Sunday, December 5, 2021

रिव्यू: कम बारूद वाला कच्चा-पक्का ‘धमाका’

इस शुक्रवार नेटफ्लिक्स पर कार्तिक आर्यन की फ़िल्म रिलीज हुई है ‘धमाका’ अगर आप इस वीकेंड फ़िल्म को देखने का प्लान बना रहे हैं तो पहले बॉलीवुड लोचा के इस रिव्यू पर नजर डाल लें। फिर न कहना बताया नही।

एक मजदूर जिसने कई साल मजदूरी की। लेकिन किसी वजह से उसे आतंकवादी बनना पड़ गया। अब उस आतंकवादी ने अपने हाथ यहां तक फैला लिए की न्यूज चैनल के भीतर बैठे एंकर तथा अन्य लोगों के ईयर पीस तक बम फिट कर दिया। उसने ऐसा क्यों किया? मजदूर से आतंकवादी क्यों और कैसे बना? क्या वो जिस मंत्री से माफी चाहता था उसे वह मिली? उसने कितना नुकसान पहुंचाया आमजन को? इस सबके जवाब आपको नेटफ्लिक्स पर आई फ़िल्म ‘धमाका’ मिलेंगे।

यह फ़िल्म आज के समय की पत्रकारिता, न्यूज चैनलों, एंकरों के ड्रामों, झूठी खबरों के अलावा भ्रष्टाचार तक हर चीज को दिखाती है। लेकिन थोड़ा सा इसकी कहानी में, थोड़ी सी इसकी स्क्रिप्टिंग में चूक भी नजर आती है। फ़िल्म अपने पहले ही सीन के साथ जो सस्पेंस और थ्रिल परोसती है वह एक समय बाद हल्का नजर आने लगता है। और एक ये न्यूज चैनलों में बैठकर सिगरेट पीने वाले लोग जैसी नजर आने बातें भी इसे कुछ के लिए सच तो कुछ के लिए एक फ़िल्म जैसा सा आभास देती है।

और तो और यह फ़िल्म एक ओर ‘जो मैं कहूंगा सच कहूँगा’ जैसे डायलॉग्स के माध्यम से एक तमाचा भी उस पत्रकारिता जगत पर तमाचा मारती है। तो दूसरी तरफ उसी पत्रकारिता जगत के रेटिंग के झोल में फंसी पत्रकारिता को भी दिखाती है। अब इस दृश्य पर ताली बजाए जाए या जज्बाती हुआ जाए। यह आप तय कीजिए। इसके अलावा सोशल मीडिया के हैशटैग में उलझी भी नजर आती है। वहीं हल्के से उन लोगों के बारे में भी बता जाती है, जो लोग हजारों सालों से इस दुनिया में मजदूर बने हुए हैं। जिन्होंने इस दुनिया को बनाया है। और जिनके बारे में कोई नहीं सोचता।

इस शुक्रवार नेटफ्लिक्स पर आई इस फिल्म की रफ्तार खासी तेज है। इतनी तेज की आप शायद एक समय बाद इससे दूर भागें। तेजी से इसके बदलते घटनाक्रम मानों एक सांस में सबकुछ कह देना चाहते हैं। कहानी के लिहाज से यह तेजी अखरती नहीं। मगर बात वही स्क्रिप्टिंग के लिहाज से यह बीच में कहीं-कहीं दम भी तोड़ती नजर आती है।

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फ़िल्म में कुछेक रियलस्टिक चीज़ें भी दिखती हैं। जैसे अर्जुन की बॉस अंकिता उससे खबर का एंगल पूछती है। फिर ‘मज़ा नहीं आया’, ‘और इमोशन डालो’ जैसे जुमले बोलती है, तो सच में ही किसी खबरिया टीवी चैनल के न्यूज़ रूम का फील भी आने लगता है। फ़िल्म के कुछ संवाद बहुत उम्दा हैं। जैसे, ‘एंकर बना दिए जाते हैं, रिपोर्टर्स अपनी मर्ज़ी से बनते हैं।’ ‘न्यूज़ के लिए वक्त लगता है और ऑडियंस के पास वक्त नहीं है।’

एक्टिंग के लिहाज से कार्तिक आर्यन का काम उम्दा है। उन्होंने अपने किरदार को हर नजरिये से पकड़ कर रखा है। कोरोना पैनडेमिक के बीच शूट हुई और सिर्फ 10 दिनों में पूरी कर ली गई यह फ़िल्म अपनी कई कमियों के बावजूद भी अच्छी बन पड़ी है।

अन्य अदाकारों की बात करें तो यह सीमित बजट के साथ सीमित कलाकारों वाली फिल्म है। क्रेडिट रोल के मोंटाज में मृणाल के साथ कार्तिक आर्यन की कैमिस्ट्री जमती है।

ग्राउंड जीरो रिपोर्टिंग में यकीन करने वाली टीवी पत्रकार सौम्या के किरदार में मृणाल ठाकुर प्रभावित करती हैं। टीवी रेटिंग के लिए किसी भी हद तक जाने वाली शातिर और भावहीन चैनल हेड अंकिता मालस्कर के किरदार में अमृता सुभाष हिस्से आई उग्रता परेशान करने वाली है और यही उनकी अदाकारी की जीत भी है। फ़िल्म को रफ्तार देने में बैकग्राउंड म्यूजिक का अच्छा सहयोग मिला।

गीत-संगीत के मामले में एक गाना ‘खोया-पाया’ है, जो प्यारा है अगर उसके बोल पर ध्यान दिया जाए तो। ‘धमाका’ कोरियन फिल्म ‘द टेरर लाइव’ का आधिकारिक रीमेक है। इस वीकेंड में कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम नहीं है तो धमाका एक बार देखी जा सकती है। 1 घंटा 44 मिनट की इस फ़िल्म के निर्देशक- राम माधवानी की तथा लेखक- राम माधवानी, पुनीत शर्मा की कोशिश से ज्यादा इसमें दिखाए गए पत्रकारिता वाले कटाक्ष जरूर आपको अच्छे लगेंगे। और हो सकता है कुछ कम बारूद वाले इस धमाके के कुछ कच्चे-पक्के या थोड़े कम आंनद वाले शोर का जिक्र कभी आप किसी से करें।

अपनी रेटिंग- ढाई स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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