Wednesday, January 19, 2022

रिव्यू: परंपराओं की बेड़ियां तोड़ती ‘छोरी’

ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम पर 26 नवम्बर को फ़िल्म ‘छोरी’ रिलीज हुई है। मराठी फ़िल्म ‘लपाछपी’ का यह रीमेक हॉरर और सामाजिकता के ताने-बाने में गूंथा नजर आता है। फिर भी फ़िल्म देखने से पहले बॉलीवुडलोचा टीम के इस रिव्यू को पढ़ लीजिए।

फिल्म में दरअसल तीन कहानियां है। जिसमें से दो कहानी सुनाती है भान्नो देवी यानी मीता वसिष्ठ। पहली ये कहानी कि एक छोटे से गांव में बड़ा सा पेड़ था। पेड़ पर कौआ अपने परिवार के साथ सुख शांति से जीवन बिता रहा था। फिर एक दिन जहरीली काली नागिन पेड़ से लिपट गई। धीरे-धीरे उसका जहर सारे पेड़ में फैलने लगा, पत्ते गिरने लगे। सारे फल टूट कर गिर गए। देखते-देखते घना पेड़ विधवा की मांग जैसा सुना पड़ गया। जैसे कौआ अंडे देता वैसे नागिन उसे खा जाती। एक दिन वहां चिड़िया आई, घोंसला बनाया, अंडा दिया। लेकिन कौए ने उसे आपस में बदल लिया। कौए का अंडा बच गया।

अब दूसरी कहानी सुनिए। भान्नो देवी बताती है कि बहुत साल पहले की बात है। मेरे देवर योगेश्वर की शादी सुनैनी नाम की छोरी से करवाई उसने। नाम सुनैनी मगर सीरत से डायन। घर में पैर पड़ते भान्नो देवी का सुखी परिवार बर्बाद हो गया। उसके चार बालक थे, चारों छोरे। तीन छोटे और सबसे बड़ा राजगीर। डायन ने तीनों छोटे छोरों पर ऐसा जादू किया कि वे उसके वश में हो गए। कान बालकों के खिलाफ भरने लगी। एक दिन देखते-देखते तीनों बालक अपनी मां भान्नो से अलग रहने लगे। दिन रात अपनी भाभी से चिपके रहते। उसने सब तरीके आजमा लिए। पर बालकों को भाभी के चंगुल से छुड़ा ना सकी। लेकिन वह कहती है कि जब सारे दरवाजे बंद हो जाते तो ऊपर वाला अपने आप रास्ता दिखाता है।

इस तरह उसके बेटे राजबीर की चार शादियां हुईं। क्यों हुई? उसका कारण तो आपको फ़िल्म देखने के बाद ही पता लगेगा। फ़िल्म अपने पहले ही कुछ मिनटों में हॉरर फिल्म का ऐसा मसालेदार तड़का पेश करती है कि बीच-बीच में ऐसे सीन जब भी आते हैं आप एकदम से घबरा भी सकते हैं उन्हें देखते हुए। आखरी बार ऐसा हॉरर का तड़का ‘तुम्बाड़’ फ़िल्म में देखने को मिला था।

लेकिन हॉरर के मसाले से रंगा-रंग रंगी यह फ़िल्म अपने खत्म होने साथ ही जब तीसरी कहानी पेश करती है तो दिल में एक अजीब सी कसमसाहट छोड़ जाती है। और फ़िल्म के अंत में जब आप यह लिखा देखते हैं कि जितने समय में आपने यह फ़िल्म देखकर पूरी की है उतने से समय में इस देश भर में एक शतक से ज्यादा लड़कियां कोख में मारी जा चुकी हैं।

अब उन्हें मारने के कारण हजार हो सकते हैं। लेकिन फ़िल्म में परमपरा, रुढ़ विचार के साथ-साथ अच्छी फसल का होना भी एक टोटके के रूप में नजर आता है। हाल ही में आई ‘सरदार उधम’ की तरह ही एक सीन जब आप कुएं में पड़ी उन भोली-नादान बच्चियों के मृत शरीर को देखते हैं तो आपकी आंखें छलछला आती हैं।

