Friday, September 17, 2021

रिव्यू: अंधविश्वासों की ‘भूत-पुलिस’

हिंदी सिनेमा में कुछ लोगों ने हॉरर कॉमेडी का मसाला मिलाकर फिल्में क्या बनाई उसके बाद इसे एक सैट पैटर्न ही समझ लिया गया। यही वजह है कि हाल के दशक में हॉरर कॉमेडी फिल्मों के नाम पर ‘गो गोवा गॉन’, ‘गोलमाल अगेन’, ‘भूल भुलैया’, ‘स्त्री’, ‘रूही’ जैसी कुछ मज़ेदार, दमदार तो कुछ हाज़मा बिगाड़ने वाली फिल्में पर्दे पर आईं।

भूत पुलिस भी उसी हॉरर कॉमेडी के सैट पैटर्न पर चलती हुई कभी लुड़कती है, कभी पटरी पर दौड़ लगाती है तो कभी अंधविश्वास को बढ़ाते हुए अंत में जाकर संवेदना जगाने की नाकाम कोशिशें करती हैं। सैफ अली खान, अर्जुन कपूर , जैकलीन फर्नांडीज , यामी गौतम, जावेद जाफरी , अमित मिस्त्री, जेमी लिवर स्टारर इस हॉरर कॉमेडी ‘भूत पुलिस’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म डिज़्नी प्लस हॉटस्टार ने रिलीज़ किया है।

पवन कृपलानी निर्देशित ‘भूत पुलिस’ में विभूति (सैफ अली खान) का छोटा भाई चिरौंजी (अर्जुन कपूर) भूतों को भगाने वाले बाबा हैं। बड़ा भाई विभूति अपने बाबा (पिता) को अपने जैसा ही ढोंगी मानता है जबकि छोटा जिसे उसके बाबा मरने से पहले एक किताब देकर गए थे। हजारों साल पुरानी लिखी इस किताब में भूत-प्रेत भगाने के मंत्र और विधियां लिखी हुई हैं। जिन्हें एक दिन चिरौंजी पढ़ने, समझने में कामयाब हो जाता है। भूत भगाने की इस प्रक्रिया में एक दिन वे धर्मशाला में सिलावर फैक्ट्री पहुंचते हैं और वहां से शुरू होती है इनकी असली परीक्षा।

अब क्या ये भूत यानी किचकण्डी को भगाने में कामयाब होंगे? या कहानी का ऊंट कोई और ही करवट बैठेगा। ये असली किचकण्डी कौन है और कहाँ से आई है? ये सब फ़िल्म के क्लाइमेक्स में आते-आते पता चलता है। जिन्हें हॉरर कॉमेडी के साथ कुछ समझना और महसूस करना होगा वे उस संदेश को बिना किसी भूमिका के जैसे फ़िल्म में वह आता है उसे समझ पाएंगे। फ़िल्म पहले हाफ तक सिर्फ हंसाती है और लचर सी कहानी पेश करती है। वहीं सैकेंड हाफ में कुछ सीन कहानी को बल देते हैं।

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इसका गीत-संगीत बेहद कमजोर पक्ष है। बैकग्राउंड स्कोर, सिनेमैटोग्राफी, वीएफएक्स मिला-जुला असर छोड़ते हैं। कैमरा ने अपना काम ठीक तरीके से करने की कामयाब कोशिश की। एक्टिंग के मामले में यामी गौतम बीच-बीच में आकर कहानी को आगे ले जाने और उसे बढ़ाने का काम बखूबी करती है। लेकिन जैकलीन फर्नांडीज एक्टिंग भले न कर पाई हों फिर भी खूबसूरत और हॉट लगने का काम उसने तसल्ली से किया है। सैफ़ अली खान कुछ नया नहीं करते लेकिन अर्जुन कपूर इस मामले में सैफ से इक्कीस रहे। वहीं जेमी लीवर, जावेद जाफरी छाप छोड़ने में कामयाब रहे।

फ़िल्म का सबसे कमजोर पहलू इसकी कहानी में सिर्फ और सिर्फ कॉमेडी का तड़का लगाना रहा। कोई भी भूत के रूप में डराने में सफल होता नहीं दिखाई देता। जबकि हॉरर कॉमेडी फिल्मों में चाहिए कि वे मनोरंजन करने के साथ ही डराए भी और एक संदेश भी देकर जाए। लेकिन फ़िल्म में इन सबकी कमी खलती है। बिन जाने मान लेना अंधविश्वास है और बिन जाने ठुकरा देना उससे भी बड़ा अंधविश्वास है। जब फ़िल्म ऐसा कहती है तो उसे बनाने वाले खुद उस बात को क्यों भूल गए यह समझ से परे है। हां फ़िल्म के नाम से आपको थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन ये नाम इसलिए ऐसा है क्योंकि भूतों को भगाने वाले उन्हें कैद करने वाले बाबाओं को पुलिस के रूप में रखा गया है।

हमारे देश में बंगाली बाबा, एक्सप्रेस बाबा, डोंगल बाबा, बुलेट बाबा, उलट बाबा, सुलट बाबा , पुलट बाबा न जाने कितने बाबाओं की फौज बनी हुई है। इन बाबाओं ने ही हिंदुस्तान को ही नहीं इस पूरी दुनिया को मायाजाल कहकर हमें इन चक्करों में फंसाया है। लेकिन ये ‘भूत-पुलिस’ भी उन चक्करों से बाहर ला पाने में नाकाम साबित होती है। और अंधविश्वासों के घड़े में कभी मजेदार तो कभी हल्के-हल्के ही सही आपको बंद करके चली जाती है।

अपनी रेटिंग – ढाई स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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