Saturday, September 24, 2022

मूवी रिव्यू: ‘बधाई दो’ बढ़िया फ़िल्म है

Movie Review Badhaai Do: साल 2018 में आई ‘बधाई हो’ ने तो खासी प्रसिद्वि हासिल की थी। नेशनल अवॉर्ड तक मिला था। तो इसीलिए उससे प्रेरणा लेकर डायरेक्टर ने सोचा कि चलो सीक्वल बनाया जाए। ख़ैर कोरोना की तीसरी लहर के चलते कई बड़ी फिल्मों ने अपनी रिलीज डेट टाल दी है। तो वहीं, कई दूसरी फिल्म्स के डायरेक्टर्स ओटीटी प्लेटफॉर्म की तरफ अभी भी रुख कर रहे हैं। बधाई हो की कहानी ओल्ड एज प्रग्नेंसी पर आधारित थी। तो वहीं, बधाई दो में गे और लेस्बियन किरदारों की चुनौती पर बनी फिल्म है।

अब कहानी में जैसा कि ट्रेलर भी काफ़ी कुछ बता गया था। एक लड़की है। स्कूल में पी.टी. टीचर जो अब शादी के लायक है। सुंदर भी दिखती है। लेकिन समस्या यह कि उसे लड़कों में ही कोई दिलचस्पी नहीं है। दूसरी तरफ एक लड़का है। हट्टा-कट्टा, बॉडी बिल्डर टाइप। पुलिस की नौकरी कर रहा है उसकी भी शादी की उम्र हो चली है। लेकिन यहां भी समस्या है कि उसे लड़कों में ही दिलचस्पी है। समझ गए…! क्योंकि ऐसी कई फिल्में हाल फिलहाल में मुख्य धारा के सिनेमा में नजर आ चुकी हैं। जिनमें एलजीबीटी समुदायों को लेकर बात की जा रही हो। ख़ैर आगे बढ़िए…तो ये दोनों मिले और फैसला लिया कि आपस में शादी कर लेते हैं। घरवालों की चिकचिक खत्म हो जाएगी। फिर रहेंगे भी एक साथ मगर तू तेरे बिस्तर, मैं मेरे बिस्तर। देखा जाए तो हमारे भारतीय समाज आज 21वीं सदी में भी इस तरह की शादियां कहां चलती हैं।

Movie Review Badhaai Do Movie Download Leaked By Tamilrockers

जैसे अभी मैंने कहा कि हाल फिलहाल में सिनेमा ने एल.जी.बी.टी. यानी समलैंगिक, ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन आदि किरदारों को मुख्यधारा के सिनेमा में खुल कर जगह देनी शुरू कर दी है। और इधर हमारे समाज में भी इन लोगों की मुखर मौजूदगी दिखाई देने लगी है। लेकिन बावजूद इसके सच यह है कि जहां समाज में ये लोग अभी भी अपने समुदाय के बीच ही खुल पाते हैं और एक बड़ा तबका आज भी इनसे बात करना तो दूर इनके बारे में भी बात तक करने से बचता है। सिनेमा में भी ऐसे विषय उठाना दुस्साहस और जोखिम भरा काम आज भी माना जाता है। और फिर इन्हीं कोशिशों में ये लोग कभी फिसल जाते हैं तो कभी बढ़िया पार उतर जाते हैं। ‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ या ‘चंडीगढ़ करे आशिक़ी’ हाल के समय में आई बढ़िया फिल्में है। जिस तरह वे बढ़िया फ़िल्म और बढ़िया कोशिशें थीं वैसे ही यह फ़िल्म भी बढ़िया है और बढ़िया कोशिश हुई है।

फिल्म में एक्टिंग भी कुलमिलाकर सभी की बढ़िया रही है। फिर इसके कई किरदार भी दिलचस्प से हैं। जो ऐसी कहानियों से मेल खाते हैं। जैसे मौनव्रत रखने वाली लड़की की मां दूसरी तरफ लड़के की मां, वह भी खोई हुई सी लगती है हरदम न जाने कहाँ। तभी तो हक जमाती हुई ताई आती है बीच-बीच में। ‘राजकुमार राव’ , ‘भूमि पेडनेकर’ ‘सीमा पाहवा’, ‘शीबा चड्ढा’, ‘नितेश पांडेय’, ‘लवलीन मिश्रा’ , ‘गुलशन देवैया’ , ‘चुम दरांग’ आदि लगभग सभी अपने किरदारों में रंगे से नजर आते हैं। गाने भी लगभग बढ़िया है, कहानी से मिलते-जुलते।

बस कुछ दिक्कत या कमी है तो ये कि डायरेक्टर हर्षवर्धन कुलकर्णी के सामने मूवी को कैसे आगे बढ़ाया जाए जैसी उलझन जरूर आई होगी। और उसी उलझन में वे कई दफा उलझते हुए भी नजर आए। और अंत तक आते-आते एलजीबीटी समुदाय की कहानी कहते-कहते यह बच्चे पर आकर अटक गई। फिर भी फ़िल्म ‘बधाई दो’ पूरी तरह से सामाजिक और पारिवारिक स्वीकार्यता की जद्दोजहद पर फोकस जरूर रखती है। ऐसा नहीं है कि ये फिल्म गे या लेस्बियन होने को लेकर हमारा नज़रिया एक झटके में बदल देगी। मगर ये उस विषय के आसपास एक बहस ज़रूर शुरू करेगी। ‘बधाई दो’ अपने सब्जेक्ट को लेकर तथा सिनेमेटोग्राफी, कास्टिंग, बैकग्राउंड स्कोर, कहानी, डायलॉग्स सभी को मिलाकर एक ईमानदार कोशिश करती नज़र भी आती है।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

Related Articles

Stay Connected

21,986FansLike
3,495FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest Articles