Wednesday, January 19, 2022

रिव्यू: राजस्थानी सिनेमा का मान-अभिमान है ‘टर्टल’

राजस्थान के सिनेमा को बनते हुए अब तक आधी सदी गुजरने को है लेकिन पहली बार किसी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया है। सिनेमा का मान बढ़ेगा कि नहीं? हम हमेशा से रीजनल सिनेमा की उपेक्षा सी करते आए हैं। दक्षिण भारतीय रीजनल सिनेमा को छोड़ दें तो किसी भी अन्य भाषाओं में वह क़ुव्वत नहीं दिखाई देती।

बहरहाल राजस्थान का एक ग्रामीण इलाक़ा जहां सदियों से लोग रहते आ रहे हैं। एक लड़के के जन्म के साथ ही अब लोगों में यह विश्वास बन गया है कि यह लड़का मनहूस है। जब से यह आया है धरती पर तब से वहां पानी की कमी हो गई है। सिनेमा ही क्यों आम जन-जीवन में भी हम इस तरह की बातें सुनते ही आए हैं। ख़ैर अब यह लड़का जिसे सब अकाली कहते हैं जहां भी जाता वहां कुछ-न-कुछ कमी पड़ जाती।

एक दिन जब वह सताया गया ऐसे ही तो उसने अपने दद्दा से कहा – ‘हमारे मास्टर कहवे हैं कछुआ पाणी को गहरा करे है। तो मैंने सोची कछुए को पाणी में डाल दूं। कछुआ भी बचेगा और पाणी भी गहरा होगा।’ अब इस अबोध बालक को काफी कुछ सुनना पड़ा। तो उसके दद्दा गांव में पाणी बेचने वाले से बोले – पैसे में पाणी देकर इंसान भिखारी बना हुआ है। असली भिखारी तू है। धरती माता में से मुफत का पाणी निकाल रहा है और धरती माँ की बेच रहा है।’

ऐसे में उसे अब अपने पुरखों की कही बात याद आई और कहा – ‘कोई प्यासो न मरेगो। पुरखों ने म्हारे आंगण में सोने की सिल्ली गाढ़ रखी है। उसे निकालूंगा और सब पाणी मुफत में पी सकेंगे।

अब यहीं से इस फ़िल्म की जो जमीन तय होती है उसी पर यह यात्रा करती हुई इतनी आगे निकल जाती है कि इसके खत्म होने पर अंत में स्क्रीन पर आने वाली खबरें आपके मन-मस्तिष्क को क्षुब्ध कर जाती हैं। गोया कि वो आपको झकझोर कर जगाने की चेष्टा कर रही हों।

जब पानी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा यह लोक गाथा अपना रूप लेगी। यह पानी की लड़ाई एक घर से शुरू होकर गांव, गांव से शहर, शहर से देश और धीरे-धीरे विश्व स्तर पर फैलेगी और एक दिन विश्व युद्ध का रूप लेगी क्योंकि बिना पानी के जीवन असम्भव है। जब यह सब स्क्रीन पर लिखे हुए को आप पढ़ते जाते हैं तो लगता है वह लोक गाथा अब गाने का समय आ चुका है। इससे पहले की हम और अपनी मौतों के निकट पहुंचे उसके पहले हमें जागना ही होगा। अन्यथा यह सुप्त अवस्था हमारे जीवन को समाप्त तो कर ही देगी।

फ़िल्म एक घण्टे और कुछ मिनट ही लम्बी है जिसके चलते इसका कसाव कहानी, इसकी स्क्रिप्ट के हिसाब से बना रहता है। निर्देशक दिनेश यादव की लिखी कहानी और सूर्यपाल सिंह के लिखे डायलॉग्स के चलते अपनी स्क्रिप्ट के माध्यम से जो कलात्मक जादू उकेरते हैं, वह सीधा मन पर चोट करता है। ऐसी फिल्मों को देखकर आप केवल अपने आंसूं की दो बूंदे टपका दें तो काफी न होगा। बल्कि इस फ़िल्म को देखने वाले प्रत्येक इंसान की सार्थकता तब पूरी होगी जब वह इस जल-जीवन को बनाए-बचाए रखने के लिए सार्थक कदम उठाएगा।

