Friday, September 17, 2021

रिव्यू: देखने लायक है ये ‘चेहरे’

समीर मेहरा नाम का एक आदमी, जो एक एड फिल्म कंपनी चलाता है। इसीलिए वह शूटिंग के सिलसिले में पहाड़ों में जाता है। वहां से फिर काम खत्म कर दिल्ली जा रहा है। जाते हुए बीच पहाड़ों की बर्फीली वादियों में फंसता है। उसे जाना था दिल्ली और पहुंच जाता है एक कोर्ट में। भला चंगा आदमी अपने काम से जाते हुए बीच राह कोर्ट कैसे पहुंचा? जबकि उसने कोई गुनाह, कोई अपराध भी नहीं किया।

पहाड़ों के मुश्किल रास्तों की इस मुश्किल स्थिति में समीर को वहां एक आदमी मिलता है और वो उसे मौसम के सुधरने तक दोस्त के घर ले आता है। वह आदमी है भुल्लर साहब, अब समीर की मुलाकात उसके बाकी दोस्तों से होती है। उनके दोस्तों में एक है जगदीश आचार्य, जो कि रिटायर्ड जज है। हरिया जाटव जो रिटायर्ड जल्लाद हैं और लतीफ ज़ैदी जो रिटायर्ड वकील है। इन बुजुर्ग लोगों के पास करने को कुछ काम नहीं है, इसलिए रोज रात ये लोग एक कोर्ट रूम ड्रामा रचते हैं। उस रास्ते आने-जाने वाले अजनबियों को मुजरिम बना फैसला सुनाते हैं। कभी-कभी किसी पुराने चर्चित केस की सुनवाई भी करते हैं। इसी खेल में वे समीर को भी शामिल करते हैं। मगर धीरे-धीरे ये खेल गम्भीर होने लगता है। मगर आपको उसकी गंभीरता का आभास कहीं-कहीं हल्का भी पड़ता है।

हमारे देश में बड़ी से बड़ी वारदात हो जाए तो भी रिपोर्ट लिखवाने से लोग डरते हैं। ऐसे में वे लोग शॉर्ट कट को ही बेहतर समझते हैं। और शॉर्ट कट आदमी को सोच समझकर लेना चाहिए जिंदगी में शॉर्ट कट खतरनाक साबित हो सकते हैं। वैसे भी इंसान का वजूद फ़िल्म के डायलॉग्स के मुताबिक लालच, हसद , शर्मिंदा होने के डर पर टिका है। वैसे असलियत में भी इंसानी वजूद इन तीन चीजों पर ही टिका हुआ है।

लेकिन इस बीच फ़िल्म आपकी, हमारी दुनिया का सच भी दिखाती, बताती है कि ‘ईमानदार वो है जिसे बेईमानी करने का मौका न मिला। और बेगुनाह वो है जिसे जुर्म करने का मौका न मिला। लेकिन आज के दौर में आज ईमानदार वो है जिसका जुर्म न पकड़ा गया।’ जो कि सच भी है। लेकिन ये वकील, जज लोग जो फैसला सुनाते हैं वो कभी-कभी इनके फैसलों से अलग होते हैं। जो पहले ही दिए जा चुके हैं। हमारी असली अदालतों में मुकदमें के दौरान बहुत कुछ होता है। जिसमें सच, झूठ, सजा का डर, लालच, पैसा, दुश्मनी सब शामिल हैं। कारण यह भी है जो फ़िल्म बताती है कि ‘इस दुनिया में कोई भी बंदा ऐसा नहीं है जिसने कोई अपराध न किया हो। छोटा या बड़ा हर बंदे की आत्मा पर किसी न किसी अपराध का बोझ बना ही रहता है।’

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फ़िल्म भी इसी अपराध भरे कोर्ट रूम ड्रामा की सरगर्मी और बर्फीली वादियों की ठंडक में कुछ गर्मी पाती है तो कुछ पिघलती है। एक्टिंग के लिहाज से अमिताभ बच्चन द्वारा इस फ़िल्म में की गई एक्टिंग पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। लेकिन उनके हिस्से जो लंबी चौड़ी भूमिका आई वह उनकी ही फ़िल्म ‘पिंक’ और ‘102 नॉट आउट’ के बाद तीसरे नंबर पर ही रखी जाएगी। धृतिमान चटर्जी, इमरान हाशमी, अन्नू कपूर, रघुबीर यादव, सिद्धांत कपूर सभी असरदार लगे और जंचे भी। रिया चक्रवर्ती जब-जब सीरियस हुई तभी ठीक लगी, हंसी-मजाक करते हुए वह भटकती है। क्रिस्टल डिसूजा के पास ज्यादा करने को कुछ था नहीं।

गीत-संगीत के मामले में दो ही गाने थीम सांग और ‘रंग दरिया’ हैं, जो कि ठीक हैं। कॉस्ट्यूम, वीएफएक्स, बैकग्राउंड स्कोर, मेकअप, लुक, सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, भारी-भरकम डायलॉग इन सभी मामलों में कहीं-कहीं गोते खाकर संभलती है। कुलमिलाकर फ़िल्म एक अच्छी फ़िल्म है और इसे देखने का मजा थियेटर में ही ज्यादा आएगा। ऐसी फिल्मों में बी०जी०एम एक महत्वपूर्ण पहलू होता है लेकिन इसका बी०जी०एम० काफी हद तक कमजोर पड़ता है। लेकिन वो कहते हैं न ‘होना एक दिन सबका हिसाब है जिंदगी कर्मो से लिखी किताब है’।

तो बस यह फ़िल्म भी रूमी जाफरी , रंजीत कपूर की अब तक लिखी गई, बनाई गई फिल्मों की अच्छी किताब है। बस थोड़ा काट-छांट करके कैंची चलाई जाती तो इन चेहरों की शक्ल बेहतरीन हो सकती थीं। जल्द ही यह फ़िल्म अमेजन प्राइम पर भी नजर आएगी।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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