। अशोक के जीवन रूपी किरदार को नवीन हर कदम पर न्याय दिलाते हैं। ‘प्लाबिता बोर ठाकुर’ एक आध जगह छोड़ प्यारी लगी हैं। जब अशोक और रीना के जीवन में दुःखद पलों को फ़िल्म दिखाती है तो यह प्रेम के चर्मोत्कर्ष पर भी आपको ले जाती है। बन्ना के किरदार में ‘विजय राज’ प्राण फूंकते हैं और फ़िल्म में एक तरह से विलेन के रूप में बेहतर तरीके से उभरकर आते हैं। ‘टीटू वर्मा’, ‘मनोज जोशी’, ‘हबीब अदरूस’ तथा प्रोड्यूसर ‘अशोक चौधरी’ तक सभी अपने किरदारों से न्याय करते हैं।

फ़िल्म का वह सीन जीवन की नश्वरता को सार्थकता प्रदान करता है जब फ़क़ीर झोपड़े को जला रहा होता है। फ़िल्म के गाने सभी ऐसे लगता है कि मानों फ़िल्म की कहानी को गति प्रदान कर रहे हों। फ़िल्म में सबसे उम्दा रहा तो मेकअप, लुकअप, सिनेमैटोग्राफी और रंग-संयोजन। ऐसी फिल्में आपके भीतर स्वदेश प्रेम तथा अपने देश के लिए कुछ कर जाने की ललक अवश्य जगा जाती है। साथ ही अपने जीवन में संघर्षों से पार पाने का रास्ता भी दिखाती है। फ़िल्म की सार्थकता यही है कि जब यह कहती है –

‘न जीतनो जरूरी है
न हारनो जरूरी
जिंदगी बस खेल है
खेलनो जरूरी है।’

तो लगता है कि यह भाग्यवादी बनने से कहीं अधिक कर्मवादी होने का संदेश दे रही हो। यह फ़िल्म सपनों की बात करती है जो देश के हर आम से खास आदमी देखते हैं और कुछ जो उनमें से उसे पूरा करने का सार्थक प्रयास करते हैं। दरअसल यह फ़िल्म सार्थक प्रयास करने वालों की कहानी है जिन्हें कुछ और कि जरूरत हर समय जरूरत महसूस होती है। साथ ही यह फ़िल्म उन भागीरथी प्रयास करने वालों की फ़िल्म है।

अपनी रेटिंग -3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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