Friday, September 17, 2021

रिव्यू: आधे लोगों की अधूरी पूरी ‘ब्रीड’

ईश्वर की बनाई इस दुनिया की आबादी आज 700 करोड़ (7 अरब) पार कर चुकी है। जिसका अनुमानित 2 फीसदी हिस्सा न तो नर है न ही नारी। फिर क्या है वे? दरअसल समाज ने जिन्हें हिजड़ा, छक्का, बायक्का , गे, लेस्बियन न जाने क्या-क्या कहकर उन पर कीचड़ उछाले, तोहमतें लगाईं। उन्हीं शरीर से आधे लोगों की कहानी यह फ़िल्म कहती है।

यूं भी हमारे समाज का ताना-बाना मर्द और सिर्फ़ औरत से मिलकर बना है। लेकिन इन सबके बीच एक तीसरा जेंडर भी हमारे समाज का हिस्सा है सदियों से, महाभारत काल से ही यह समाज हमारे साहित्य, किस्से-कहानियों में अपनी एक अलग भूमिका निभाता आया है। बावजूद इसके इनकी पहचान कुछ ऐसी है कि जिसे सभ्य समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता। समाज के इस वर्ग को थर्ड जेंडर, किन्नर या हिजड़े के नाम से जाना जाता है।

फ़िल्म की कहानी है सकीना बानों की, उसके जीवन में घटी सत्य घटनाओं की। जिसमें जुबैदा, रेहाना, काज़ी साहब, रुखसाना, प्रवेश राणा, वजीर, वसीम हैदर, रुबीना जैसे लोग भी हैं। कुछ सकीना बानों के समाज का हिस्सा है तो कुछ साधारण तथाकथित समाज का। अब इस सकीना का जीवन कैसा है, कैसे यह शान से जीती है बावजूद इसके की वह उस निम्न, घृणित समाज का हिस्सा है। लेकिन इस बाहरी शानो-शौकत के पीछे उसका दर्द भी बार-बार कर उभर कर आता है। हर बार जब यह दर्द उभरता है तो उसमें छिपा हुआ ममत्व ही उभर पाता है।

कहानी तथा उद्देश्य के लिहाज से यह फ़िल्म बढ़िया है लेकिन इसके लिए इस्तेमाल किए गए उच्च स्तरीय कैमरे का ठीक से संयोजन सिनेमैटोग्राफी के साथ न बैठ पाना फ़िल्म की हत्या करता है। फ़िल्म का लुक हल्का होने तथा किसी भी तरह का वीएफएक्स में ज्यादा वजन न होना उसे ज्यादा चमकदार और चमकीला न बनाने के पीछे एक्टर, लेखक, निर्देशक बॉबी कुमार की सोच सम्भवतः फ़िल्म को रियल लुक देना रहा हो।

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गानों के मामले में चाहे वह ‘जावेद अली’ की आवाज में ‘आज मैं नाचूंगी’ हो या ‘ऋचा शर्मा’ की आवाज में ‘रंग नहीं है’, ‘जसपिंदर नरूला’ की आवाज में ‘मौला अली अली’ , ‘सुनिधि चौहान’ की आवाज में ‘आधी सी रात’ गाने सभी कर्णप्रिय बन पड़े हैं। कहानी के अलावा इन गानों की वजह से ही फ़िल्म दिल जीतती है लेकिन जिस तरह से गाने कोरियोग्राफ किए गए, फिल्माए गये ठीक उसी तरीके से फ़िल्म के बाकी हिस्से को फिल्माया जाता, बेवजह के एक्शन सीन थोड़े कम किए जाते। कास्टिंग पर अच्छा काम या थोड़ी मेहनत की जाती तो फ़िल्म यादगार बन सकती थी। एक्टिंग के मामले में बॉबी कुमार ने इससे पहले ‘अग्निपथ’ तथा ‘जोधा अकबर’ जैसी बड़ी फिल्मों में अभिनय करके अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। वहीं अन्य कलाकारों में काजी साहब बने फसीह चौधरी एक आध जगह तथा प्रवेश राणा बने इशमीत सिंह ठीक लगे। शाहिद के बचपन वाले हिस्से का छोटे बच्चे के रूप में किरदार निभाने वाले प्रतीक शर्मा जंचे। लेकिन अन्य कलाकार अभिनय के क्षेत्र में कच्चे खिलाड़ी तथा भविष्य में छोटी रेस के घोड़े भी साबित हों तो ज्यादा अचंभा नहीं कीजिएगा।

इससे पहले साल 2020 में कई ओटीटी प्लेटफॉर्म पर एक शॉर्ट फ़िल्म ‘खुशियां अधूरे आँचल की’ से निर्देशन में हाथ आजमाने वाली बॉबी कुमार के अंदर कुछ सीखने एवं प्रयोग करने की जिजीविषा भी नजर आती है। भारतीय सिनेमा में एलजीबीटी कम्युनिटी से ताल्लुक़ रखने वाले एक्टर, निर्देशक कई हुए हैं। लेकिन उन्होंने सभी ने उनके असली जीवन को पर्दे पर कभी ठीक से छुआ, जीया ही नहीं।

लेकिन ऐसी फिल्मों को बनाने के पीछे जब उद्देश्य अच्छा हो, सोच तथा विचारों से लेखक, निर्देशक समृद्ध हो तो ऐसी कमियां नजर अंदाज कर देनी चाहिए। लेकिन उम्मीद है निर्देशक बॉबी अपने निर्देशन में भी सुधार करेंगी तथा अपने समाज के इन आधे-अधूरे लोगों की जिंदगियों को तथा उनके स्याह पहलुओं को भी अगली बार और बेहतर तरीके से उभार पाएंगीं। फ़िल्म की संभावित रिलीज तारीख 11 सितंबर 2021 बताई जा रही है।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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