Wednesday, August 10, 2022

रिव्यू- उलझे रिश्तों का कॉकटेल ब्‍लंडर ‘ऑड कपल’ में

फिल्म रिव्यू ‘ऑड कपल’ (Movie Review Odd Couple)

‘अमेजन’ प्राइम ओटीटी पर आज रिलीज हुई ‘ऑड कपल’ उलझे हुए रिश्तों को आज किस तरह निर्देशक, निर्माता, लेखक, एडिटर आदि की टीम ने सुलझाने की कोशिश की है आईये जानते हैं बॉलीवुड लोचा के इस रिव्यू में।

महानगर मुंबई में कुछ लोग कोई पंजाबी, कोई बिहारी, कोई साउथ इंडियन। फिल्म का पहला ही सीन देखिये वे कोर्ट में खड़े हैं और तलाक चाहते हैं। कारण की शादी कोर्ट में ही की लेकिन लड़कियों के नाम एक से होने पर कोर्ट गलती कर बैठा। जवान लड़का लड़की और उधर अधेड़ उम्र का एक रिश्ता। दोनों का जुड़ गया क्रॉस कनेक्शन। फिर जब ऐसा हो तो हम और आप बहुत बार रिश्तों को कस कर पकड़ लेते हैं जबकि उन्हें पकड़ने की उन्हें समझने की जरूरत होती है। सही समझना बहुत जरूरी है खास करके रिश्तों को।

अब दूसरा सीन देखिये फिल्म का कोर्ट का ही सीन लेकिन ये मिस मैच कपल अब हिचक रहे हैं उन्हीं रिश्तों को लेकर जो उन्होंने बनाए थे और जो कोर्ट ने बना दिया। इन दोनों के अलावा कुछ ऐसे ही कोर्ट के केस और भी नजर आते हैं जिनका आपस में रिश्तों के बीच कॉकटेल ब्‍लंडर हो रखा है।

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फिल्म अपने पहले हाफ से ही आपको पकड़ तो लेती है और इसमें बीच-बीच में आने वाला गीत-संगीत फिल्म की गति को लगातार बराबर पटरी पर बनाए रखता है। बावजूद इसके फिल्म के शुरुआती आधे घण्टे को यदि आप थोड़ा सा सब्र कर देख लें तो उसके बाद यह फिल्म फेस्टिवल फिल्म जैसा अहसास कराती है।

हालांकि इससे पहले भी यह कई नेशनल, इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सराहना तथा कुछ अवार्ड भी अपने नाम कर चुकी है। इस साल के शुरुआत में राजस्थान, जयपुर में हुए जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा रही यह फिल्म अब अमेजन प्राइम पर आई है।

जिसके निर्माता हैं ‘प्रणीत वर्मा’ तथा इसकी कहानी को प्रणीत के साथ मिलकर लिखा है इसके निर्देशक ‘प्रशांत जौहरी’ ने। ‘प्रशांत’ के निर्देशन में आई यह पहली फिल्म इतना जो दिखाती, बताती ही है कि उनमें कहानियों के कहन का स्तर अच्छा है और किस तरह उन्हें पेचीदा बनाए रखकर भी पकड़ कर रखना है यह भी वे अच्छे से जानते हैं।

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एडिटिंग के मामले में पचास से ज्यादा खूबसूरत फिल्मों को अपनी कैंची से संवार चुके ‘प्रकाश झा’ इस फिल्म में भी अपना एडिटिंग का वही कमाल तो दिखाते हैं जिसे देखने के आदी आप लोग हो चुके हैं। फिर भी कहीं-कहीं एक-दो शुरुआती लम्हों को और खूबसूरत बनाया जा सकता था। मसलन ये बिहारी भाषा के संवादों को बोलते समय बहुधा ऐसा लगता है कि उनमें और थोड़ा वजन लाना चाहिए। वरना दक्षिण भारत के लोग तो पूरी तरह ठीक से हिंदी नहीं बोल पाते उनसे भी भोजपुरी में कुछ बुलवा लेना जाना थोड़ा कमी का अहसास दिलाता है।

‘सृजित बसु’ की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के दूसरे हाफ में ज्यादा चमक बिखेरती नजर आती है। वहीं ‘जय राजेश आर्य’ का दिया गया संगीत और बैक ग्राउंड स्कोर फिल्म के हर लम्हें के अनुरूप है। ‘मनोज पाहवा’ , ‘दिव्येंदु’ , ‘विजय राज’ , ‘सहर्ष कुमार शुक्ला’ आदि का अभिनय उम्दा रहा है। विजय राज और मनोज पाहवा जैसे कलाकार किसी फिल्म में हों और उन्हें साथ मिले दिव्येंदु जैसे नये तथा उम्दा कलाकारों का तो फिल्म में नजर आने वाली किसी भी तरह की हल्की-फुलकी कमियों पर पर्दा डाल देना बेहतर रहता है।

सुमित गुलाटी, प्रणति राय प्रकाशी, सुचित्रा कृष्णमूर्ति, सत्यकाम आनन्द, नेहा नेगी आदि फिल्म को सहारा देने का बखूबी काम करते हैं। रिश्तों के उलझे हुए कॉकटेल ब्‍लंडर वाली ऐसी फिल्मों में स्क्रिप्ट, डायलॉग आदि के कॉकटेल मसाले थोड़े अच्छे से मिक्सअप किए जाने की सम्भावना जरूर बरकरार रह जाती हैं।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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