Wednesday, January 19, 2022

रिव्यू: शून्य में ले जाकर छोड़ती है ये ‘लाठी’

हमारे देश में बूढ़े लोगों को लेकर बड़ी समस्या है। और इस विषय पर समाज, सिनेमा, साहित्य सभी वर्ग के कुछ नुमाइंदे हमेशा चिंतित रहे हैं। सिनेमा में ‘रुई का बोझ’ नाम से एक बेहतरीन फ़िल्म भी बनी है। बाप ही एक मात्र ऐसी सम्पति होता है जिसके बूढ़ा होने पर हर बेटा दूसरे को सौंपना चाहता है।

साहित्य में वृद्ध विमर्श को लेकर काफी समय से चर्चा हो रही है। लेकिन सिनेमा में यह पहलू यदा-कदा ही सशक्त रूप में देखा गया है। ‘पटाखा’ तथा ‘कसाई’ जैसी चर्चित फिल्मों के लिए लेखन करने वाले, राजस्थान के प्रेमचंद कहे जाने वाले कथाकार ‘चरणसिंह पथिक’ की कहानी ‘सपने’ पर फ़िल्म निर्देशक ‘गजेन्द्र श्रोत्रिय’ ने फ़िल्म ‘कसाई’ बनाने के बाद ‘लाठी’ नाम से शॉर्ट फिल्म कह सकने योग्य बड़ी शॉर्ट फिल्म का निर्देशन किया है।

40 मिनट की यह फ़िल्म जयपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में पहली बार दिखाई गई है। लेकिन यकीन मानियेगा ऐसी फिल्में समाज के साथ-साथ सिनेमा की भी मजबूत लाठी बनकर सामने आती है। दरअसल ये कहा जाए कि बूढ़े लोगों के दुःख, दर्द को अपने में समेटते हुए उनके सपनों को जीती है। तथा उनके जीवन के अंतिम दौर में उनकी ही औलादों द्वारा तिरस्कृत किए जाने का दंश जो इस फ़िल्म के पात्र झेलते हैं वह हमारे ही समाज में हमारे ही सामने हजारों-लाखों की संख्या में देखने को मिल जाएंगे।

Laathi full movie download

इस फ़िल्म के निर्देशक गजेंद्र श्रोत्रिय ने इससे पहले ‘पिकनिक’ , ‘भोभर’ , ‘कसाई’ जैसी चर्चित फिल्मों से अपनी निर्देशन कला को भी साबित किया है। ‘मनमोहन कसाना, जनित जैन , प्रमोद पाठक, कृष्णात्रेय आदि को निर्माता के रूप में देखना ऐसा लगता है कि राजस्थान के सिनेमा से जो नई बयार बहेगी उसमें इनका नाम भी शामिल किया जाएगा।

‘रमन मोहन कृष्णत्रेय’ वृद्ध ‘बंसी बाबू’ के रूप में फ़िल्म में अपना उम्दा अभिनय करते नजर आए हैं। जिस तरीके से उनकी उम्र है वह भी इसमें भरपूर सहयोग करती नजर आती है। ‘अनिता प्रधान’ मां के रूप में ‘सावित्री’ बनकर जो इस लाठी को अपने अभिनय से सहारा प्रदान करती है वही इस फ़िल्म की मजबूत कड़ी भी बन जाती है। ‘पवन’ के किरदार में सिद्धार्थ कुमावत’ तथा ‘रमन’ के किरदार में ‘अंकित शर्मा’ दोनों ने बेटों के अभिनय में वो काम किया है जैसा असल समाज में हम आम लोग करते हैं। एक नालायक सपने देखकर तो दूसरा अपनी आकांक्षाओं के कंगूरे खड़े करके जो लुक इस फ़िल्म को देते हैं वह काबिले-गौर बन जाता है।

योगेश नारंग ने इससे पहले ‘मूसो’ फ़िल्म के लिए सिनेमैटोग्राफी की है और इस फ़िल्म में भी वे सिनेमैटोग्राफी के आला मुकाम को छूते नजर आये हैं। बैकग्राउंड स्कोर, मेकअप, सेट, लोकेशन आदि तमाम कोशिशों को यह ‘लाठी’ काफ़ी मजबूती के साथ दिखाती है। ऐसा करते हुए यह आपको एक गहरे शून्य में भी छोड़ जाती है। जहां से आप इसे देखने के बाद कम-से-कम अपने घर में मौजूद बूढ़ों का ख्याल अपने दिमाग में लाने के लिए विवश हो उठें।

अपनी रेटिंग – 4.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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