Sunday, December 5, 2021

रिव्यू: ‘जया’ की जयकार में आकंठ डूबी ‘थलाइवी’

जयललिता…. जिसे देश ही नहीं दुनिया भी जानती हैं लेकिन कुछ जया के नाम से तो ज्यादातर अम्मा के नाम से। जाने भी क्यों ना तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री जो रहीं। अपने दमों पर राजनीति में नया अध्याय लिखा। ‘अम्मा’ की उपाधि से मशहूर भी हुईं। अपने जीवन में प्यार भी खूब पाया तो नफ़रतें भी। भला ऐसे किसी शख्स पर फ़िल्म बनने से कैसे रह सकती है। आखिरकार लंबे समय से रिलीज के लिए अटकी पड़ी इस फ़िल्म को भी मानों अम्मा की मरहूम आत्मा का ही आशीर्वाद मिला है अब जाकर।

सिनेमा और राजनीतिक जीवन दोनों में अपना एक अलग मुकाम बनाने वाली जया के मुख्यमंत्री बनने के बाद के कारनामों से भी तमिलनाडु और ये देश भली प्रकार वाकिफ है। लेकिन फ़िल्म केवल उनके बचपन से शुरू होकर मुख्यमंत्री बनने तक का सफर ही तय करती है। ‘अजयान बाला’ की लिखी किताब ‘थलाइवी’ पर इसी नाम से यह फ़िल्म बनाई गई है। यह भी एक कारण हो सकता है कि हिंदी पट्टी के सिने निर्माताओं, निर्देशकों को इस फ़िल्म के लिए कोई बेहतर नाम न मिला हो।

खैर जया किसी पहचान की मोहताज नहीं, जनता के दिलों पर सदा राज किया है।

‘अगर तुम मुझे मां समझोगे तो मेरे दिल में जगह मिलेगी और अगर स्त्री समझोगे तो’…
‘पॉलिटक्स भी प्यार की तरह है दिखाना आसान है। मगर निभाना मुश्किल।’
‘पर्दे पर फ़िल्म औरत के बिना फीकी लगती है मगर जब वही पावर की पोजिशन पर आती है तो सबको मिर्ची लगती है।’

ये तीनों संवाद फ़िल्म की जान हैं। और कंगना रणौत इन्हें बोलती हैं तो यही लगता है कि जैसे जयललिता ही बोल रही हैं। इस तरह के कई संवाद और भी देखने को मिलते हैं। वैसे एक बात बता दूँ फ़िल्म का नाम ‘थलाइवी’ एक तमिल भाषा का शब्द है, जिसका मतलब होता है लीडर , नेता। अपने पूरे जीवन में असलियत में भी जया नेता बनकर दिखाती हैं। जब विधानसभा में उसे अपमानित किया जाता है तो अपने अपमान का बदला वह उसी पद पर पहुंचकर लेती है।

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बचपन में परिवार की जरूरतों को पूरा करने के इरादे से एक्टिंग में आने वाली यह लड़की राजनीति को अच्छा नहीं मानती लेकिन एक दिन वही अपने फ़िल्म के हीरो एम. जे. आर. के साथ काम करते-करते राजनीति में दिलचस्पी लेने लगती हैं। उसे अपने प्रेमी, पिता, दोस्त के रूप में समझने वाली जया उसे आदर्श मानती है। और एक दिन मुख्यमंत्री भी बनती हैं। फ़िल्म में बार-बार जो MJR सुनाई पड़ता है वह असल में MGR (एम. जी. आर) है। जया के असली जीवन की तरह ही उनके जीवन की इस कहानी और रिश्ते को कोई नाम देने से मेकर्स बचते हैं। इसलिए फ़िल्म अधूरापन भी परोसती है।

कुछ सीन बेवजह खींचे हुए और कहानी बेवजह बढ़ाई हुई भी लगती है। निर्देशन एम. विजय का कभी-कभी ढीला भी पड़ता है। लेकिन कंगना एक बार फिर अपने अभिनय से अपने आलोचकों के मुंह पर ताले जड़ती हैं। हालांकि कुछ सीन्स में कंगना जया न लगकर कंगना ही दिखाई देती है। लेकिन जब उसे फिर से देखते हैं तो गाड़ी हल्की सी लीक से हटकर वापस लाइन पर आ जाती है। इस फ़िल्म को निश्चित रूप से राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा जाएगा। और बेस्ट एक्टिंग का खिताब एक बार फिर कंगना की झोली में ही आएगा तो हैरान मत होइएगा। वहीं एम जे आर के रूप में अरविंद स्वामी को चुनना भी बेहतरीन फैसला है। करुणानिधि के रोल में नसार लुभाते हैं। भाग्यश्री, राज अर्जुन, मधु जैसे कलाकारों को काफी समय बाद देखना सुकूनदेह लगता है।

फ़िल्म के सभी गीत कहानी को आगे बढ़ाते हैं और प्यारे भी लगते हैं। बैकग्राउंड स्कोर, कैमरा, फ़िल्म का लुक, सिनेमैटोग्राफी, लोकेशन्स , बदलता हुआ तमिलनाडु सब तेजी से दिखता है और क्या खूब दिखता है। बावजूद तमाम छोटी-बड़ी कमियों के ये फिल्म एक महिला का मर्दवादी समाज से लड़कर अपने दम पर खड़े होने की कहानी भी दिखाती है। फ़िल्म अगर उनके निजी जीवन के कुछ पहलुओं को सामने लाती या मुख्यमंत्री बनने के बाद के उनके कुछ कारनामों को भी संकेत रूप में संक्षेपित करके बता जाती तो और बेहतर हो सकती थी।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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