Saturday, September 24, 2022

रिव्यू: परफेक्ट से बेस्ट होती ‘बेस्टसेलर’

वेबसीरीज आज के दौर की देखी जाएं तो बेहद कम ही ऐसी होती हैं जो रचनात्मक स्तर पर ऊंचा मकाम पाए। अधिकांश में सैक्स, कॉमेडी, वाहियात सीन दिखाकर बस अपनी जेबें भरने का काम किया जाता है। लेकिन अमेजन प्राइम पर इस हफ्ते आई एक सीरीज ‘बेस्टसेलर’ इन सबसे कहीं अलग है यह तो मानना पड़ेगा। अंग्रेजी के चर्चित उपन्यासकार ‘रवींद्र सुब्रमणियन’ के नॉवेल ‘द बेस्टसेलर शी रोट’ पर आधारित है ये सीरीज। जिसमें कुछ सिनेमैटिक छूट ली गई है ऐसा बताया जा रहा था।

हालांकि पूरी तरह उपन्यास या कहानियों पर फिल्में, सीरीज आदि बनाई भी नहीं जाती। वरना वे बेस्टसेलर कहानियां उस जैसा ही सिनेमा अगर परोसे तो सम्भव है कहीं कुछ कमी उनमें रह जाए। इस सीरीज में एक लड़का है जो उपन्यासकार है। पहला नॉवेल उसका पीट गया। लेकिन दूसरे नॉवेल ‘रांड सांड सीढ़ी सन्यासी’ ने मार्केट में धूम मचा दी और वह बन गया बेस्टसेलर। लेकिन उसके बाद 10 साल गुजर गए कोई नई कहानी वह उपन्यास के रूप में न लिख सका। उसकी एक गर्लफ्रेण्ड जिसके साथ वह रहता है, वो बॉलीवुड से ताल्लुकात रखती है। इसलिए घर भी अच्छा बना हुआ है। और लेखक साहब खूब मजे में जी रहे हैं। अब अचानक एक दिन एक रेस्टोरेंट में उसकी फैन मिलती है उसे। और वह अपने हाथ पर लगे तीन चोट के निशान दिखाती है। अब ये तीन चोट उसे कैसे आई? क्या उसने खुद लगाई? या इसके पीछे भी कोई कहानी जुड़ी है? यह फैन कहां की रहने वाली है? ये सब बातें धीरे-धीरे मालूम होती हैं।

शुरुआत के एक-दो एपिसोड में आपको उबाऊ सी लगने वाली यह सीरीज बाद में बांधने लगती है। कहीं-कहीं यह हल्की होती है तो तुरंत ही सीन बदलने के साथ फिर से अपने आपको पटरी पर ले आती है। अब हुआ ये कि ये फैन उसी लेखक के पीछे पड़ गई। उसे मारने के लिए। कहानी में जैसे ही ट्विस्ट आता है वैसे ही इसका बैकग्राउंड स्कोर और अधिक आपको सीरीज जल्दी से खत्म कर लेने को लालायित करता है।

अब ये बेस्टसेलर उपन्यासकार जो अपने नॉवेल का दूसरा हिस्सा निकालने की सोचता है तो उसी समय उस पर कुछ आरोप भी लगते हैं। क्या ये आरोप? कहानी चुराने के आरोप तो कई बार लेखकों, फ़िल्म कारों पर लगे हैं। लेकिन इसने किस तरह कहानी चुराई यह जानना ज्यादा दिलचस्प रहता है।

परफेक्ट से बेस्ट होती इस ‘बेस्टसेलर’ सीरीज की कहानी में कुछ जगह आपको अखरन महसूस होती है। मेकअप को लेकर हो या गेटअप, लुक आदि के अलावा कहानी को ज्यादा लम्बा खींचकर 8 एपिसोड तक ले जाने की अखरन। ये कुछ बातें जरूर आपको परेशान करेंगी। फिर भी इस सीरीज को इत्मीनान से देखना ही फायदे का सौदा होगा।

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सीरीज में जहां तक एक्टिंग की बात है तो ताहिर के रूप में ‘अर्जन बाजवा’ और पार्थ बने ‘सत्यजीत दूबे’ खासे प्रभावित करते हैं। इसके अलावा ‘मिथुन चक्रवर्ती’ , ‘राजेश जैश’ , ‘श्रुति हासन’ , ‘गौहर खान’ , ‘सोनाली कुलकर्णी’ , ‘सुचित्रा पिल्लई’ आदि लगातार बीच-बीच में आकर अपना काम स्वाभाविक तरीके से करते हुए कहानी को आगे तथा ऊंचा उठाने में भरपूर कोशिश करते नजर आते हैं।

‘अन्विता दत्त’ और ‘आथिया’ ने मिलकर कहानी तो अच्छी लिखी है। जो आज के समय में कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी तरीके से आपको इसके कम अंश के रूप में ही सही देखने को जरूर मिली होंगी। निर्देशक ‘मुकुल अभ्यंकर’ का काम अच्छा है। लेकिन अगर सीरीज को थोड़ा सा और काट-छांट करके कम किया जाता तो सीरीज ज्यादा प्रभाव जमाती। यही कारण है कि इसके 8 एपिसोड ज्यादा लगते हैं। अगर उन्हें एपिसोड की संख्या आठ ही रखनी थी तो इस सीरीज की टीम को चाहिए था कि कम से कम 35-40 मिनट एक एपिसोड को जो दिए गए हैं उसी में थोड़ा कंजूसी कर लेते।

एडिटर, सिनेमैटोग्राफर, कैमरामैन का कैमरावर्क आदि का काम ज्यादातर समय आपको सुकून पहुंचाता है। कैमरे से कई शानदार फुटेज भी ली गईं हैं सीन के तौर पर। जो आपको उन जगहों पर जाने के लिए विवश कर सकती है। बैकग्राउंड स्कोर और कॉस्ट्यूम आदि भी किरदारों के अनुसार जंचते हैं। कास्टिंग डॉयरेक्टर को अलग से इस काम के लिए बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने एक-एक किरदारों को काफी अच्छे तरीके से चुना है।

ऐसी सीरीज सत्यता के पैमानों पर भले खरी न उतरती हों लेकिन सत्यता के करीब जरूर आपको खड़ी नजर आती हैं। अमेजन प्राइम पर उपलब्ध इस सीरीज का दूसरा सीजन भी आने वाला है। इसलिए इसके पहले भाग में जो कमियां है या कहानी के जिन अंशों को नहीं दिखाया गया है वे सब दूसरे सीजन में जब आएंगे तो सीरीज के दोनों पार्ट को एक साथ देखना भी ज्यादा अच्छा रहेगा। क्योंकि जिस धड़ल्ले से सिनेमा हमारे बीच आता जा रहा है। हमारे घरों-बिस्तरों तक उसने दस्तक दी है, उस भीड़ में वे कहानियां कहीं खोने सी लगती हैं। इस सीरीज की चमक फीकी न हो आपके लिए इस लिहाज से भी आप इसके दोनों सीजन एक साथ देख सकते हैं। अगर आपकी याददाश्त कमजोर नहीं है तो।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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