Sunday, December 5, 2021

रिव्यू: प्रेम और संगीत का अनोखा ट्रिब्यूट ‘नाचोमिया-कुम्पासर’ में

अव्वल तो गोवा की भाषा कोंकणी में फिल्में बनती नहीं। बनती भी हैं तो उतनी देखी, दिखाई नहीं जाती। और अवॉर्ड की बात रहने ही दीजिए। लेकिन साल 2015 में आई कोंकणी फ़िल्म ‘नाचोमिया-कुम्पासर’ (Nachom-ia Kumpasar) इन सब मिथकों को सिरे से खारिज करती है। साथ ही 62 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (नेशनल अवॉर्ड) 2015 में तीन अवॉर्ड भी अपने नाम करती है। ‘सर्वश्रेष्ठ कोंकणी फिल्म’ , ‘सर्वश्रेष्ठ प्रोडक्शन डिजाइन’ का और
सर्वश्रेष्ठ महिला प्रदर्शन के लिए स्पेशल मेंशन किया जाता है ‘पालोमी घोष’ को।

यह फ़िल्म इतने पर ही थम कर नहीं रह जाती बल्कि 24 प्रतिष्ठित नेशनल-इंटरनेशल अवॉर्ड और 9 जगह नॉमिनेशन भी पाती है। और तो और ऑस्कर तक के लिए यात्रा करती है। अब आप कहेंगे भाई हमने तो देखा ही नहीं इसे, देखा तो छोड़ो सुना ही नहीं कि कोई ऐसी खूबसूरत फ़िल्म आई और चली गई। तो इसमें दोष हमारा अपना ही है। कि हमें बस तथाकथित बॉलीवुड के स्टार्स ही नजर आते हैं।

‘नाचोमिया-कुम्पासर’ (डांस टू द रिदम) 1960-70 के दशक में जब अपने यहां आर्केस्ट्रा सिस्टम चरम पर था। तब कि कहानी इस फ़िल्म में देखने को मिलती है। यह फ़िल्म गोवा के उन तमाम म्यूजिशियनों, सिंगरों, गीतकारों के लिए एक सच्चा ट्रिब्यूट (सच्ची श्रद्धांजलि) है। हालांकि इस फ़िल्म की कोई कहानी सटीक रूप से नहीं कही जा सकती। फिर भी शादी से लौट रहे एक बैंड को खुद को कुछ ‘ग्लैमर’ देने के लिए एक लेडी सिंगर की जरूरत महसूस होती है। तभी उन्हें डोना मिलती है। अब इनके बैंड के एक आदमी और डोना के बीच प्यार भी पनपने लगता है। लेकिन एक दिन डोना फांसी से लटकी मिलती है। (यह भी वास्तव में यह सचमुच की ‘लोर्ना’ की अफवाह बनकर भी उस जमाने में सामने आई थी।) इसके बाद उन्होंने सीधे 20 साल बाद जब मंच पर वापसी की तो तब भी उनकी आवाज में वही जादू नजर आता है जो तब आता था। इसलिए उसे गायन की दुनिया का नाइटेंगल भी कहा गया। (इस लोर्ना ने रफी साहब के साथ भी गाने गाए हैं।)

फ़िल्म गोवा के उन तमाम अनसुने म्युजिशयनों को याद करते हुए उनके बनाए दर्जनों गाने भी हमें दिखाती है।
फ़िल्म में पालोमी वह लोर्ना लड़की बनी है जो स्कूल, कॉलेज में गाती थी। जो बाद में म्युजिशयन बैंड के साथ मिलकर परिवार के लाख मना करने पर भी गाने लगी। और संगीत की इस दुनिया में रमती चली गई। इतना कि उसने सैंकड़ों गाने इस इंडस्ट्री को सचमुच में दिए।

लेकिन बॉलीवुड की आदत हमेशा से रही है कि उसने क्रेडिट उन लोगों को नहीं दिया। फ़िल्म ‘क्रिस पेरी’ और ‘लोर्ना’ की दु:खद प्रेम कहानी सुनाते हुए हमें संगीत की उस अद्भुत दुनिया में ले जाती है, जहां इसके बेहद खूबसूरत रेट्रो सांग्स सुनते हुए आप उसमें डूबते चले जाते हैं।

फ़िल्म में एक धुन ‘माई नेम इज एंथनी गोंजाल्विस’ की भी बीच-बीच में सुनाई पड़ती है। तब जब यह गाना बना था तो इस गाने के लिए क्रेडिट लिया ‘लक्ष्मीकांत प्यारेलाल’ ने जबकि यह सच है कि यह तो वास्तव में उनके गुरु, महान संगीतकार ‘एंथनी गोंजाल्विस’ का था। ‘गोंजाल्विस’ ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत परंपराओं में गहराई से खुद को तल्लीन किया हुआ था। यह बात बेहद कम लोग जानते होंगे। फ़िल्म में जैज़ इंस्ट्रूमेंट वादक चिक चॉकलेट ‘सी. रामचंद्र’ के गीतों का प्रभाव भी इस फ़िल्म में स्पष्ट झलकता है।

