Sunday, December 5, 2021

रिव्यू : संदेश देती है ऐसी फिल्में ‘जिन्ने जम्मे सारे निकम्मे’

जी5 के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर पंजाबी फिल्म ‘जिन्ने जम्मे सारे निकम्मे’ रिलीज हुई है। बधाई हो जैसी कहानी को अपने में समेटे यह फ़िल्म खासी सराही जा रही है।

एक सीन देखिए- बूढ़े मां-बाप जिनके बच्चे बड़े होकर उन्हें छोड़ अपने-अपने कामों में उलझे हैं। मां-बाप की चिंता फिक्र नहीं।

अगला सीन- वही बच्चे अब अपने मां-बाप के फिर से मां-बाप बनने की चिंता में घुलकर उनके पास रहना शुरू कर देते हैं।

यह फ़िल्म अपनी कहानी से कुछ साल पहले आई फ़िल्म ‘बधाई हो’ हो से प्रेरित नजर आती है। प्रेरित तो क्या अगर आप इसे उसी फ़िल्म का इसे पंजाबी रूपांतरण भी समझ लें तो भी गलत नहीं होगा। बावजूद इसके यह उसका पंजाबी रूपातंरण लगने के उससे अलग हो जाती है केवल अपने क्लाइमेक्स के चलते।

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अब जिन मां-बाप के चार बच्चे हैं। चारों अपनी लाइफ में अच्छे मुकाम पर लगभग पहुंच गए हैं। तो फिर उन मां- बाप को लय तकलीफ है? क्यों वे एक और औलाद यानी पांचवी औलाद चाहते हैं? क्या वाकई उन्होंने जिन्ने जम्मे सारे निकम्मे सीगे? क्या पांचवी औलाद आएगी? क्या वो आ गई तो उन पहले चार बच्चों के नाम आने वाली जमीन-जायदाद का एक और बंटवारा होगा? इन सब बातों के जवाब तो आपको जी5 के ओटीटी पर 14 अक्टूबर को आई इस फ़िल्म देखकर ही मिलेंगे।

यह फ़िल्म भले ही अपनी कहानी से बधाई हो सरीखी लगे लेकिन जैसा कि कहा पहले क्लाइमेक्स के चलते उससे अलग हो जाती है। और इस फ़िल्म के खत्म होने पर जो संवाद आता है वह एक कटु सत्य भी है।

मां पे सिरजे रब्ब ने, बख्शीश करी कमाल
जिन फुल्लां वांगु पाल्या हुण तू वी करीं सम्भाल

ऐसी फिल्में आपको भले ही आपको बीच-बीच में हंसाएं और रुलाएं लेकिन हंसाते रुलाते, आंखें नम करते हुए आपको एक संदेश जरूर दे जाती है। यह एक ऐसी पारिवारिक फ़िल्म है जिसे आप अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर निसंकोच देख सकते हैं। बधाई हो के साथ भी कुछ ऐसा ही था। फिर भी बहुतेरे परिवारों ने उसे अपने परिवार के साथ इंजॉय नहीं किया।

यह फ़िल्म कोई भाषण नहीं देती। न ही इसकी कहानी कोई महान है। परन्तु यह वो दे जाती है जो आप-हम अरसों से भूले बैठे हैं। इस फ़िल्म को देखने के बाद आप भी एकबारगी अपने मां-बाप को गले लगाना चाहोगे। क्या जो मां-बाप अपना सबकुछ त्याग कर, बच्चों के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देते हैं। उनके प्रति हमारा कोई हक नहीं बनता?

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फ़िल्म में अभिनय सबका कहानी के अनुरूप लगा। कोई भी ऊंचा-नींवा यानी कम ज्यादा नहीं लगता। सिनेमैटोग्राफी ठीक रही। कलरिंग के मामले में जरूर फ़िल्म कहीं-कहीं फिसलती है। एडिटिंग में कहीं कोई कमी नजर नहीं आती। निर्देशन में भी चूक नहीं होती। कास्टिंग भी ठीक की गई है। गाने ठीक हैं लेकिन ‘मां’ गाना आपकी आंखों को भरपूर नम करता है। और ऐसे गानों को बार-बार सुनने का दिल करता है। फिर इंतजार किस बात का जल्द देख डालिए आपके दिलों-दिमाग का बोझ तो हल्का होगा ही लेकिन उसके लिए एक काम कीजिएगा उस बोझ को हल्का करने के लिए मां-बाप के गले लग लीजिएगा जब भी मिलें उनसे या फिर दूर कहीं हैं तो फोन ही घुमा लीजिएगा।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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