Sunday, December 5, 2021

रिव्यू: जज़्बा, जिद और जीत का नाम है ‘रॉकेट रश्मि’

हमारे देश में महिलाओं को हमेशा अलग नजरिये से देखा गया है। हमेशा उन्हें कमतर समझा गया या फिर उन्होंने मर्दों की बराबरी की या फिर उनसे कहीं आगे निकल गईं तो उन्हें भी हम सबने मर्द कहना शुरू कर दिया। हम कब जाकर ये बात समझ सकेंगे कि एक औरत औरत होती है। वह मर्द कभी नहीं हो सकती बल्कि वह तो मर्द से कहीं ज्यादा ऊपर है। हमेशा अपने हृदय से ममता, दया, करुणा के भाव परोसने वाली स्त्री के अंदर महान होते हुए भी साधारण इंसान के भाव भी अंदर पोसती है।

एक साधारण से परिवार की लड़की रश्मि। बड़े सपने पाले हुए है। जिसके लक्षण बचपन से लड़कों जैसे रहे हैं। आदतें भी कुछ उनके जैसी। लेकिन एथलीट है क्या खूब दौड़ लगाती है। दौड़ में मेडल जीतकर देश का और अपने गांव का नाम रोशन कर दे ऐसा करती भी है। दिन रात मेहनत करके रश्मि एथलीट बन भी जाती है। दौड़ में जीते पुरुस्कारों से घर की अलमारी सज जाती है। लेकिन जल्दी ही रश्मि की दुनिया उलट जाती है। जब उसका जेंडर टेस्ट कराया जाता है। कुछ ऐसा रिजल्ट आता है कि लोग उसका बहिष्कार करने लगते हैं। रश्मि उम्मीद छोड़ देती है। लेकिन रश्मि की मां उसकी शक्ति बनती हैं। जिस मां ने उसे पहले तो सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान लगाने को बोला था। वहीं बाप जो उसे अपनी मर्जी करने देता है। और छोटी सी तो मर्जी है आजाद हवा में उड़ना चाहती है वो। अब एक दिन अचानक षड्यंत्र में फंसी रश्मि, बरसों बीत जाने के बाद उसने केस लड़ा ही नही है। बल्कि जीतकर कई अन्य खिलाड़ियों के लिए भी रास्ते खोले। आखरी बार जब दौड़ लगाती है तो वह प्रेग्नेंट होती है। क्यों है न जज्बे, जिद और जीत की कहानी।

एक औरत क्या-क्या कर सकती है यह फ़िल्म तो महज एक बानगी है। एथलीटों की जिंदगी से निकली इस फ़िल्म की कहानी कहती है कि दुनियाभर की महिला एथलीटों को नियमित रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनका लिंग परीक्षण किया जाता है। कैरियर तो खराब होता ही है, समाज में बदनामी, बेइज्जती और रुसवाई अलग से मिलती है। खेलों में कई वर्षों से चली आ रही लिंग परीक्षण की उसी पुरानी प्रक्रिया से लड़ने के लिए यह फ़िल्म आवाज उठाती है। यह बताती है कि टेस्ट किसी की काबिलियत तय नहीं कर सकते ना ही किसी की पहचान पर सवालिया निशान लगा सकते हैं।

जरूरत है तो हमें बदलने की, हमारे लिए बनाए गए पुराने नियमों को तोड़ने की जो रूढ़ियों में जकड़े नजर आते हैं। लिंग परीक्षण तो खेलों में होता ही है बल्कि उससे पहले मां के गर्भ में आज भी चोरी-छिपे लिंग परीक्षण किए जाते हैं। हमारी इस दुनिया में ऐसे कई खिलाड़ी हुए हैं ‘माइकल फिलिप्स’, ‘उसेन बोल्ट’ , ‘वीरेंद्र सहवाग’ जिनके खेलने के तौर-तरीकों नही तो उनके शरीर की बनावट या हार्मोन्स को लेकर सवालिया निशान लगाए गए। उन्हें कठघरे में खड़ा किया गया। लेकिन जब यही लड़की के साथ हो रहा होता है तो उसके लिए यह और अधिक कष्टकर हो जाता है कि वह अपने औरत होने का ही प्रमाण दे। मतलब हमने मान लिया है कि कोई भी बड़ा काम औरत कर ही नहीं सकती। यह फ़िल्म ऐसी सोच रखने वालों और उच्च पदों पर बैठकर ऐसे नियम बनाने वालों के लिए एक सीख तथा संदेश है कि अब उन्हें इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए।

रश्मि रॉकेट बनी तापसी पन्नू द्वारा अभिनय के साथ-साथ फ़िल्म में अपनी बॉडी पर भी ज़बरदस्त की गई मेहनत झलकती है। दुनिया के तानों को सुनकर अपनी बेटी के सपनों को पूरा करने वाली मां के रोल में सुप्रिया पाठक ने कमाल किया है हमेशा की तरह। हाल ही में ‘अनकही कहानियां’ में दिखे अपने हथौड़ा त्यागी यानी अभिषेक बैनर्जी फ़िल्म में वकील की भूमिका में हैं वे भी अपने काम से आपको खुश करते हैं। साथ ही साथ तापसी के अपोज़िट फ़िल्म में आपको प्रियांशु पैन्यूली भी नज़र आएंगे। प्रियांशु के साथ’मिर्ज़ापुर’ में नज़र आईं श्वेता त्रिपाठी की भूमिका फ़िल्म में कम रही लेकिन बेहतरीन साथ निभाया उन्होंने।

‘रश्मि रॉकेट’ को तमिल सिनेमा की डायरेक्टर-राइटर नंदा पेरियासैमी ने बहुत ही सुंदर तरीके से लिखा है। इससे पहले नंदा ‘माथी योसी’ जैसी तमिल भाषा की शानदार फ़िल्में डायरेक्ट भी कर चुकी हैं। फ़िल्म में डायलॉग लिखे हैं ‘हसीना दिलरुबा’ की राइटर कनिका ढिल्लों और अनिरुद्ध गुहा ने। तो आपने वो फ़िल्म देखी है तो इस फ़िल्म को देखकर आपको उनके डायलॉग्स से प्यार हो जाएगा। इस एक अच्छी, और परिवार के साथ देखने लायक फ़िल्म को डायरेक्ट किया है आकर्ष खुराना ने। बाकी फ़िल्म में अमित त्रिवेदी के म्यूजिक का साथ भी आपको फ़िल्म के साथ बहाकर ले जाता है। जब कोई फ़िल्म इस तरह आपको अपने साथ बहाकर ले जाती हो तो बह जाना चाहिए उसके साथ। क्योंकि ऐसी फिल्में सोच बदलती हैं, हमें फिर से विचारने पर मजबूर करती हैं। साथ ही सिखाती है कि महिलाएं चुप हैं तो हमें ये नहीं समझना चाहिए वे कमजोर हैं। या लड़ नहीं रहीं तो ऐसा नहीं समझना चाहिए कि वे लड़ नहीं सकतीं।

अपनी रेटिंग – 4 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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