Monday, October 25, 2021

रिव्यू: ज़ख्मों पर मरहम लगाती ‘मुंबई डायरीज़’

26/11 मुंबई के हमला से आज कोई भी अनजान नहीं है। करीबन एक दशक पहले हुई यह घटना जितनी न्यूज़ चैनलों, न्यूज़ पेपरों में छाई रही उतना ही मुंबई में ही बैठे फ़िल्म मेकरों के दिमाग में भी छाई रही है। अब तक कई फिल्में, सीरीज इस मुद्दे पर बन चुकी है। लेकिन हर बार उन्होंने हमारे ज़ख्मों को हरा ही किया।

लेकिन इस बार मुंबई डायरीज़ के निर्देशक निखिल अडवाणी और निखिल गोंसाल्विस और लेखक, क्रिएटर, स्क्रिप्ट राइटर ‘यश’, ‘निखिल गोंसाल्विस’, ‘अनुष्का मेहरोत्रा’ तथा ‘संयुक्ता चावला शेख’ के लिए डायलॉग्स ने मिलकर ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन पर मरहम बख़्शा है। मरहम भी नए नजरिए से, वह नजरिया है उन डॉक्टर्स का सहयोग जो उस रात के बाद कई दिनों तक हमले में ज़ख्मी हुए लोगों के इलाज में लगे रहे। फिर भले वो प्रेस का आदमी हो, पुलिस का या आतंकवादी ही और आम आदमी।

सीरीज की कहानी शुरू होती है बॉम्बे जनरल हॉस्पिटल से। जहां रोज़ की तरह 26/11 की सुबह भी आम जीवन की तरह शुरू हुआ। इस हॉस्पिटल में काम करने वालों की निजी ज़िंदगियां भले ही कितने उलझी हों लेकिन वे मरीजों का इलाज करते हैं। इनमें कुछ तो नए आए हैं तो दूसरी ओर एक काबिल डॉक्टर भी है कौशिक ओबेरॉय, जो पेशेंट्स की जान बचाने के लिए किसी तरह की परवाह नहीं करता।

इस डॉक्टर की पत्नी अनन्या घोष ताज पैलेस में ही काम करती है। दोनों के आपसी रिश्ते भले आखरी सांस ले रहे हैं लेकिन डॉक्टर लोगों के जीवन को सांसे देने की भरपूर कोशिश करता है। शाम होते ही हॉस्पिटल में मरीजों की संख्या अचानक तेज़ी से बढ़ने लगती है। मुंबई में आतंक मच रहा है, मौत का नंगा नाच हो रहा है। लेकिन डॉक्टरों, नर्सों के लिए ये मायने नहीं रखता कि सामने मरीज कौन है। इस आतंक की रात में निभाए गए फर्ज़ और जज़्बात की उधेड़बन को ही ‘मुंबई डायरीज़’ में आठ एपिसोड्स में दिखाया गया है।mumbai diaries 26/11 web series download leaked by tamilrockers

‘मुंबई डायरीज़’ मरहम तो लगाती है लेकिन इस बीच भूल जाती है अपनी खामियों को मसलन ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के नाम के हथियार का बेजा इस्तेमाल अखरता है। तो दूसरा ऑक्सीजन किट लगाने के लिए मरीज से पूछना की उसका ब्लड ग्रुप क्या है? हालांकि ऐसी कई डॉक्टरी तकनीकी खामियां और भी नजर आती हैं जिन्हें इस पेशे से जुड़े लोग ही करीने से पकड़ सकेंगे। कई सीन्स एकदम काल्पनिक भी दिखाई देते हैं। जिसके कारण सीरीज में रियल इवेंट जैसी बातें नजर नहीं आती जिसके कारण यह आभासी होने का अहसास भी दिखाती है। एक बड़ी बात उन आतंकियों के नाम भी काल्पनिक कर देना खलता है।

सीरीज में मोहित रैना ने एकदम सधा हुआ अभिनय किया है। इस सीरीज़ में भी हमेशा की तरह धार्मिक भेदभाव, जातिवाद, पुरुषवादी सोच को बड़े यह सीरीज साफ दिखाती है। न्यूज़ रिपोर्टर मानसी हिरानी के रोल में ‘श्रेया धन्वंतरी’ रिपोर्टर के रूप में जानदार रहीं। डॉ० चित्रा दास के रोल में ‘कोंकणा सेन शर्मा’ घरेलू हिंसा से लड़ने की कोशिश करती महिला के किरदार से न्याय करती है। ‘नताशा भारद्वाज’, ‘अहान मिर्ज़ा’, ‘मृण्मयी देशपांडे’, ‘प्रकाश बेलावादी’ स्पेशल मेंशन करने वाले एक्टर ‘संदेश कुलकर्णी’ सभी ने अपना-अपना काम अच्छे से किया।

सीरीज के कुछ डायलॉग्स अच्छे हैं जैसे कि ‘हम मेडिकल प्रोफेशनल्स हैं। हम किसी की फितरत देख कर नहीं, उसकी नब्ज़ देखकर इलाज करते हैं।’, ‘औरतें मर्दों से बेहतर क्राइसिस हैंडल करती हैं।’ , ‘अफ़सोस करना ज़रूरी है लेकिन उतना ही ज़रूरी है आगे बढ़ना।’ , ‘हम डॉक्टर्स हैं ह्यूमन बॉडी देखते हैं, ह्यूमन करैक्टर देखना हमारा काम नहीं है।’ कई छोटी-मोटी कमियों के चलते और सीरीज की थोड़ी सी ज्यादा लंबाई के बावजूद भी कैमरे के कमाल के साथ तैयार हुई ‘मुंबई डायरीज़ 26/11′ देखी जानी चाहिए। मोहित रैना, कोंकणा सेन शर्मा, मृण्मयी देशपांडे कास्टिंग के रूप में कास्टिंग डायरेक्टर का चुनाव करना अच्छा रहा।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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