Friday, September 17, 2021

रिव्यू: वादियों में पिघलता ‘शेरशाह’

कैप्टन विक्रम बत्रा, परमवीर चक्र से सम्मानित। शायद ही इस देश भारत और पड़ोसी मुल्कों में कोई होगा जो इस नाम से अनजान होगा। युवा जोश, जूनून, गर्म खून से लबालब भरे इस हिमाचली लड़के की कहानी फिल्मी पर्दे पर आए और लुभाए ऐसा हो सकता है? हां जी हो सकता है क्यों नही? जब करन जौहर सरीखे नाम ऐसी कहानियां कहेंगे तो लाज़मी है।

कैप्टन विक्रम बत्रा जो बचपन से ही ऐसा है कि अपनों से बड़ी उम्र के या कई लोगों से एक साथ भिड़ जाता है, पंगे लेने से नहीं डरता और जिसका मानना है कि कोई उसकी चीज छीन नही सकता। जिसे बचपन से ही पता है कि क्या बनना है। वह लड़का तो अवश्य अपने सपनों और दृढ़ इरादों से सबकुछ पा लेगा, असल जीवन में पाया भी उसने। लेकिन फिल्मी पर्दे पर पिघल गया। बचपन में फौजियों की कहानियां सुन-सुनकर बड़े हुए, हर फंक्शन में फौजी ड्रेस पहन कर जाने वाले विक्रम बत्रा जिस उम्र में देश के लिए कुर्बान हुए यकीनन उस उम्र में लोग दौलत, शोहरत, नाम कमाने के सपने-ख़्वाब बुनते हैं। लेकिन विक्रम बत्रा ने दूसरा रास्ता चुना। कठिन, मुश्किल लेकिन सदा के लिए अमर हो जाने वाला रास्ता।

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‘शेरशाह’ में इस कैप्टन के बचपन या युद्ध में लड़ने के सीन और कहानी को छोड़ दें तो कहीं भी कैमेस्ट्री-बायो-फ़िजिक्स का जोड़ नहीं बैठ पाता। आजादी का दिन हो और पर्दे पर वीरों की कहानियां न कहीं जाएं ऐसा भला कैसे हो सकता है। लेकिन अफसोस कि फिल्मी दुनिया वालों ने इन कहानियों का भी अमूमन कचरा ही बनाया है और हम भी उस कचरे को आसानी से हजम कर जाते हैं, इन शहीदों के नाम पर करन जौहर जो हल्कापन परोसते हैं अमेजन प्राइम के सहारे वह कुछ एक जगह छोड़ दिया जाए तो न तो हाथों में गर्माहट पैदा कर पाता है न ही क्लाइमेक्स या शहीद होते इन सैनानियों के दृश्यों को छोड़ आंखें नम कर पाता है।

हम सब जानते हैं कैप्टन विक्रम बत्रा की प्रेमिका डिंपल ने अपने जीवन में आजतक शादी नहीं कि है। लेकिन जब पर्दे पर इनकी प्रेम कहानी फिल्माई गई शेरशाह में तो न तो ये ठीक से अपनी कहानी को अंजाम दे पाए। और तो और जब गीत बजता है तो इनके आस-पास झूले अपने आप झूलने लगते हैं! ऐसे ही एक सीन में ट्रकों में आग लगी हुई दिखाई जाती है तो वह नकलीपन का अहसाह दिलाती है। इन सबका कारण कमजोर वीएफएक्स ही है। और एक बात बताओ यार ये फौज में फौजी लंबे बालों वाले कब से होने लगे? खैर पालमपुर के इस सीधे-साधे हिमाचली लड़के की कहानी भी सीधी-साधी बनकर रह जाए ऐसा हो सकता है भला?

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एक तो मुंबई में बैठे फिल्मकारों और लेखकों ने तय ढर्रा बना रखा है एक फौजी किरदार लो, उसका बचपन लो, उसमें प्रेम कहानी मिलाओ, परिवार वालों की नाराजगी मिक्स करो और अंत में उसे शहीद है तो शहीद दिखा दो या शादी के बाद जल्दी उसकी मौत दिखा दो। बन गई देशभक्ति फिल्मी दास्तां, दर्शक चाव से देखेंगे और हम उसकी आड़ में मलाई चाटेंगे। ऐसा ही इस शेरशाह के साथ किया गया है। आज तक ‘बॉर्डर’, ‘एल ओ सी कारगिल’ जैसी फिल्मों के मुक़ाम को कोई नहीं छू पाया है तो यही इसका सबसे बड़ा कारण है।

बेहतर होता विक्रम बत्रा के संघर्ष को थोड़ा दिखाया जाता। क्लाइमेक्स में थोड़ी और हकीकत परोसी जाती तो यह बस चंद मिनटों में जो नम आंखों के पानी को धो डालती है वह नमी कुछ देर तक बनी रहती। कैप्टन बत्रा और डिंपल की कैमेस्ट्री पर थोड़ा काम किया जाता। सिद्धार्थ मल्होत्रा और कियारा आडवाणी को थोड़ी इस मामले में ट्रेनिंग दी जाती तो फ़िल्म अच्छी हो सकती थी।

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अभिनय के मामले में कुछ एक जगह छोड़ दें तो सिद्धार्थ मल्होत्रा एक खूबसूरत, हॉट और यंग बॉय की इमेज से ज्यादा ऊपर नहीं उठ पाए। कियारा आडवाणी कुछ इक्कीस रहीं। साहिल वैद, मीर सरवर को छोड़ दें तो शिव पंडित, निकितिन धीर, पवन चोपड़ा, त्रिशान, अभिरॉय सिंह आदि जैसे अन्य साथी कलाकारों की फौज मिलकर इस फौजी की कहानी को मजबूत कंधा तो नहीं दे पाते लेकिन शहीदों की ऐसी कहानियां कही जाती रहें इस बात का संदेश जरूर दे जाते हैं। म्यूजिक, बैकग्राउंड स्कोर, फ़िल्म का लुक, कैमरा, लोकेशन, सिनेमैटोग्राफी, गीत-संगीत, एडिटिंग मिलाजुला असर छोड़ जाते हैं और फ़िल्म को वन टाइम वॉच का दर्जा भी दे जाते हैं।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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