Friday, September 17, 2021

रिव्यू: काश थोड़ी और कसी होती ‘बेलबॉटम’

साल 1978 भारत के रिश्ते कहने को पाकिस्तान से ठीक थे। व्यापारिक नियमों में ढील बरती जा रही थी, एल ओ सी पर सीज फायर था लेकिन बावजूद इसके अंदरूनी तौर पर मुश्किलें भारत के लिए बढ़ती ही जा रही थी। कारण था तो सिर्फ एक के बाद एक प्लेन हाई जैक होना, राष्ट्र विरोधी गतिविधि जारी रहना। पांच साल और सात बार हाई जैक, आतंकी, पैसा, लोगों की बेवजह मौत सब चल रहा था। फिर आया एक देवदूत बनकर जिसे नाम दिया गया ‘बैल बॉटम’

बैल बॉटम या बेलबॉटम चौंकिए मत। कुछ भी कह लो क्या फर्क पड़ता है! वैसे फ़िल्म बनाने वालों ने तो इसे ‘बैल’ ही लिखा है। शायद इसीलिए उस बैल के तीखे सींगों की तरह यह भी अपने तेवर, क्लेवर, फ्लेवर से तीखी जरूर है लेकिन कसी हुई कम नजर आती है। कहानी की बात करें तो जब ये एक के बाद एक प्लेन हाई जैक हो रहे थे तो उससे बचने के लिए एक ऐसा आदमी लाया जाता है जो कई भाषाओं का ज्ञान रखता है और रॉ में अपनी आंख,नाक, कान सब चौकन्ने रखता है। अब जब प्लेन फिर से हाई जैक होता है तो वह अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाता है और इल्ज़ाम लगता है पाकिस्तान पर और उसके एक आतंकी गुट आई एस आई पर। अब किस तरह वह प्लेन में बैठे यात्रियों को सुरक्षित निकालकर लाएगा बस उसी के इर्द-गिर्द कहानी को रचाया-बसाया गया है।

ये बेलबॉटम यानी अक्षय कुमार की एंट्री जैसे ही पर्दे पर होती है तो सिनेमाहॉल में सीटियां बज उठें तो बजने दीजिएगा। क्योंकि महाशय कुछ समय पहले एक गैर-राजनीतिक इंटरव्यू लेते भी नजर आए थे। अब उनके नाम के साथ ‘द अक्षय कुमार’ या ‘अक्षय भारत कुमार’ भी जोड़ दिया जाना चाहिए। वे ऐसी ही फिल्में राष्ट्रवाद को और हवा देने के लिए ही तो बना रहे हैं। लेकिन इसी राष्ट्रवाद की आड़ में एक जगह रॉ की तुलना कुत्ते से भी की जाती है। संवाद कुछ इस तरह है- ‘एक बार एक छोटे कुत्ते ने अपनी मां से पूछा कि पिताजी कैसे दिखते थे? इस पर मां ने जवाब दिया -पता नहीं वे एक दिन वह पीछे से आए और चुपचाप पीछे से ही चले गए। रॉ वही पिताजी है।’ अब कोई आपत्ति दर्ज क्यों नहीं कर रहा क्या यह रॉ का अपमान नहीं? जहां पूरी दुनियां में बेहतरीन खुफिया एजेंसियों में रॉ का नाम भी शामिल है वहां उसे कुत्ता कहना या उस सरीखा बताना कौन सी देशभक्ति है भाई? बताना जरा।

खैर 1978 से 1984 तक के भारत को फ़िल्म में एक्टिंग, कहानी, वीएफएक्स, बैकग्राउंड स्कोर, म्यूजिक, लोकेशन, मेकअप, फ़िल्म लुक, एडिटिंग, गीत-संगीत हर किसी का साथ अच्छा मिला। लेकिन बावजूद इसके एक जगह संवाद आता है – ‘अगले 20 मिनट में प्रगति मैदान के सामने बीएसएफ कैम्पस पहुंचो। तब वहां कैम्पस की जगह नजर आता है दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस का प्रतिष्ठित कॉलेज किरोड़ीमल कॉलेज’ जिसके गेट पर बड़ी ही खूबसूरती से एडिटर ने बीएसएफ चिपका दिया लिखकर। लेकिन जनाब मेरे जैसे लोग जो पढ़ने ही तीन साल उस कॉलेज में गए तो क्या वो इतनी बड़ी बात नहीं पकड़ पाएंगे। ठीक है आप लोकेशन कैसे भी कहीं भी बना सकते हो। लेकिन जब फ़िल्म की कहानी में इतना दिमाग लगाया तो इस पर भी थोड़ा ध्यान दे लेते।

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इसके अलावा देशभक्ति भी म्यूजिक से आप जगा रहे हो तो कम से कम टीवी पर दूरदर्शन नेशनल के साथ नेशनल का अंतर तो देख समझ लेते। और ये दिव्यांग शब्द तो हमारे आपके प्रिय मोई जी ने दिया है। तो कॉंग्रेस के समय की कहानी कहना उसमें मोदी जी वाले नए नामकरण घुसेड़ना। चलो आम आदमी करीबन डेढ़, दो साल बाद थियेटर में फ़िल्म देखने जाएगा और वह इतना सब बारीकी से नहीं देखेगा, क्या यही सोचकर ये गलतियां आपने होने दीं?

एक्टिंग के लिहाज से अगर एक-एक एक्टर की बात करने लगूं तो कुल 100 से ज्यादा लोगों की लंबी लिस्ट है। इसलिए बस इतना समझ लें एक्टिंग सबकी कुलमिलाकर अच्छी है। अक्षय कुमार पर उम्र का प्रभाव नजर नहीं आता उतना तो वहीं लारा वाह क्या मारा। ये लारा क्रिकेट स्टार लारा नहीं ये बॉलीवुड स्टार लारा दत्ता की बात कर रहा हूँ। लारा पहचानी ही नहीं जाती। मेकअप उनका इतना रिलिस्टिक बन पड़ा है कि उसकी तारीफ जितनी कि जाए कम है। लेकिन जब जब वह पर्दे पर आई तो उनके सामने एक्टिंग कर रहे साथी कलाकार बैठे नजर आए कुर्सी पर। जबकि राजनीतिक गलियारों से आने वाली खबरों की माने तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कद राजनीति में वह था कि कोई उनके सामने बैठने की हिम्मत नहीं करता था जल्दी से। हुमा कुरैशी, डॉली आहुलवालिया, डेंजिल स्मिथ, कवि राज , अमित कुमार वशिष्ठ, कैस खान आदि अच्छे लगे।

कुलवंत सिंह का म्यूजिक बढ़िया रहा। फ़िल्म अपने साथ सीक्वल की संभावना भी छोड़ जाती है। कॉस्ट्यूम, साउंड, फॉली आर्टिस्ट्स का काम लुभावना है। लंबे इंतजार के बाद आधी क्षमता से भरे जा रहे थियेटर में आप जाना चाहें तो इसकी कहानी के लिए जा सकते हैं, जो कि अच्छी है। बाकी दिमाग लगाना है तो अमेजन प्राइम पर आने का इंतजार कर लीजिए।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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