Friday, September 17, 2021

अपने मकसद में कामयाब होती ‘हिज़रत’

हिज़रत शब्द हिज्र से बना है जिसका अर्थ है विछोह, बिछड़ना, अलग होना, जुदा होना, जुदाई। यह फ़िल्म भी उसी जुदाई और विछोह को दिखाती है। क्या है इस जुदाई की कहानी आओ देखते हैं। मंटो के नाम से पूरी दुनिया वाकिफ़ है साहित्य में शायद सबसे ज्यादा किसी के लिखे पर फिल्में बनी हैं या नाटक खेले गए हैं तो वे मंटों ही हैं। ‘मंटोस्तान’, ‘मंटो’, ‘काली सलवार’, ‘टोबा टेक सिंह’ जैसी कई फिल्में अप्रतिम उदाहरण हैं।

‘हिज़रत’ उन्हीं ‘सआदत हसन मंटो’ की कहानी ‘खोल दो’ पर आधारित है। इन फ़ाहश कहानियों को लिखने के अंजाम में उन्हें कई परेशानियां झेलनी पड़ीं। हिज़रत उन परेशानियों को सामने नहीं लाती बल्कि यह सीधा उनकी कहानी को बताती है। 45 मिनट की यह फ़िल्म एक तरफ सकीना के साथ हुई ज़्यादती को दिखाती है तो दूसरी तरफ़ उसके अब्बा सिराज़ के ग़मों को भी। जिसने आज़ादी के बाद मचे कत्लो-गैरत में अपनी बेटी को खोया। सिराज़ जैसे हजारों हज़ार पिताओं ने अपनी पत्नी, मां, बहन, बहुओं के साथ हो रही ज्यादतियों को अपने ही सामने नंगी आंखों से देखा। इसके अलावा उनके पास कोई और चारा भी नहीं था। अपने धर्म के लोग भी भले वे हिन्दू थे या मुस्लिम या कोई और सबने बहन-बेटियों की इज़्ज़त को तार-तार किया। अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए, अपने बदन की प्यास बुझाने के लिए।

फ़िल्म में जब सिराज़ अपनी बेटी को ढूंढता है। दर-दर खाक छानता है तो वह सबको बताता है कि उसकी बेटी अपनी मां जैसी खूबसूरत है। वैसे भी बेटियां माओं जैसी ही खूबसूरत ही तो होती हैं। खैर जब सरहदें बनीं, इंसान और इंसानियत दोनों अलहदा हुईं, आदमियों के मनोभाव तक्सीम हुए तब ऐसे ही हर जगह खून बहा। हिंदुस्तान से पाकिस्तान जाते हुए और पाकिस्तान से हिंदुस्तान आते हुए सबसे ज्यादा बहन-बेटियां अपने पांवों तले रौंदी गईं। आज भी उस विभाजन के दुःख को दोनों देशों के लोग बराबर भुगत रहे हैं।

हिज़रत उस दुःखों पर मरहम लगाने का काम करती हुई अपने मकसद में कामयाब तो हो जाती है लेकिन उन ज़ख्मों को भी फिर से हरा कर जाती है। एक शायर लियाक़त जाफ़री लिखते हैं –

“जहाँ जो था वहीं रहना था उस को
मगर ये लोग हिजरत कर रहे हैं।”

तो ये लोग असल में आज भी हिजरत ही कर रहे हैं। गाहे-बगाहे सिनेमा में हम हिज़रत के इन छिटपुट अंशों को देखते भी आए हैं। लेकिन उन पर सिवाए अब आंसू बहाने के कोई चारा भी नहीं बचता और न ही कोई ऐसा आदमी बचा हुआ है जिसे कोसा जा सके।

हिज़रत की आग में जलते हुए सबसे बेहतरीन काम महाबीर भुल्लर तथा मनी बोपराय ने किया है। महाबीर भुल्लर पंजाबी सिनेमा का बड़ा नाम हैं। ‘दाना-पानी’, ‘रेडूआ’, ‘इक्को-मिक्के’, ‘साक’, ‘सूरमा’, ‘बॉर्डर’ सरीखी बड़ी फिल्मों में नाम कमा चुके हैं। वहीं मनी ‘एक अनोखी दुल्हन सावी’, ‘किट्टी पार्टी’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 420’ जैसी नामालूम फिल्मों में काम कर चुकी हैं। साथी कलाक़ारों का साथ किसी फिल्म को अगर खूबसूरती तथा मजबूती प्रदान करे तो फ़िल्म तो अपने मकसद में कामयाबी हासिल करेगी ही। ‘सोहज बरार’, ‘अमोलक सिद्धू’ , ‘विजय ज़ोरा’ जैसे तमाम कलाकार अपना काम बखूबी करते नजर आते हैं।

लोकेशन, लुक, सिनेमेटोग्राफी के हिसाब से यह फ़िल्म विभाजन के दौर के भारत-पाकिस्तान तथा वहां के रिफ्यूजी कैम्पों को भी ठीक-ठाक तरीके से दिखाती है। एक मात्र लिखा गया गाना ‘मां मैं किन्नू आखां दर्द विछोडे दा हाल’ गीतकार ‘हज़रत शाह हुसैन’ का ‘मीनू पलटा’ की आवाज में फ़िल्म की रूह बनकर सामने आता है। ऐसी फिल्मों में कसी हुई एडिटिंग, कलरिंग, कैमरा सब कुछ मायने रखता है। हालांकि इस फ़िल्म में यह उम्दा तो नहीं है लेकिन बेहतर जरूर कहा जा सकता है। बैकग्राउंड स्कोर थोड़ा और फ़िल्म से मैच कर पाता तो फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी। निर्देशन के मामले में एक्टर, लेखक, निर्माता निर्देशक गुरमीत बराड़ का निर्देशन अच्छा है तथा वे उस समय के माहौल को भी पूरी तरह अपनी फिल्म में उतार पाने में कामयाब होते हैं। इसके अलावा ‘कुड़ियाँ दा सिरनावां’ शॉर्ट फिल्म का लेखन, निर्देशन करने वाले गुरमीत ने साल 2014 में आई ‘वतार’ फ़िल्म में अभिनय भी किया है।

कई फ़िल्म फेस्टिवल मसलन ‘कलकत्ता इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’ , ‘सातवें दिल्ली इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’ , ‘बॉलीवुड फेस्टिवल ओस्लो-नॉर्वे’ , ‘राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’ , ‘इंडियन फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ आयरलैंड’ , ‘इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल लंदन’ , ‘लिफ्ट इंडिया फिल्मोत्सव मुंबई’ , ‘श्रीगंगानगर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’ आदि कई जगह विभिन्न कैटेगरी में इनाम अपने नाम कर चुकी यह फ़िल्म भी अभी हिज़रत के दौर से गुजर रही है। जैसे ही इसका मिलन हो किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म से तुरंत देख डालें अगर आप विभाजन के दुःख को जीना चाहते हैं। मंटों से, उसके लिखे से, साहित्य से प्रेम करते हैं तो यह फ़िल्म आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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