Saturday, September 24, 2022

मूवी रिव्यू: रहस्य के आवरण में लिपटी ‘छिपकली’

Movie Review Chhipkali: एक लेखक जिसके सत्रह नॉवल छप चुके हैं। बावजूद इसके बाजार में वह चल नहीं पाया, प्रोफेशनल ना हो सका। हजारों की संख्या में रोज अपने कलम से ऐसे डिटेक्टिव वह पैदा करता है। लाखों चरित्रों के प्राण प्रतिष्ठा करता है। जो पूरे ब्रह्मांड में जिंदा और प्रत्यक्ष विचरण कर रहे होते हैं। लेकिन ऐसे कई लेखकों की कलम बाजार में नहीं चलती उनका क्या? क्या वे लेखक नहीं? क्या उन लेखकों की नजर कमजोर है? या पढ़ने वालों की? जिनकी नजरें उन्हें या तो नजरअंदाज करती हैं या फिर काल्पनिक, घटिया और बाजारू कहानियों पर यकीन वे रखते हैं! क्योंकि उन्हें चौंकाने वाली, अचंभित करने वाली कहानियां पढ़ने में आनंद आता है। अब यह लेखक दिखाता है अपनी शक्ति। और उस लेखकीय शक्ति से घटनाएं तेजी से बदलती रहती हैं। और एक के बाद एक रहस्य से पर्दा खुलता है जैसे मानो प्याज की परतें खुल रही हों एक के बाद एक।

इस लेखक की तरह ही इस दुनिया में हजारों ऐसे लेखक हैं, जिनके पात्रों में पीड़ितों की वेदना वाले, दलित वाले, दहेज की सताई हुई स्त्रियां, मजदूर, पूंजीपति के पात्रों को समाज में जब जगह नहीं मिलती तो वे आते हैं लेखकों के पास। और वे इनकी कहानियां लिखते हैं। उनके भावों को स्थान देते हैं अपने शब्दों में। और जब ये भावनाएं शब्दों का जामा पहनकर लौकिक से अलौकिक या अतिलौकिक की यात्रा करती हैं। या फिर स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म की।

फ़िल्म की शुरुआत में एक तरह से सूत्रधार के रूप में जब इस फ़िल्म के लीड एक्टर ‘यशपाल शर्मा’ कहते हैं – “शब्द जब पहुंचता है कानों में तब तक रोशनी आंखों के सहारे समय के घंटे घोषित कर चुकी होती है। हमारे मस्तिष्क में देखने और सुनने के बीच जो थोड़ा सा अंतर पड़ता है। उन्हीं लम्हों में छुपे होते हैं कई सारे और लम्हे। समय यानी लम्हे को रोशनी सबसे पहले छू लेती है दूरी के अनुसार। क्योंकि दूरियां ही तो तय करती हैं समय समय की बात। अनदर डाइमेंशन ऑफ टाइम्स। आंखें जिसे देख नहीं पाती। यह वस्तु जगत जिसे महसूस नहीं कर सकता। ऐसा बहुत कुछ समानांतर एग्जिस्ट करता है पूरी दुनिया में। इसमें एक चींटी का भी पूर्ण जीवन चक्र संपादित होता है। यानी अनदर डायमेंशन ऑफ टाइम्स में अनदर डायमेंशन ऑफ टाइम्स। इसलिए सिर्फ आंखों के भरोसे समय का सही हिसाब लगाना घटना को गलत समय पर ठिकाने पर पहुंचा सकता है। कुछ बातों को आंखें बंद करके ही महसूस करना पड़ता है। खुली आंखों से जो नजर नहीं आता बंद आंखों से भी उसकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। छठी इंद्री यानी सिक्सेंस के जरिए। शब्द तरंगों को छूकर जैसे सांप थोड़ी सी भी हलचल सूंघ लेता है, चमगादड़ ढूंढ लेता है अपना आहार। वैसे ही कहते हैं छिपकली सुन लेती है हमारे घरों की दीवारों में घूमते हुए हर शब्द को, ध्वनि को, प्रतिध्वनी को आप की उपस्थिति में भी। घर के हर विषय और शब्द को कर लेती हैं वो अपनी नजरों में कैद।” तब यह फ़िल्म आपको अपने विषय से लेकर अचंभित करती है उससे कहीं ज्यादा अपने नाम को लेकर भी।

साथ ही फ़िल्म की शुरुआत में आने वाला यह संवाद इस फ़िल्म की दशा और दिशा तय कर देता है। दशा और दिशा भी ऐसी-वैसी नहीं। बल्कि एक मजबूत दिशा की आहट के साथ। इतना तो तय है कि यह फ़िल्म ढेरों फ़िल्म फेस्टिवल्स में अपनी कहानी, एक्टिंग और डायलॉग्स के साथ-साथ बेस्ट डायरेक्टर का भी अवॉर्ड अपने नाम करेगी।

दरअसल यह फ़िल्म किसी थ्रिल या रहस्य के अलावा साहित्यिक नजरिये से भी आपको देखने का अवसर देती है। क्योंकि एक साहित्यकार की कहानी ही इसमें सिमटी हुई है। वे साहित्यकार जो अपने लेखन से उस साहित्य की सृजना करते हैं जो लौकिक साहित्य से अलौकिक की यात्रा तय करता है। लौकिक साहित्य जो लोक संवेदना से उपजकर उसका संवर्धन, संचयन और प्रकटीकरण करता है। तथा लोक जीवन से अविच्छिन्न रहकर उसी लोक का कण्ठहार बन जाता है। जिसके संरक्षण का दायित्व भी लोक द्वारा ही निभाया जाता है। और अलौकिक में सब परे जगत की बातें होती हैं।

