Saturday, September 24, 2022

मूवी रिव्यू: इस ‘गहराइयां’ में सोचकर डूबना

Movie Review Gehraiyaan: एक लड़की जिसकी माँ ने उसके बाप के कारनामों के चलते फांसी लगा ली अब अपने पिता से दूर सालों से बॉयफ्रेंड के साथ रह रही है। वह कमाता कुछ खास नहीं बस राइटर है। और एक किताब निकालने की जद्दोजहद में लगा है। लड़की योगा क्लास करके घर चला रही है। अपनी लाइफ और कैरियर दोनों से नाखुश है ये लड़की। इधर दूसरी तरफ उसकी चचेरी बहन तान्या और उसका मंगेतर जेन अमेरिका से मुंबई आते हैं। दोनों अरबपति हैं। अब उस लड़की का इश्किया चक्कर चल पड़ा और अपने सालों पुराने बॉयफ्रेंड से इश्क करने लगी। लेकिन क्या ये कामयाब हुए? या क्या फ़िल्म अपने ट्रेलर और हाइप बनाने के चक्कर में वही कामसूत्र परोसती रही? लेकिन ये भाई नया लड़का जिसके बारे में खूब बताया जाता है पैसे वाला है। वह ज्यादा नज़र तो नहीं आया? और कहानी नहीं थी आपके पास? वही टिपिकल बॉलीवुड बातें?

लेकिन दूसरी तरफ अगर मैच्योर तरीके से देखा, समझा जाए तो अमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई फिल्म ‘गहराइयां’ ऐसे लोगों की कहानी कहती है जो अंदर से कहीं परेशान से हैं। कोई चीज या बात जब सीधे तौर से आपको सोचने न दे तो उससे निकलेगी ऐसी ही कहानियां। देखा जाए तो आज के समय में यह परिस्थिति हर किसी के साथ होती है।

फ़िल्म जब-जब दोस्ती, रिलेशनशिप, प्यार, लाइफ स्टाइल आदि की बातें करती है तब तो ठीक लगता है लेकिन फिर बात वही टिपिकल बॉलीवुड फिल्म की कहानी यहां चलकर इसमें गड़बड़ी पैदा करती है। ‘गहराइयां’ एक एडल्ट फिल्म है। और यह एडलटन्स आई है इसमें मैच्योरिटी से। क्योंकि ऐसी फिल्में उन्हीं लोगों के लिए खास करके बनती हैं जो सैक्स या अश्लीलता पर फोकस करने के बजाए उसे समझदारी से देखे। वरना पॉर्न तो इस देश में सबसे ज्यादा देखा ही जा रहा है। जब आप प्रेम के घिसे-पिटे और बने-बनाए कॉन्सेप्ट में यकीन नहीं रखते तो बनती है गहराइयां। इस फ़िल्म के ट्रेलर आने के साथ ही कुछ लोग इसे ‘कभी अलविदा ना कहना’ फ़िल्म से जोड़ कर देख रहे थे। हालांकि इसमें है भी कुछ-कुछ वैसा ही लेकिन उसी गहराई के साथ। धीरे-धीरे गहराई में डूबती हुई यह फ़िल्म धीरे-धीरे ही आपको भी डुबाती हुई चली जाती है। जिसके चलते टिपिकल बॉलीवुड फिल्म की कहानी होते हुए भी यह उन चुनिंदा समझदार लोगों को अच्छी लग सकती है। जो इस गहराईयां में सोचकर डूबेंगे।

रिश्तों को बनाए-बचाए रखने की ढेरों कोशिशें। उन कोशिशों में बोले जाने वाले झूठ। या छुपाए जा रहे सच। तथा इसी तरह तमाम तरह के फर्जीवाड़े भी इसमें देखने को मिलते हैं। बावजूद इसके इसकी कहानी में बहुत सी जगह बहुत सारे छेद भी नजर आते हैं। यही वजह है कि कई सवालों के जवाब ये नहीं देती। शायद इसे बनाने वालों को लगा होगा कि दर्शकों को उलझाए रखने में ही भलाई है।

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यह फ़िल्म कहीं-न-कहीं आज के समय में, आज के लोगों की कहानी दिखाती है। इस फ़िल्म में दीपिका ने काफी साधा हुआ काम किया है। सिद्धांत चतुर्वेदी ने भी अच्छा साथ निभाया है। ‘नसीरुद्दीन शाह’ इस फ़िल्म की सबसे मजबूत कड़ी है। वैसे भी नसीरुद्दीन शाह साहब की किसी भी फ़िल्म में कमियां निकालना एक्टिंग की दुनियां के भगवानों में कमियां निकालना जैसा होगा। रजत कपूर, अनन्या पांडेय, धैर्य करवा आदि सभी का अभिनय फ़िल्म की कहानी के मुताबिक चलता नजर आता है। फिल्म में एक सीन है, जब अलिशा ज़ेन से कहती है-

”मैंने करण को अपने लिए छोड़ा है, तुम्हारे लिए नहीं।”

तो इसे आपको समझना होगा कि ये महिलाओं के अपने सोचने की बात और शक्ति पर भी कहती है। हम आम जीवन में भले ही उन्हें कितना ही भला-बुरा कहते रहें। उन पर हंस लें या जॉक्स बना लें लेकिन वे जानती हैं कि वे क्या कर रही है? और क्यों कर रही है? फिल्म का एक सीन है, जिसमें रजत कपूर का किरदार जितेश, अलिशा से कहता है-

”Get the fu** out of here. I don’t want to see your face.”

ये किसी को कहने के लिहाज़ से बहुत खराब बात है। मगर जिस वजह से ये बात फ़िल्म में कही गई है, वो फिल्म का हिस्सा आपके कईकों का पसंदीदा हो सकता है। यह फ़िल्म देखने लायक तो है मगर ये वह फ़िल्म नहीं है जो इसे होना चाहिए था।

फ़िल्म को अच्छे से शूट किया गया है। कैमरा वर्क काफी बढ़िया है लेकिन एडिटिंग की कमियां भी नजर आती है।गीत-संगीत औसत है। कास्टिंग से लेकर प्रोड्यूसिंग आदि सभी में यह फ़िल्म कहीं कम तो कहीं ज्यादा है। पिछले दस सालों में निर्देशक शकुन बत्रा ने यह तीसरी फिल्म बनाई है। इससे पहले उन्होंने ‘कपूर एंड सन्स’ , ‘एक मैं और एक तू’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है। उन फिल्मों को देखते हुए भी लगता है कि निर्देशन में ज्यादा सुधार वे अभी तक नहीं ला पाए हैं।

बावजूद इसके बड़ी कास्ट वाली इस फिल्म को इस वीकेंड पर आप देख सकते हैं। लेकिन अगर आप धीर-गंभीर किस्म की फिल्में देखना पसंद नहीं करते या इसे धीर-गम्भीर होकर नहीं देखेंगे तो शायद ये फिल्म आपके ऊपर से निकल जाए।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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