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फ़िल्म किसी की तरह भी भाषण-बाजी और बयानबाजी से तो बचती ही है। साथ ही दिनेश यादव की ही आज रिलीज हुई एक और फ़िल्म ‘वाह जिंदगी’ का यह एक तरह से प्रीक्ववेल बनकर सामने आती है।

एक्टिंग के मामले में ‘संजय मिश्रा’ एक भरे-पूरे पेड़ की तरह फ़िल्म की अन्य स्टार कास्ट को वह छाया प्रदान करते हैं कि जिसके चलते साथी कलाकारों की छिट-पुट कमियां छुप जाती हैं। अलगोझ्या बजाने वाले रामनाथ चौधरी कुछ समय के लिए बीच-बीच में आते हैं और अपना प्रभाव जमाते हैं। इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर खुद भी कुछ समय के लिए नजर आते हैं एक्टिंग करते हुए। वे खुद भी स्वाभाविक अभिनय कर पाए हैं तो इसके पीछे निर्देशक की सफलता ही समझी जानी चाहिए।

राजस्थान का रीजनल सिनेमा अगर इसी तरह से सार्थक प्रयास करता रहे तो वह दिन दूर नहीं जब यहां के सिनेमाई सूखे को तारीफों और अवॉर्ड की झोलियों से भर दिया जाएगा। साल 2018 में 66वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरूस्कारों में राजस्थान के इतिहास में पहली बार नेशनल अवॉर्ड पाने वाली इस फ़िल्म को 2018 के बाद से अभी तक किसी खरीददार का न मिलना भी यह बताता है कि यहां के सिनेमा के प्रति किसी में रुचि नहीं है। अब भले फ़िल्म मेकर्स कितनी ही कोशिशें करके उस सूखे को खत्म करने की चेष्टा करें।

जी5 पर जाते हुए साल 2021 के आखरी में एक बेहतरीन फ़िल्म को ओटीटी पर्दे पर देख पाना सुखद अनुभव है। जब सिनेमा आपको इस कदर अपने में जकड़ ले कि आप उसके साथ लम्बे सफर पर चल पड़ें तो ऐसे सिनेमा का साथ अच्छा होता है। यूँ ऐसी फिल्में फेस्टिवल्स की शान होती हैं। इस फ़िल्म को इससे पहले कई फेस्टिवल में भी दिखाया गया। जहां इसने कई अवॉर्ड अपने नाम किए। फिर वह ‘राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’ हो या ‘जागरण फ़िल्म फेस्टिवल’ या 14 वां ‘तस्वीर साउथ एशियन फ़िल्म फेस्टिवल’ या ‘देहरादून’ , ‘कोलकाता’ जैसे प्रतिष्ठित इंटरनेशनल फेस्टिवल इन सभी में तारीफें बटोरने के बाद भी इस फ़िल्म को खरीददार मिलने में इतनी देर होना यह इशारा करता है कि हम अभी भी तड़क-भड़क वाले सिनेमा की ओर ही अधिक आकर्षित होते हैं।

फ़िल्म अपने लुक, रंग-संयोजन, साज-सज्जा, वेशभूषा, सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड स्कोर, गीत-संगीत हर आकार-प्रकार के सिनेमा के रूप-ख़ाके में फिट नज़र आती है। साथ ही राजस्थान के सिनेमा में उस सूखे को भी ऐसी फिल्में निश्चित ही खत्म करेंगी जिनकी ओर आज भी उपेक्षा भरी निगाहों से देखा जाता है। ऐसी फिल्मों को देखने के बाद अगर आप पानी को बचाने की चेष्टा करने लगें और ऐसा सिनेमा देखकर प्रकृति के प्रति आपके अंदर मनोभाव जागृत होने लगें तो वह ऐसे सिनेकारों की सफ़लता बन जाती है। फिर भले उन्हें रिलीज हो पाने में दशक ही क्यों बीत जाएं।

अपनी रेटिंग – 4 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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