फिल्म ‘छोरी’ के निर्देशक ‘विशाल फूरिया’ ने अपनी ही मराठी फिल्म ‘लपाछपी’ को रीमेक के तौर पर इसे हिंदी में बनाया है। मराठी फिल्म में जो भूमिकाएं ‘उषा नायक’ और ‘पूजा सावंत’ ने निभाई थी। उन्हीं भूमिकाओं को इसके हिंदी रीमेक वर्जन में आप ‘मीता वशिष्ठ’ और ‘नुसरत भरुचा’ को देखते हैं। कायदे से देखा जाए तो बॉलीवुड के पास अच्छी कहानियों की कमी नहीं है। लेकिन बस उन्हें बनाने में उनकी नेक नियति नजर नहीं आती। इसलिए रीमेक पर रीमेक बना लिए जाते हैं। यही फ़िल्म पहले ही हिंदी में आती तो मराठी से ज्यादा सम्भवतः कमाई कर सकती थी।

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जब परंपराओं, रूढ़ियों वाली कहानियों में हॉरर का तड़का लग जाता है तो वे कुछ समय पहले आई ‘स्त्री’ जैसी फिल्मों की तरह सफल भी हो जाती हैं। एक्टिंग के लिहाज से किसी एक की एक्टिंग अच्छी कहना बाकी कलाक़ारों के साथ अन्याय होगा। ‘नुसरत भरुचा’ , ‘मीता वशिष्ठ’ , ‘राजेश जैस’ , ‘सौरभ गोयल’, ‘पल्लवी अजय’, ‘ग्रेसी गोस्वामी’ , ‘तनुज व्यास’ सभी ने अपना काम आला तरीके से किया है।

फ़िल्म में बैकग्राउंड स्कोर अपनी अहम भूमिका निभाता है। गीत के नाम पर एक लोरी है। जो सुनने में जितनी अच्छी लगे उससे कहीं ज्यादा वह इस फ़िल्म की थीम के चलते आपको भारी मन से भरने लगती है। कॉस्ट्यूम, मेकअप, कास्टिंग डायरेक्टर का काम, फ़िल्म के वीएफएक्स, एटिडर सभी जब ऐसे उम्दा काम करने लगें तो फिल्में दिल जीतने में कामयाब हो जाती नहीं हैं बल्कि यादगार और उदाहरण बनकर सामने आती हैं।

इस देश में चार तरह के वर्ण हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इन तीनों के वंश को बढ़ाने वाला आदमी भले ही होता हो उनकी रूढ़ियों के मुताबिक। लेकिन जब उन्हें कोख ही न मिला करेंगीं तब वे अपना वंश किसके दम पर आगे बढ़ाएंगे? यह भी इस फ़िल्म को देखने के बाद सोचिएगा। जैसे इसी फ़िल्म के एक डायलॉग्स में आप सुनते हैं – ‘ क्या किसी रूल बुक में लिखा है? कि लड़कियां वो खेल नहीं खेल सकती जिन पर लड़कों का कॉपीराइट है।’

इस तरह यह फ़िल्म मात्र एक छोरी या फ़िल्म में पीड़ित होते हुए दिखाई गई मात्र कुछ लड़कियों या छोरियों की कहानी न रहकर पूरे देश की छोरियों की कहानी बन जाती है। और अंत में सत्यमेव जयते टीवी शो वाला ‘ओ री चिरैया’ पुनः आपकी आंखों के कोरों को गीला कर ही जायेगा। लंबे समय से कोई सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित फ़िल्म या हॉरर के कई सारे मसालों वाली फिल्म का मिक्सचर नहीं चख पाई है आपकी आंखें। तो उन्हें इस फ़िल्म का स्वाद जरूर चखने दीजिएगा।

ऐसी फिल्में दिल के कोनों में गहरे अंतस्तल तक जाकर इस कदर बैठ जाती हैं कि जिसके बाद आप कुछ और स्वाद चखने में शायद लम्बा समय लगाएं। अमेजन प्राइम पर आई इस फ़िल्म को कानों से देखिए और आंखों से सुनेंगे तो इसका स्वाद लंबे समय तक बना रहेगा।

अपनी रेटिंग – 4 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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