Movie Review Chhipkali

वैसे एक बात तो है कि पिछले कुछ सालों से फिल्म फेस्टिवल की महत्ता बड़ी है। जिसके चलते हुए विश्व स्तरीय सिनेमा तथा लीक से परे हटकर बनाया जा रहा सिनेमा पसंद करने वालों की तादाद भी बढ़ रही है। ऐसी ही एक फिल्म ‘छिपकली’ जो ‘दूसरे काशी इंडियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ दिल्ली में दिखाई गई थी। जिसमें अभिनेता ‘यशपाल शर्मा’ को बेस्ट एक्टर का अवार्ड दिया गया था। नाम है ‘छिपकली’ , इस फिल्म की पहली बार स्क्रीनिंग हुई। अब दूसरी बार स्क्रीनिंग इसकी राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में 25 से 30 मार्च को होने वाले फ़िल्म महोत्सव में जोधपुर में दिखाई जाएगी। अभी यह लगातार एक-दो साल तक फिल्म फेस्टिवल्स की सैर करेगी। उसके बाद ही इसकी रिलीज डेट तय की जाएगी। हालांकि ऐसी फिल्मों को फेस्टिवल का सिनेमा ज्यादा कहा जाता है।

फ़िल्म के डायरेक्टर ‘कौशिक कर’ इससे पहले बंगाली में एक फ़िल्म डायरेक्ट कर चुके हैं। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म है। डायरेक्शन के अलावा वे ‘पोर्नोमोची’ , ‘एक जे छीलो राजा’ , ‘व्योमकेश पवरवो’ जैसी बंगाली फिल्मों में अभिनय भी कर चुके हैं। जिनके तो नाम भी आपने शायद ही सुने हों। डायरेक्शन में कहीं कोई कमी नजर नहीं आती। एक-एक सीन बेहतर लगता है। कहीं कुछ कमी लगती भी है तो यह फ़िल्म जैसे-जैसे अपनी फेस्टिवल्स की यात्रा करेगी तो वहां से आने वाली प्रतिक्रियाओं के बाद सम्भव है उन छिटपुट कमियों को भी ठीक कर लिया जाएगा। फ़िल्म को प्रोड्यूस किया है स्वान सीवर स्क्रीन ने और एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर्स ‘कौशिक रॉय’ , ‘तनिष्ठा बिस्वास’ , ‘कौशिक कर’ स्वयं हैं।

एक्टिंग के मामले में ‘यशपाल शर्मा’ , योगेश भारद्वाज’ अपने उम्दा अभिनय से इसमें प्राण डालते हैं। यशपाल शर्मा जब-जब अपने कैरेक्टर के माध्यम से उस लेखक के अंतर्मन में झांककर अभिनय करते हैं तब-तब आपकी मुठ्ठियाँ कस कर भींच जाती हैं। सम्भव है उस पात्र को देखते-समझते हुए आप उस गहराई में उतर जाएं तो आपकी उन कसी हुई मुठ्ठियों में पानी उतर आए। वहीं ‘योगेश भारद्वाज’ दूसरे लीड रोल में भरपूर साथ निभाते हैं। जिसके चलते उन्हें भी किसी फेस्टिवल में बेस्ट स्पोर्टिंग एक्टर का खिताब मिले तो अचंभित न होइएगा। कुछ देर के लिए आने वाले अन्य एक्टर्स ‘तनिष्ठा बिस्वास’ , डायरेक्टर ‘कौशिक कर’ स्वयं ‘कृष्णेन्दू अधिकारी’ , ‘नाबनिता डे’ भी फ़िल्म की कहानी को मजबूती से आगे बढ़ाते हैं।

सौरव बैनर्जी का छायांकन उम्दा है लगभग हर जगह। एडिटर ‘पबित्रा जाना’ की एडिटिंग कसी हुई नजर आती है। गानों को जिस तरह से कोरियोग्राफर ‘सुभाष अधिकारी’ ने कोरियो किया है वह भी लाजवाब है। लेकिन ‘मीमो’ का म्यूजिक और ‘गोविंदा’ का कलरिंग वाला काम इन सब अच्छाई में हल्का नजर आता है। और यहीं यह फ़िल्म थोड़ी सी मात खाती है। लाइटिंग, बैकग्राउण्ड स्कोर, कॉस्ट्यूम, कास्टिंग , मेकअप, वीएफएक्स आदि किसी में कुछ जो कमियां जाहिर होती हैं वे धीरे-धीरे आगे सुधार ली जाएं तो यह फ़िल्म सभी के लिए यादगार हो सकती है। गानों के मामले में ‘जिंदा हूँ मैं’ गाना जिस तरह फिल्माया गया है उसे गहरे जाकर ही उसके लिरिक्स के साथ-साथ उसके मायने समझ आते हैं। यह गाना और फ़िल्म के दूसरे गाने फ़िल्म को देखने में दिलचस्पी बनाए रखने में कामयाब हुए हैं। एक बंगाली गाना भी इस फ़िल्म में नजर आता है। कहानी, स्क्रीनप्ले, डायरेक्शन करने वाले ‘कौशिक कर’ के संवादों के लिए, कहानी के लिए विशेष रूप से यह फ़िल्म तारीफ के लायक है।

अपनी रेटिंग – 4 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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