Tuesday, September 27, 2022

रिव्यू : सशक्त महिलाओं की संवेदनाओं का ‘जलसा’

क्या आप तैयार हैं बिना किसी शोर-शराबे के जलसा देखने के लिए! जब हम फ़िल्म देखने जातें हैं तो शीर्षक पर ध्यान जरूर जाता है और हम थोड़ा बहुत अंदाजा भी लगा लेते हैं कि फिल्म की थीम क्या होगी? लेकिन जब जलसा फिल्म देखने बैठते हैं तो अंत तक समझ नहीं आता कि फिल्म का नाम जलसा क्यों है? और अंत का एक दृश्य जिसमें दीदी के जन्मदिन का जलसा मनाया जा रहा है, ढोल बाजों के बीच फँसी असहाय नायिका, तब इसके पीछे की प्रतीकात्मकता समझ आती है लेकिन उसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी, कि इस डैडी का क्या कनेक्शन है।

‘सुरेश त्रिवेणी’ निर्देशित जलसा फिल्म वास्तव में कुछ महिलाओं के इर्द-गिर्द घूम रही है और यह विधान सोच समझ कर गढ़ा गया है, सिर्फ महिला सशक्तिकरण के नाम पर फिल्म को नहीं बनाया गया बल्कि संवेदनाओं के पुंज की बची-खुची राशि जो महिलाओं के भीतर ही बची है, उसे उभारने के लिए कथा-फलक बुना गया है। आज चारों ओर युद्ध का माहौल है और युद्ध के केंद्र में पुरुष व उनका वर्चस्व व महत्वकांक्षाओं में निहित सत्ता की लड़ाई ही होती है जहाँ संवेदनाओं को तिलांजली दी जाती है। फिल्म में अलग-अलग सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि से आईं दो माएँ अपने भय, क्रोध, निराशा, असहाय स्थिति की असमंजसपूर्ण स्थिति को बखूबी अभिव्यक्त कर रहीं हैं। वे अपने-अपने अंतर्द्वंद्व को व्यक्त नहीं कर पा रही इस सन्दर्भ में फिल्म के एक पोस्टर को देखा जा सकता है जिस में विद्या के मुँह पर, और शैफाली की आँखों पर पट्टी बंधी है, इस पट्टी के बीच में घटनाक्रम का दृश्य एक कार है। मानो दोनों ने अपनी विवशताओं के चलते मानो स्वयं को बाँध लिया है। एक ओर मीडियाकर्मी होने के नाते यदि माया को यथार्थ की अभिव्यक्ति करनी चाहिए, लेकिन वह सच छिपा रही है; वहीं शेफाली जिसकी बेटी का एक्सीडेंट हुआ है, वह यह जानकर भी कि माया की कार से ही उसकी बेटी का एक्सीडेंट हुआ वह आंखों पर पट्टी बांध लेती है, पहले 25 लाख रुपये मिलने के लालच में, फिर माया के ऑटिस्टिक पीड़ित बेटे आयुष के प्रति स्नेहिल (दया नहीं) भाव के कारण। यहां जीवन से जुड़े बहुत महत्वपूर्ण पलों में लिए गए निर्णयों को बहुत गहनता और गंभीरता से दिखाया गया है।

कहानी एक पल को हिट एंड रन केस के आगे की कार्यवाई प्रतीत होती है,पर यह कुछ और ही पहलुओं को सामने लाने का प्रयास कर रहीं हैं। रात के 3:00 बजे एक लड़का लड़की सुनसान रेलवे स्टेशन पर कुछ मस्ती करते हुए दिखाई देते हैं और उसी मस्ती में अचानक लड़की सड़क की ओर उलटे भाग रही है और तेज गाड़ी उसको टक्कर मार कर चली जाती है। यह देखने पर समझ आता है कि दुर्घटना में कौन दोषी है? माया एक बार पलट कर देखती है लेकिन घबरा जाती है और आगे बढ़ जाती है इस पल से ही माया निर्दोष नहीं रह जाती और अपराधबोध व आत्मग्लानि उसके जीवन को असहज कर देती है जो लाजिमी है।

फिल्म वेदना और संवेदना के बीच बनते-बिगड़ते भावावेशों की क्रिया-प्रतिक्रियाओं को सहजता से दिखाती है और परिवेश का सामना कर रही महिलाओं के सशक्त व्यक्तित्व की निर्मिती करती है। पांच अलग-अलग सशक्त महिलाएं माया, रुखसाना, रोहिणी जो पत्रकारिता के क्षेत्र में बिल्कुल नई है और इस कहानी की तह में जाकर कुछ कर गुजरना चाहती है, माया की मां रोहिणी हट्टंगड़ी और वह लड़की जिसका एक्सीडेंट हुआ है।

