Sunday, December 5, 2021

रिव्यू: सनकी लोगों के लिए ‘सनक’ का पीनट बटर

आप किसी बड़ी फ़िल्म में क्या देखते हैं? उसकी कहानी… एक्टिंग… डायरेक्शन… सिनेमैटोग्राफी और कैमरा तो छोड़ ही दीजिए।’ डिज्नी प्लस हॉट स्टार’ पर आज रात रिलीज हुई फ़िल्म ‘सनक’ की कहानी तो उतनी दमदार नहीं है जितना इसका एक्शन या मिली जुली सी एक्टिंग और ठीक-ठाक डायरेक्शन के अलावा बाकी डिपार्टमेंट।

कहानी एक्शन फिल्म में जिस तरह की होनी चाहिए वैसी ही है। एक लड़का जो किसी लड़की से प्यार करता है। शादी के बाद खूब सारे बच्चे करने जैसी बातें करता है बेतुकी सी। फिर इसी बीच वे एक मुसीबत में आ जाते हैं। तभी कहानी की पटरी दूसरे ही प्लेटफॉर्म पर दौड़ने लगती है।

ऐसा ही इसके साथ है। हीरो जिसने अपनी हिरोइनी को अस्पताल में भर्ती करवाया उसी अस्पताल में एक पुलिस अफसर की बेटी भी आई है अपने स्कूल के बॉयफ्रेंड के साथ जिसे पीनट बटर से एलर्जी हुई है। अब इसी अस्पताल में एक आदमी का इलाज चल रहा है जिसे कुछ लोग बचाने आए हैं। बचाने के लिए ही नहीं बल्कि वे अस्पताल में मौजूद बाकी लोगों की जान के दुश्मन भी बने हुए है। यह आदमी कौन है? क्यों ये आतंकीनुमा लोग उसे बचाना चाहते हैं? पुलिस अस्पताल के गेट पर है लेकिन अंदर नहीं आ सकती क्यों? एक बच्चा अस्पताल के किसी आदमी से ज्यादा समझदार है उसकी मदद से पुलिस आ भी गई अन्दर लेकिन हुआ क्या वह देखने के लिए आपको डिज्नी प्लस हॉटस्टार भईया का सब्क्रिप्शन चाहिए होगा।

फ़िल्म की कहानी तो हुई अब एक्शन की बात करें? एक्शन से भरपूर रहने वाली ‘विद्युत जामवाल’ की यह फ़िल्म और विद्युत के अलावा एक्शन फिल्मों के दीवानों के लिए विशेष तौर पर यह फ़िल्म इस हफ्ते ओटीटी पर आया बेहतरीन तोहफा है। हाँ कुछ सीन हजम न हों तो आप फ़िल्म के उन दृश्यों को आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन हम ठहरे समीक्षकों के लिए तो पूरी फिल्म देखनी जरूरी है। हमारे लिए अपना कोई पसंदीदा जॉनर भी तो नहीं। विद्युत के अलावा ‘नेहा धूपिया’ ही थी जो कुछ ठीक लगीं। ‘रुक्मणि मित्रा’, ‘चंदन रॉय सान्याल’, ‘चंदन रॉय’ , ‘डेनियल बल्कि’ , ‘इव हारालसोन’ छिटपुट अंशों में बढ़िया लगते हैं और फ़िल्म देखने लायक कभी लगती है तो कभी उसका पीनट बटर बन वह आंखों में एलर्जी पैदा करने लगता है।

‘सबकुछ ठीक हो जाएगा।’ , ‘ये सब चले जाएंगे।’ , ‘अच्छे दिन आएंगे।’ जैसी भावना रखने वाली फिल्म कुछ पल के लिए अपने गीत-संगीत और बैकग्राउंड की वजह से चखने लायक पीनट बटर भी बन जाती है। ‘आशीष वर्मा’ के लिखे को ‘कनिष्क वर्मा’ ने डायरेक्ट किया है। और उनके डायरेक्शन को सिनेमैट यानी सिनेमैटोग्राफी की है ‘प्रतीक देवरा’ ने। आर्ट डिपार्टमेंट हो, कैमरा हो, एडिटिंग हो, कास्टिंग हो सब मिलकर आपको एक्शन से भरते तो हैं कुछ भावनाओं की हिलोर भी एक-दो दे ही जाते हैं। लेकिन यह फ़िल्म सिर्फ और सिर्फ एक्शन के लिहाज से देखी जाए तो आप इसका पूरा फायदा उठा सकेंगे। और आपके समय के साथ-साथ मनोरंजन का भी पैसा वसूल होगा। बेवजह की मार-धाड़, खून-खराबे, गोलियों की आवाजों से डरकर कांपने वाले लोगों के लिए चेतावनी वे दूर ही रहें। इसके अलावा कुछ सनक चढ़े हुए लोगों से वैसे थोड़ा दूरी ही बरतनी चाहिए फिर वे चाहे आपके लिए सनकी हों या आपके ख़िलाफ़ सनकी होकर सोचते, बोलते, करते हों।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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