Wednesday, January 19, 2022

रिव्यू: वेल्ले हैं तो ही ‘वेल्ले’ देखें

इस हफ़्ते सिनेमाघरों और ओटीटी पर कई फिल्में, वेबसीरीज़ आईं है। उसी कड़ी में बॉलीवुड लोचा टीम लेकर आई है फ़िल्म ‘वेल्ले’ का रिव्यू। सनी देओल के बेटे करण देओल की यह दूसरी फिल्म है।

‘वेल्ले’ यानी फ़्री जैसे हमारे घरों में कहा जाता है। काम के न काज के दुश्मन अनाज के। ये उन वेल्लों के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। वेल्ले पंजाबी भाषा का शब्द है। ऐसे ही एक दिन सनी देओल का बेटा करण देओल वेल्ला बैठा था। तो उसके बाप ने फोन घुमाया। इंडस्ट्री में किसी के पास कोई कहानी नहीं मिली उसके लायक तो एक डायरेक्टर को पकड़ा जिससे फ़िल्म डायरेक्ट करवा ली गई।

अब बेचारे डायरेक्‍टर ‘देवेन मुंजाल’ एक ऐसी कहानी लेकर आए जो हम पहले भी कई फिल्‍मों में देख चुके हैं। कहानी के नाम पर मिला भी तो तेलुगू फिल्म ‘ब्रोचेवरेवरुरा’ (Brochevarevarura) का ऑफिशियल रीमेक। हिंदी सिने पट्टी में रीमेक खूब बनाए जाते हैं। लेकिन बहुत कम ऐसा हो पाता है कि किसी अच्छी फिल्म का रीमेक भी अच्छा ही बनकर आए। फ़िल्म के लिए स्क्रीनप्ले-डायलॉग लिखे हैं। राइटर पंकज कुमार ने। वे जरूर इसे हिंदी में ढालते समय थोड़ी मेहनत करते नज़र आते हैं।

फिल्म की कहानी की बात करें तो शुरु होती है ऋषि स‍िंह यानी (अभय देओल) से, जो इस फिल्म में इंडस्ट्री की दुनिया से जुड़ा हुआ है। अब उसको अपनी लो-बजट फिल्म बनाने के ल‍िए म‍िलती है पॉपुलर फ़िल्म स्टार रोह‍िणी यानी की ‘मौनी रॉय’ और वह उसे अपनी इस लो बजट की फिल्म हीरोइन बनाना चाहता है। ऋषि, रोहि‍णी को तीन खास दोस्तों राहुल (करण देओल), राम्बो (सावंत स‍िंह प्रेमी) और राजू (व‍िशेष त‍िवारी) यानी R3 गैंग की कहानी सुनाता है। ये यही उन असली ‘वेल्लों’ की गैंग है, जो स‍िर्फ मस्ती‍ करती रहती है। क्योंकि इनकी ज‍िंदगी का एक ही मकसद है आराम और मस्ती करना। ये तीनों लड़के एक स्कूल में साथ ही पढ़ते हैं और इसी स्कूल के प्रिंस‍िपल (जाक‍िर हुसैन) की बेटी है र‍िया (अन्या स‍िंह) ज‍िसके साथ जुड़ने से ये R3 गैंग R4 बन जाता है। अब खुराफाती दिमाग के घोड़े दौड़ा कर र‍िया एक प्लान बनाती है, ज‍िसमें ये तीनों फंस जाते हैं।

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अब इन वेल्लों के साथ जो कुछ घटता है और जो हालात पैदा होते हैं उसे देखकर एक-आध सीन में ही हंसी आ पाती है। वो भी ऐसी नहीं की खुलकर हंसा जा सके। अब इस कहानी में आगे तीन क्रिमिनल्‍स नज़र आते हैं। जिनकी किडनैपिंग दिखती है। मगर मज़ा न दे पाए थोड़ा हंसा जरूर देती है। जान बचाकर भागती हुई लड़की को देखते हैं। मगर वो फील नहीं आता उसे देखने में। इसी बीच थोड़ी बहुत भागदौड़ है मगर पूरी तरह से रोचक अफरा-तफरी नहीं है। बल्कि इस अफरा-तफरी में कई तरह की गलतियां जरूर हैं।

करण देओल में देओल परिवार के चेहरों जैसी मासूम‍ियत तो है। इसीलिए उनके चेहरे से कई दफ़ा समझ आता है कि वे गलती से म‍िस्टेक कर रहे हैं। फिल्म में कुल 6 गाने हैं। जिनमें से एक-आध ही रंग लाता है। ज्यादातर तो बेवजह कहानी को लम्बा करने के इरादे से डाले गए मालूम होते हैं। फ़िल्म के लिए म्यूजिक देने वाले ‘रोचक कोहली’ का काम अच्छा है। गानों की ‘जसलीन रॉयल’, ‘JAM8’ और ‘युग भुसाल’ की कम्पोजिंग बढ़िया है।

‘वेल्ले’ एक ऐसी फिल्म है जो आपको हंसाने की कोशिश में खुद कभी-कभी उस खड्ड में जा गिरती है। जहां से इसकी कहानी बीच-बीच में डगमगाती नज़र आने लगती है। सिनेमैटोग्राफी, कास्टिंग, लुक, ‘करण देओल’, ‘आन्‍या सिंह’, ‘अभय देओल’, ‘सावंत सिंह प्रेमी’, ‘विशेष तिवारी’, ‘मौनी रॉय’, ‘जाकिर हुसैन’, ‘राजेश कुमार’, ‘महेश ठाकुर’ आदि की एक्टिंग, इम्प्रेशन, मेकअप, ड्रेस डिजाइन, डाएक्टिंग, एडिटिंग सब मिक्सचर सा है।

जैसे मिक्सचर में कुछ तीखा, कुछ मीठा, कुछ नमकीन सा होता है। इसलिए बेहतर होगा कि इन वेल्लों को देखने के लिए आप भी वेल्ले हों तभी देखें। वरना दूसरे भी कई ऑप्शन्स हैं आपके पास। बाकी आप जानते ही हैं हम समीक्षकों को तो देखना ही पड़ता है ताकि हम आपके फ़िजूल पैसे खर्च होने से तथा समय जाया होने से बचा सकें।

अपनी रेटिंग – 2 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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