हमेशा सच का साथ देने वाली माया मेनन एक सफल व लोकप्रिय पत्रकार है, लेकिन तब क्या होता है जब उसे अपने जीवन का सबसे भयंकर सच अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए छिपाना पड़ता है, भावनात्मक उथल-पुथल आतंरिक द्वंद्व उसे बेचैन कर देता है, वह कुछ भी ढंग से नहीं कर पाती, जो अब तक हर कार्य में परफेक्ट थी। उसके ‘डब्ल्यू आर डी- फेस द ट्रूथ’ चैनल का पार्टनर मित्र जब उसे चुनौती-सी देता है, तो माया कहती हैं कि ‘तुम तो यही देखना चाह रहे होगे ना कि इन परिस्थितियों में अब मैं क्या करूंगी?’ और माया वास्तव में इसे चुनौती के रूप में लेती है और अंत में अपने अपराध का खुलासा कर देती है, स्वीकार करती है कि आयशा का एक्सीडेंट उसी की कार से हुआ, स्वीकार करना आसान नहीं था।

गलतियां हम सब से होती हैं और गलती को छुपाया भी बहुत आसानी से जा सकता है लेकिन जहाँ हम अपनी छोटी से छोटी गलती मानते तक नहीं माया अपराधतूल्य गलती को स्वीकार करती है दूसरी ओर शैफाली भी उसकी गलती को माफ़ करती है, यह जीवन का वह पक्ष है जिस पर हम लोग सोचते भी नहीं है, फिल्म का अंत आपको गांधीवादी विचारधारा यानी हृदय परिवर्तन की ओर ले जाता हुआ दिखाई देगा लेकिन वास्तव में वह भी एक “सशक्त महिला की संवेदना का ही प्रतीक” है।

गलती स्वीकार करने से भी कठिन है ‘क्षमा करना’ जो फिल्म के केंद्र में है। “क्षमा क्षोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो” रुखसाना के पास वे सभी कारण है कि वो माया को क्षमा न करे, लेकिन वो क्षमा करती है।वो जान चुकी है माया उसकी बेटी की गुनाहगार है, उसके लिए माया को माफ़ करना लगभग नामुमकिन है, शैफाली परिस्थितियों के यथार्थ सच जानने के बाद शैफाली की आंखों में अभिव्यक्त क्रोध को वह बदले की भावना तक ला कर भी वापस लौट आती है, यही फिल्म का बहुत खूबसूरत पक्ष भी है। बाहरी भीतरी अंतर्द्वंद, अपराध बोध, आत्ममंथन, मानवीय संवेदनाओं को बचाए रखने की कशमकश जबकि आप सही भी जान रहे हैं, गलत भी समझ रहे हैं लेकिन कौन सी ऐसी विवशताएँ हैं कि आप सही का साथ नहीं दे पा रहे लेकिन गलत को स्वीकार भी नहीं कर पा रहे।

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माया के बेटे आयुष के प्रति उसका ‘निश्छल प्रेम’ उसे बदले की भावना से उबार लेता है दूसरी तरफ माया भी रुखसाना के प्रति स्नेहभाव रखती है इसे एक फोटो के माध्यम से दर्शाया है जिसमें माया और आयशा साथ है। हालाँकि जिस प्रकार का दृढ़ चरित्र माया का है हम कह सकतें हैं कि यदि वह रुखसाना की बेटी न भी होती तो भी माया का अपराध बोध कम न होता, और इसी प्रकार अंतर्द्वंद्वों से जूझती,जो एक सेलिब्रिटी निडर ईमानदार और सदैव सच के साथ खड़ी पत्रकार होने के नाते उसे जूझना ही था।

एक दृश्य में माया गली के कुत्ते की नींद से ईर्ष्या कर रही है कि उसके पास सुकून की नींद नहीं, लोकप्रियता मान प्रतिष्ठा के साथ सुकून की नींद कितनी ज़रूरी है, नींद में गाड़ी चलाने पर जब दुर्घटना होती है तभी हमें पता चलता है। हलके नशे के साथ आधी नींद में दुर्घटना के बाद उसके तमाम मूल्य कहाँ चले जाते है? उसकी नैतिकता फ़ाख्ता हो जाती है, क्योंकि वो जानती है कि उसने अमर के साथ ड्रिंक के एक दो सिप भी लिए थे जो उसके भविष्य के लिए खतरनाक हो सकतें हैं यानी उसका निर्णय सोच समझ कर लिया गया था तब नैतिकताएँ हाशिये पर रह जाती हैं।

फिल्म का यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि रहस्य रोमांच से भरपूर फिल्मों की तरह इस फिल्म में आपको कहीं भी कोई अश्लीलता नहीं दिखाई देगी, कोई गीत भी नहीं है,आइटम सांग भी नहीं । कहीं कोई उत्तेजक कट्टरपंथी सोच भी नहीं, बिना किसी धार्मिक साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के सभी पहले मानव है, और मानवीय गुण-दोषों से युक्त संवेदनाओं का निर्वाह कर रहें है जब पुलिसवाला लड़की के पिता से ‘बिरादरी वाला हूँ’ कहकर मदद की बात करता है और साथ ही यह प्रश्न भी उछल देता है कि तुम्हारी बेटी इतनी रात में अकेली क्या कर रही थी’ तो पिता सीधे प्रश्न करता है ‘गाड़ी किसकी थी पता चला?’ सभी चरित्र अपनी संवेदनाओं के प्रति ईमानदार हैं।

