Saturday, September 24, 2022

रिव्यू: अकड़, ठसक और प्यार ‘गौरव की स्वीटी’ में

आजकल ओटीटी प्लेटफॉर्म की बाढ़ सी आई हुई है। कुछ समय पहले राजस्थान में ओटीटी प्लेटफॉर्म लॉन्च किया गया था। तो इधर हरियाणा का अपना ओटीटी प्लेटफॉर्म भी बना ‘स्टेज एप्प’ एम एक्स प्लेयर, हॉट स्टार , नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम जैसे बड़े ओटीटी प्लेटफार्म तक कई बार पहुंच न बना पाने के कारण तो कई बार अपने ही क्षेत्र के क्षेत्रीय सिनेमा को आगे बढ़ाने के इरादों से ये प्लेटफार्म्स लॉन्च किए जाते हैं।

फरवरी महीने की शुरुआत में हरियाणा के ही एक ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘स्टेज एप्प’ पर फ़िल्म रिलीज हुई ‘गौरव की स्वीटी’ हालांकि इस फ़िल्म का पहले नाम ‘दहिया वर्सेज मलिक रखा गया था। देखा जाए तो ये दोनों ही नाम इस फ़िल्म को देखते हुए उचित लगते हैं। लेकिन फिर जब फ़िल्म खत्म होती है तो सबसे ज्यादा उचित ‘गौरव की स्वीटी’ ही लगता है।

हरियाणा जिले का एक गांव, गांव में दो परिवारों की आपसी दुश्मनी। दुश्मनी भी कोई बहुत बड़ी नहीं। दरअसल हरियाणा, राजस्थान, पंजाब जैसे उत्तरी भारत के क्षेत्रों का सच भी यही है कि छोटी सी बात पर लड़ाईयां कई बार ऐसी दुश्मनियाँ और रिश्तों के बीच खटास पैदा कर देती हैं कि वे बरसों-बरस तक खत्म नहीं होती। खैर अब इन दोनों परिवारों के बाप-दादाओं की दुश्मनी के बीच गांव में सरपंच के चुनावों की बात हो या चुनाव जीतने के बाद और उससे पहले की ठसक दोनों परिवारों में नजर आती है। लेकिन इस ठसक और अकड़ तथा अक्खड़पने को दूर करते हैं इन्हीं दोनों परिवारों के लड़के-लड़की।

वैसे ऐसी फिल्मों में कहानी आप चाहें तो भी कुछ ज्यादा छुपा नहीं सकते। कारण कि ये अपने नाम के अनुरूप ही आपको काफी कुछ बता देती है। राजनीति की हल्की सी आहटों के बीच प्यार के दो खिलते फूलों को इस माह-ए-मोहब्बत के दिनों में आपको अवश्य देखना चाहिए।

फ़िल्म में एक्टिंग की बात करें तो ‘मनजीत बेनीवाल’ , ‘जे डी बल्लू’ , ‘तरुण वधवा’ , ‘वीना मलिक’ , ‘तेजेन्द्र सिंह’ , ‘अंजवी हुड्डा’ , ‘नवीन निशाद’ , ‘सुमित धनकड़’ , ‘मनदीप दहिया’ आदि जैसे कई स्टार कलाकारों से भरी इस फ़िल्म में अमूमन सभी का काम सराहनीय रहा है। खास करके ‘जे डी बल्लू’ , ‘मनजीत बेनीवाल’ , ‘अंजवी हुड्डा’ प्रभावित करते हैं। लेकिन आनन-फानन में बनी और रिलीज हुई इस फ़िल्म में एक्टिंग में कुछ हल्की-फुल्की कमियां भी नजर आती हैं। सबसे बड़ी कमी फ़िल्म में डबिंग की रही है। फ़िल्म के पहले हाफ तक जिस रोमांच, ठसक, अकड़ को बखूबी पकड़ा गया है वह जैसे-जैसे प्यार, प्रेम की कहानी की ओर लौटने लगती है तो इसकी ठसक कम पड़ने लगती है। और अंत कहीं-कहीं आप इसके सीन देखते हुए खुद भी अंदाज लगा लेते हैं कि आगे क्या होने वाला है।

आदित्य महेश्वरी के निर्देशन में कुछ जगहों पर कच्चापन झलकता है। काश की वे इसे थोड़ा और समय लेकर बनाते तो यह एक उम्दा फ़िल्म हो सकती थी। हालांकि कहानी अच्छी लिखी गई है। लेकिन जब आप किसी तरह की हड़बड़ी में हों तो ऐसी गलतियां होना लाजमी है। निर्देशक को चाहिए कि वे अगर आगे इस दिशा में लम्बा सफर तय करना चाहते हैं तो उन्हें इश्क, प्रेम और दुश्मनी की ऐसी कहानियों को थोड़ा धीमें आंच पर पकाएं। सिनेमैटोग्राफी भी अंत तक आते-आते लड़खड़ाने लगती है। बैकग्राउंड स्कोर शुरुआत में जितना दमदार रहा उसका असर अंत में या कुछ जगह बीच-बीच में नहीं दिख पाया। कैमरे से जरूर कई अच्छे शॉट्स लिए गए हैं। एक्शन के सीन्स आपके भीतर दहल पैदा न कर पाएं कुछ जगह तो उसके लिए भी दोष निर्देशक को दिया जाना चाहिए। दरअसल ऐसी अच्छी कहानियों को फिल्माने के लिए अच्छे निर्देशक के साथ-साथ बड़ी सोच और विजन के अलावा धैर्य की जरूरत होती है।

बावजूद इसके यह भी नजर आता है कि फ़िल्म के सीमित बजट के कारण आप इसकी खामियों को नजरअंदाज कर जाएं। आरम्भ में जितना पैसा फ़िल्म पर लगाया गया अंत में भी उतना ही खर्च होता या शुरू से ही ये कसावट उसमें भी बरतते तो फ़िल्म दिलचस्प होती और ज्यादा। एडिटर अपने काम में अचकचाये से नजर आते हैं। फ़िल्म के लुक को सिनेमैटोग्राफी तथा वीएफएक्स से ढक दिया जाता तो कुछ जगह फ़िल्म जो खलती है वह नहीं खल पाती। यह सच है कि ऐसे क्षेत्रीय सिनेमा को अगर थोड़ा सराहा पैसों से और दिया जाता तो ये लोग कमाल कर सकते थे।

प्रोड्यूसर्स भी ऐसे लोगों को जो क्षेत्रीय सिनेमा में कुछ अच्छा करने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें नहीं मिल पाते कायदे के। लेकिन फिर भी जो कुछ दो-चार खामियां हैं उन्हें भुलाकर इस माह-ए-मोहब्बत के सप्ताह में आप इसे इंजॉय अवश्य कर सकते हैं। खास करके हरियाणवी सिनेमा, भाषा आदि को चाहने वालों के लिए यह फ़िल्म कई अच्छे डायलॉग्स और युवाओं को प्रेम के मायने सीखा जाने में कामयाब अवश्य हो सकती है। फ़िल्म के संवाद और हरियाणवी भाषा की ठसक के साथ जिस तरह बोले गए हैं वे जरूर लुभाते हैं। फ़िल्म में इस्तेमाल हुआ जैसे एक डायलॉग ‘मारे पाछे लाश भी नहीं देवांगे।’ जैसे संवाद हरियाणा में बेझिझक इस्तेमाल किए जाते हैं।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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