Tuesday, September 27, 2022

रिव्यू: मर्दवादी सोच पर टूटती ‘चूड़ियां’

‘द बैंगल्स’ नाम से जयपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गई यह 20 मिनट लम्बी यह फ़िल्म मर्दवादी सोच पर इस कदर टूट कर पड़ती है कि इसे देखते हुए आप उस समाज के प्रति थोड़ा गर्म भाव लेकर बाहर निकलते हैं।

वहीं स्त्री जाति तथा समुदाय के प्रति आप भावुक हो उठते हैं। यह फ़िल्म स्त्री-पुरुष जाति से कहीं परे मानवीय मूल्यों का जीता जागता उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। एक घरों में काम करने वाली मेड किसी मेम साहब के यहां काम पर जाती है। वहां उसकी बेटी पिया के जन्मदिन पर वह अच्छा खासा उपहार अपनी मालकिन की बेटी के लिए ले जाना चाहती है। वह उपहार जैसे-तैसे जोड़कर बताए गए गुल्लक के पैसे से उपहार खरीदने को उत्सुक रहती है। लेकिन तभी उस मर्द वादी समाज के एक प्रतिनिधित्व कर रहे उसके पति का उस पर वो कहर टूटता है कि बस आप कुछ मौन, कुछ मूक, कुछ क्षुब्ध हो उठते हैं।

फ़िल्म की कहानी को देखकर ऐसा कुछ नया नहीं नजर आता। हमारे-आपके आम भारतीय परिवारों में यही चूड़ियां पत्नियों, बेटियों के ऊपर कहर बनकर यदा-कदा टूटती ही आई है। जब उसका पति कहता है कि ‘तू नौकर वो मालिक तू उन्हें क्या गिफ़्ट देगी। 20 रुपए की चूड़ियां।’ तो यह सच भी समाज का उजागर होता है।

साथ ही ‘किनारी सिंह’ के रूप में नौकर की मालिक के प्रति सच्ची भावनाएं भी निकलकर बाहर आती है। हमारे समाज में ऐसे बहूतेरे नौकर हैं जो अपने मालिकों के लिए उपहार खरीदते हैं। उन उपहारों में केवल वह छोटी-मोटी चीजें ही नहीं होतीं उनकी भावनाएं, उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनकी ममता और करुण भाव भी जुड़े होते हैं।

फ़िल्म की स्टार कास्ट बड़ी नहीं है लेकिन सभी के अभिनय से यह इतनी तो सुसज्जित हो ही जाती है कि यह उन भावनाओं के ज्वार को आपके सीने में दबी शैदाई सिने खावहिशों के साथ-साथ उन भावनाओं को भी बाहर ले आती हैं, जो आप कभी शायद महसूस न करते होंगे।

Review Chudiyan

कहानी मानवीय मूल्यों के प्रति उस नजरिये से देखी जाए तो यह लाजमी है कि आपके घरों में काम करने आने वाली इन मेड के प्रति आप कृतज्ञता ज्ञापित कर सकें। कहानी बेहतर तथा अभिनय अच्छा होने के बावजूद इसके अंदर कुछ कमियां भी नजर आती हैं। जिसकी वजह से इसका रंग हल्का पड़ता है।

एडिटर काम, कैमरामैन का काम अपनी ओर आकर्षित करता है। लेकिन कहीं-कहीं कैमरे में चूक भी नजर आती है। सिनेमैटोग्राफी, रंग-संयोजन हल्का नजर आता है। फ़िल्म की कलरिंग तथा सिनेमैटोग्राफी को और बेहतर बनाकर इसे गाढ़ा किया जा सकता था। बैकग्राउण्ड मार्मिक है इस लिहाज से यह फ़िल्म कुछ इनाम भी जीत ले सम्भव है। इससे पहले तीन फेस्टिवल में दिखाई गई यह फ़िल्म सराहना तथा तारीफें जरूर अपने लिए बटोर लेती है। निर्देशक का काम इन सबको तारीफों के लायक बनाता है।

ध्यान रहे ऐसी कहानियां आपके-हमारे समाज के भीतर से ही निकलती हैं। इसलिए ये फिल्में वरेण्य हो जाती हैं। जहां कहीं मिले कम से कम इसे देखिए जरूर तथा उस स्त्री जाति के साथ-साथ सदियों से सताई जा रही स्त्री जाति के प्रति अपना मानवीय कर्म जरूर सुधार लीजिएगा इसी बहाने से। क्योंकि निर्जीव वस्तुओं के साथ किया जाने वाला आपका व्यवहार यह दिखाता है कि आप किस प्रकृति के इंसान हैं। लेकिन यहां कोई निर्जीव नहीं है, अगर है भी तो वह भीतर से निर्जीव और कठोर हो चला मर्दवादी समाज है। बस इसे देखते हुए अंत में आप यह जरूर कह सकते हैं कि काश थोड़ी ओर कसी जाती ये चूड़ियां, काश थोड़ा तमाचा कस कर मार पाती ये चूड़ियां।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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