आयुष के रोल सूर्या कासिभटला ने बहुत सुंदर काम किया है, सूर्या अपने वास्तविक जीवन में भी विशिष्ट बालक है और अपनी बीमारी से संघर्ष कर रहा है, भारतीय सिनेमा में इस प्रकार का यह पहला समावेशी और सफल प्रयास है। सूर्या का एक यूट्यूब चैनल भी है जहाँ वह गीत-संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत करता है। फिल्म पारंपरिक कथा-फलक और लोकप्रिय सिनेमाई सोच को ही नहीं तोड़ती बल्कि क्लाइमेक्स यानी अंत जिसके लिए हम तैयार नहीं है,उसे निर्भीकता से प्रस्तुत करती है।

हमारा मानस या मनुष्य की प्रकृति सस्पेंस और रोमांच के नाम पर बिल्कुल क्रूरता को पसंद करता है जबकि यहां पर संवेदना की स्थापना है, एक ऐसी संवेदना जो एक मां की अपने बेटे के प्रति है, बच्चों के प्रति है वह कोरी ममता नहीं है बल्कि मानवीय संवेदना है; जो हमारे जीवन से गायब होती जा रही है जिसे जलसा के डायरेक्टर हमारे भीतर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। फिल्म का नाम भले ही जलसा है लेकिन विद्या बालन ने जिसे एंटरटेनमेंट एंटरटेनमेंट एंटरटेनमेंट कहा, वो फ़िल्मी मनोरंजन हमें यहां पर नहीं मिलेगा। रोमांच मिलेगा,शॉकिंग एलिमेंट से फिल्म आरंभ होती है, दर्शक जो एक बहुत ही प्यारे सीन के बाद, इस तरह के दुर्घटना वाले दृश्य के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था और आप कयास लगाने लगते हैं, यह गाड़ी किसकी होगी? अब क्या होगा? जिसके साथ वह लड़की होती है वह भी मोटरसाइकिल से भाग जाता है और गाड़ी भी तो भाग जाती है।इसके बाद फिल्म आपको जरा भी समय नहीं देती कि आप अगले पल के बारे में थोड़ा सोच लें।

फिल्म में आपको न केवल महिलाओं की संवेदनाएं को बारीकियों से उकेरा गया है बल्कि उनके भीतरी दबाव सिंगल मदर की चुनौतियां और एक बनी बनाई प्रतिष्ठा को बनाए रखने का तनाव उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के भेद में दोनों का स्वाभिमान अभिमान। विद्या और शेफाली दोनों ही अपने दर्शकों को रोमांचित करने में सफल रही हैं शैफाली के भीतर का क्रोध आक्रोश उसे नकारात्मक नहीं बनाता यही मानवीय संवेदना फिल्म की जान है, रोहिणी हट्टंगड़ी का एक संवाद जो उसके पूर्व पति के लिए कहती है कि ‘इसको बोल दो कि यहां आकर बच्चे के साथ खेल जाया करें हम एक्स्ट्रा ओवरटाइम दे दिया करेंगे’ यह उसका अभिमान है या कि बेटी को यह जताने के लिए कि देख तेरे पास टाइम नहीं है लेकिन वह टाइम दे रहा है अपने बच्चे को, इसे दर्शक अपनी सोच के हिसाब से अर्थ ले सकता है।और वह लड़की जिसका एक्सीडेंट हुआ है बहुत प्रभावशाली लगी है।

फिल्म में आम आदमी डायलॉग बोलता है ‘मैं भी पत्रकार बनना चाहता था पर मैं ईमानदार हूं इसलिए नहीं बन पाया’ वर्तमान पत्रकारिता पर सवाल खड़े करती है क्योंकि ईमानदार और सच का साथ देने वाली माया अब कशमकश में है कि वह इस सच का साथ कैसे दें उसकी ट्रेनी के रूप में रोहिणी इसकी तहकीकात कर रही है और इस तहकीकात के दौरान पुलिस और नेताओं के स्वार्थ व भ्रष्टाचार को फ़िल्म धीरे से बहुत हल्के से छूते हुए फिल्म आगे निकल जाती है, जिस पर अधिक गहराई पर जाने की जरूरत भी नहीं है लेकिन समझ आता है कि जहाँ महिला किरदार संवेदनशील और ईमानदार हैं उनके समक्ष पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों से सम्वेदना गायब है। फ़िल्म के अंत में आप किरदारों की सम्वेदना वेदना के साथ आत्मसात कर चुके होतें हैं तभी आप भीतर तक से हिल जाते हैं की अब शैफाली बच्चे के साथ क्या करेगी; अंत तक आप की उत्सुकता बनी रहेगी लेकिन सोच के विपरीत अंत आपको राहत देता है ,अत: मैं कहूँगी कि अमेज़न प्राइम पर आप यह फिल्म देख सकतें हैं और अपनी भावनाओं का विरेचन कर संवेदनाओं के नये क्षेत्र में प्रवेश कर सकतें हैं।

रेटिंग – 3.5 स्टार

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