रिव्यूज

रिव्यू: अपुन को ‘लाइफ़ इज गुड’ ईच मांगता

Written by Tejas Poonia

Movie Review Life Is Good: हाल में कुछ इंटरनैशनल फिल्म समारोहों में चर्चा का विषय रही जैकी श्रॉफ की फिल्म ‘लाइफ इज गुड’ 9 दिसंबर से सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।

फिल्म का पहला सीन देखिए रामेश्वर यानी जैकी श्रॉफ अपनी मां की यादों में खोए हुए जिन्दगी से निराश हो चला है और जिन्दगी खत्म करने की कोशिश कर रहा है। तभी एक पड़ोस में आई नई किरायदार फैमिली की छोटी सी बच्ची की खेलते हुए बॉल उसके घर में आ गिरी और उसकी जिंदगी बच गई। कैसे? वो फिल्म देखकर पता चलेगा।

अपने जीवन में अकेला रामरेश्वर अब उस बच्ची को अपना दोस्त बना लेता है या कहें बच्ची उसे अपना दोस्त बना लेती है। फिर फिल्म उस जिंदगी के बारे में बात करती है जिसमें सबको किसी न किसी से कोई न कोई उम्मीद है। लेकिन जब उनकी वे उम्मीदें टूटती हैं तो इंसान बिखरने लगता है। और जिन्दगी को कछुए सी जीने की बातें करने लगती फिल्म जीने का मकसद भी सीखाती है।

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फिल्म कहती है आप अपने जीवन में बस प्यार कीजिए किसी से भी कीजिए। आस पास के लोगों से प्यार कीजिए। प्रकृति से कीजिए, रिश्तों से कीजिए और यह प्यार ही है जो इंसान को आगे ले जाता है। बस वही प्यार पोस्ट ऑफिस से निकल कर घरों में आया है इस फिल्म में।

जैकी श्रॉफ के अभिनय के लिए देखी जानी चाहिए

यह फिल्म जैकी श्रॉफ के अभिनय के लिए देखी जानी चाहिए। क्योंकि जैकी हिंदी सिनेमा के उन गिने चुने फिल्मी सितारों में से हैं जो हमेशा सकारात्मक बातें ही पर्दे पर आज तक करते दिखे हैं। जिंदगी खूबसूरत होती है और जिंदगी के हर एक एक पल को शिद्दत से जीना चाहिए। जैसी बातें करने वाले जैकी की फिल्म भी यही कहने बताने आई है।

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अवसादों में घिर चुके लोगों को ऐसी फिल्में जीने का मौका देती हैं। जब भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोग रिश्तों को भूल जा रहे हैं और इसके चलते वे अवसादों में घिर जा रहे हैं तो उन्हें यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। जैकी अपने किरदार को तो बखूबी जीते ही हैं फिल्म में साथ ही उनका भरपूर साथ दिया है रजित कपूर, मोहन कपूर, दर्शन जरीवाला आदि ने।

आम मुंबइया फिल्मों से हटकर ठहरा हुआ सिनेमा देखने वालों, फेस्टिवल सिनेमा पसन्द करने वालों को यह भाएगी। निर्देशक अनंत महादेवन इससे पहले सामाजिक विषयों की कहानियों को बड़े ही संवेदनात्मक और रोचक तरीके से पेश करते आए है। ‘मीसिंधुताई सकपाल’ , ‘गौरहरि दास्तां’ , ‘माईघाट’ , ‘बिटर स्वीट’ जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान रखने वाले अनंत व्यावसायिक फिल्मों से इतर कुछ बेहतर देने का प्रयास करते आए हैं। इन प्रयासों में वे सफल भी दिखे हैं।

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ऐसी फिल्मों को अपने साथ संजोकर रखना चाहिए और जब संजोए गए सिनेमा से आप उसका हाथ थाम आगे बढ़ने लगते हैं तो आपका जीवन सिनेमा से जिन्दगी की सीख देता है। और फिर आप उसे देखकर उससे सीख लेकर यही कहेंगे अपुन को लाईफ इज गुड ईच मांगता है। क्योंकि लाइफ गुड है तो सब गुड है इस फिल्म की तरह।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

About the author

Tejas Poonia

लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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