यह फ़िल्म पूरी तरह से उन अनसुने म्युजिशयन नायकों के बारे में है। यही वजह है कि यह फ़िल्म उनका एक दस्तावेज भी लगती है, जिनका समकालीन गोवा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण युग रहा है। कहा जाता है कि फ़िल्म के डायरेक्टर ‘बारड्रोय बैरेटो’ और उनकी टीम ने इस फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करने से इनकार कर दिया था। लेकिन जब यह रिलीज हुई नेशनल अवॉर्ड के बाद तो इसे गोवा में टैक्स फ्री कर दिया गया था।

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फ़िल्म 1960 और 1970 के दशक के जिन 20 लोकप्रिय कोंकणी गीतों के माध्यम से खूबसूरती से सामने आई है। उन गानों को फिल्म के लिए फिर से रिकॉर्ड किया गया है। करीबन 102 प्रोड्यूसरों की एक लंबी टीम इस फ़िल्म के साथ जुड़ी हुई है। जिसमें राजस्थान के रहने वाले ‘राधेश्याम पिपालवा’,’एंजेलो ब्रागंजा’, ‘माइकल ऑरेकल’ मुख्य रूप से शामिल हैं। बाकी सभी को-प्रोड्यूसर की भूमिका में नजर आते हैं।

इसके अलावा फिल्म में कोई बड़ी स्टार कास्ट नहीं है। सिवाए पालोमी घोष और विजय मौर्य को छोड़ दिया जाए तो। बल्कि तो कई नए अभिनेता और कई शौकिया तौर पर भी शामिल हुए नजर आते हैं। लेकिन किसी का भी अभिनय अखरता नहीं। ‘पालोमी घोष’ और ‘विजय मौर्य’ तो अपने अभिनय का जादू बिखेरते नजर आते हैं। पालोमी के जीवन का सबसे उम्दा अभिनय आपको इसमें देखने को मिलता है।

फिल्म वास्तविक घटनाओं पर आधारित 20 कालातीत गीतों के माध्यम से अपनी सुरीली कहानी बुनती है। जो गाने अक्सर फ्लेमेंको नर्तकियों के साथ होते हैं और जो कहानी कहने की भावनात्मक उथल-पुथल को मूर्त रूप देते हैं। यह फ़िल्म एक तरीके से आधी बायोपिक, आधी गोवा की सबसे बड़ी फिर भी बमुश्किल स्वीकृत विरासत में से एक को श्रद्धांजलि देते हुए प्रेम और संगीत की दुनिया को खूबसूरती से अपने में समेटती है। फ़िल्म की खूबसूरती इसके गानों के अलावा इसकी सिनेमैटोग्राफी, कैमरे, लुक, सेटअप, कॉस्ट्यूम, रंगों के प्यारे-प्यारे और हल्के आंखों में चुभन नहीं बल्कि सुकून पहुंचाने वाले से लगते हैं। ढाई घण्टे लंबी इस फ़िल्म को जब आप गोवा फ्लिक्स की वेबसाइट पर देखने बैठते हैं तो आपका मन कुछ और करने की गवाही नहीं देता।

इस फ़िल्म को मिले इंटरनेशनल अवॉर्ड में ‘लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल’ (2015) में ‘लेबरा प्ले ऑडियंस च्वाइस अवार्ड’ , ‘ब्रासोवा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव’ (रोमानिया) में सर्वश्रेष्ठ फिल्म, ‘वैश्विक संगीत पुरस्कार’ (अमेरिका) में सर्वश्रेष्ठ संगीत और ओरिजनल बैकग्राउंड स्कोर के लिए ‘रजत पदक’ , लोम्बार्डी अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (मिलान) में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक-विदेशी फिल्म, सर्वश्रेष्ठ साउंड डिजाइन, सर्वश्रेष्ठ बैकग्राउंड स्कोर, ‘यूनाइटेड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (हॉलीवुड, लॉस एंजिल्स) में सर्वश्रेष्ठ संगीत, ‘छठा दादा साहब फाल्के फिल्म महोत्सव’ (भारत) में सर्वश्रेष्ठ संगीत के साथ-साथ उत्कृष्टता का प्रमाण पत्र- सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ एडिटर, सर्वश्रेष्ठ पटकथा, सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी दिया गया था। इसके अलावा यह फेहरिस्त ऐसे ही विभिन्न कैटेगरी में बेहद लंबी है।

नोट- इस फ़िल्म पर प्रॉपर (उचित तरीके) से हिंदी में रिव्यू भी नहीं लिखा गया।

अपनी रेटिंग – 4.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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