Saturday, September 24, 2022

रिव्यू: भटकी, अटकी और सटकी हुई फ़िल्म है ‘लूप लपेटा’

एक एथलीट लड़की दौड़ में जीत न सकी तो सुसाइड करने लगी। जिस अस्पताल की दसवीं मंजिल से मरने का सोचा वहीं ऊपर एक लड़का धुंआ उड़ाने आ गया। धुंआ उड़ाने! अरे भाई स्मोकिंग करने। अब उस लड़की को तो उसने बचा लिया। लेकिन क्या सच में वह बची? अब जनाब लड़की को लड़के से और लड़के को लड़की से इश्क़ हो गया। वल्लाह! ये सिनेमा भी ना। अपनी घिसी पिटी आदतों से बाज नहीं आता। उफ़्फ़… उफ़्फ़… ये क्या अरे भाई ये तो जर्मनों का कमाल है! अरे यार है तो सिने मा ना? क्या इंडियन, क्या जर्मन? क्या हम बॉलीवुड ने ही ये सब दिखाने का ठेका लिया हुआ है? ख़ैर नाराज न होइये। क्या करें फ़िल्म ही ऐसी हटेली, भटकेली और झटकेली है।

अब आगे सुनिए उसका बॉयफ्रेंड जो अपने बॉस विक्टर के लिए काम करता है। उसे विक्टर ने किसी के पास से 50 लाख रुपये का बैग लाने को भेजा और बैग लाने के लिए उसके पास समय है 80 मिनट। उसी के अंदर वो बैग लाना है। सत्या की लापरवाही के चलते उससे वो बैग खो जाता है। अब सवी उसकी एथलीट गर्लफ्रैंड दौड़ती रहती है जिसके पास सिर्फ 50 मिनट हैं। किसी भी तरह 50 लाख रुपये अरेंज करने के लिए। अब क्या वे रुपए का इंतजाम कर सकेंगे? या कुछ नया मोड़ लेगी कहानी? और जर्मन बेकरी से निकली रीमेक कमाल करेगी?

लाइन टू लाइन, सीन टू सीन जब लगभग सारा एक जैसा हो तो तब तो तारीफ़ बनती है न बॉस? अरे यार आप भी न अच्छा मजाक करते हो। कॉपी किया? रीमेक किया? ऑफिशियल रीमेक किया? जो भी किया बस उसमें अपना थोड़ा सा जो माइथोलॉजिकल ज्ञान घुसाया उसने जरूर थोड़ा हम पर तरस खाया।

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खैर ‘रीचर’, ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ और ‘रॉकेट बॉयज़’ इस हफ़्ते ओटीटी पर जमकर मसालों का छिड़काव हुआ है। अब देखते रहिए। ये तो थी रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ के नाम। पर इन सबके बीच एक फिल्म भी आई। और लेकर आए नेटफ्लिक्स भईया। फिल्म का निर्देशन किया है आकाश भाटिया ने, और लीड रोल में तापसी पन्नू, ताहिर भसीन, दिब्येंदु भट्टाचार्य और श्रेया धन्वंतरी जैसे नामी एक्टर्स हैं। ‘लूप लपेटा’ को 1998 में आई जर्मन फिल्म ‘रन लोला रन’ का ऑफिशियल हिंदी रीमेक बताया जा रहा था। जैसा ऊपर मैंने कह ही दिया। और ये भी कह चुका हूं कि ये फिल्म ओरिजिनल वाली की शॉट-टू-शॉट रीमेक है और एक बढ़िया अडप्टेशन।

‘रश्मि रॉकेट’ में तापसी पन्नू ने जो एथलीट वाली परफॉर्मेंस दी थी उसी के जैसा कुछ यहां भी परोसा है। ‘लूप लपेटा’ भले ही एक कल्ट जर्मन फिल्म का रीमेक है, लेकिन इसे इंडियनाइज़ करने की कोशिश भी की गई है माइथोलोजी से।

फ़िल्म में कैमरावर्क, कलरिंग, शॉट्स आदि बड़े करीने से सजे हुए हैं लेकिन फिल्म का जो मेन प्लॉट था कि 50 मिनट में सवी सत्या की हेल्प कैसे करेगी। एक तो टाइम कम, ऊपर से इतना बड़ा जुगाड़। सवी क्या करेगी, सत्या कैसे बचेगा, फिल्म किसी भी पॉइंट पर ये जिज्ञासा क्रिएट नहीं कर पाती कि आप इन सवालों का जवाब जानना चाहेंगे। उन दोनों को अपनी इस भागदौड़ के दौरान जो जो बीच रास्ते कैरेक्टर्स मिलते हैं, फिल्म उनको कहानी में जोड़ती जाती है और इसी वजह से इसकी लम्बी लाइन लेंथ आपको थकाती है।

फ़िल्म में लेखन की कई जगह हालांकि कमजोरी भी नजर आती है। ताहिर बने हैं कम समझ वाला सत्या उसका बॉयफ्रेंड, जो बिना सोचे समझे काम करता है। लेकिन अपने स्माइली फेस से उसने एक्सप्रेशन बढ़िया बनाए हैं। ‘लूप लपेटा’ हालांकि कुछ जगह आपको हंसाएगी लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ जगह या मिनटों के लिए ही। दो घंटे 10 मिनट की फिल्म देखने के बाद लगेगा कि सवी और सत्या की कहानी के अलावा हर चीज को फ़िल्म में जगह मिली है। डायरेक्टर को अभी डायरेक्शन के गुर सीखने जरूरी हैं कि कैसे कहानी का इस्तेमाल किया जाए? कैसे कहानी लिखवाई जाए? कैसे जो छोटी-छोटी सी कमियां हैं उन पर ध्यान दिया जाए। वरना वे ऐसे बड़ी नजर आने लगती हैं।

अपनी रेटिंग – 2 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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