Wednesday, January 19, 2022

रिव्यू: लिटिल लिटिल चकाचक ‘अतरंगी रे’

इस शुक्रवार सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म डिज़्नी प्लस हॉट स्टार पर दो फिल्मों का क्लैश देखने को मिला है। अपने-अपने सिनेमाई स्वाद, कहानी के हिसाब से दोनों फिल्में अलहदा है। पहले बॉलीवुड लोचा पर पढ़िए ‘धनुष’, ‘सारा अली खान’, ‘अक्षय कुमार’ अभिनीत फ़िल्म ‘अतरंगी रे’ का रिव्यू।

एक लड़की अबोध सी जो तीसों बार अपने लवर को ढूंढती हुई घर से भाग गई। हर बार पकड़ी गई लेकिन घर वालों को नाम, हुलिया नहीं बताया लवर का। लड़की है रहने वाली बिहार के सीवान जिले की। वहां एक लड़का आया जो डॉक्टरी कर रहा है। रहने वाला दक्षिण भारत का है और जिसकी दो दिन बाद दक्षिण भारत में ही अपने एक डीन प्रोफेसर की बेटी से सगाई होने वाली है। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि उस अबोध लड़की के साथ उसका पकड़वा विवाह कर दिया। फ़िल्म खत्म का पहला हाफ खत्म होते-होते इस बात का अंदाजा लगने लगता है कि वह लड़की रिंकू जिस लवर के साथ भागती है वह कोई जादूगर है। कुछ सीन गुजरने पर वही जादूगर उसके पिता के रूप में नजर आता है।

वाह भाई! क्या कहानी चुनी है! अतरंगी! सतरंगी! मनरंगी! हिंदी फिल्मों में पहली बात तो जबर्दस्ती ब्याह ओर देने की और फिर उन लड़का-लड़की के बीच प्यार होने जाने की कहानियां आप-हम बीसियों बार देख चुके हैं। बस इसमें अलग है तो इस फ़िल्म का क्लाइमैक्स। जिसके चलते यह कुछ आंख भिगो देती है। लेकिन इतनी भी नहीं कि उन गीली आंखों में पानी लंबे समय तक टिक सके।

इसके न टिकने की एक वजह यह भी है कि रोमांस और ड्रामा के जॉनर के खांचे में फिट की गई इस कहानी की स्क्रिप्ट में कुछ ऐसे छेद भी नजर आते हैं जिन्हें देखते हुए आप कुछ पल के लिए हंस सकें। दरअसल कायदे से इसे कॉमेडी, रोमांस और ड्रामा का मिक्सचर कहना चाहिए।

कुछ समय पहले आई निर्देशक ‘इंद्रजीत’ की फ़िल्म ‘आफ़त-ए-इश्क’ फ़िल्म की याद भी यह फ़िल्म दिलाती है। एक्टिंग के लिहाज से ‘धनुष’ और ‘सारा अली खान’ ने उम्दा काम किया है। लेकिन लवर और पिता के रूप में ‘अक्षय कुमार’ अपना प्रभाव जमा पाने में नाकाम साबित होते हैं।

फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर और इसके कुछ गाने कहीं-कहीं म्यूजिक डायरेक्टर का काम कानों को लुभाता है। ‘तुम्हें मोहब्बत है’ गाना इस साल 2021 की तमाम अच्छी फिल्मों के गानों में टॉप 5 की लिस्ट में रखा जाना चाहिए। इसे जिस तरह गाया गया है और इसके लिरिक्स रखे गए हैं वे भी मोहते हैं। डिज़्नी प्लस हॉट स्टार पर आई यह फ़िल्म, इसी तरह ‘चकाचक’ और ‘लिटिल-लिटिल’ गानों की तरह यह फ़िल्म भी अपनी कहानी, स्क्रिप्ट, लुक, सिनेमैटोग्राफी के लिटिल और चकाचक के साझे मिश्रण में रंग कर आपका मनोरंजन तो करेगी ही।

साथ ही आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई भारतीय क्रिकेट टीम के 1983 के वर्ल्डकप जीत पर बनी ’83’ फ़िल्म के सामने यह फ़िल्म ज्यादा टिक न पाए तो इसके लिए इस फ़िल्म की पूरी टीम और निर्देशक ‘आंनद एल रॉय’ को दोष दिया जाना चाहिए। क्योंकि उन्होंने रिलीज डेट ही ऐसी रखी और ‘जीरो’ भी इससे पहले उन्होंने कुछ खास नहीं बनाई।

एक बात यार ये पिता और लवर के रूप में सज्जाद यानी अक्षय कुमार की बेटी के रूप में रिंकू और पत्नी के रूप में भी उसी अभिनेत्री को लेकर जो फ़िल्म का स्वाद हल्का कम किया है। क्या उसका सब्सिट्यूट नहीं ढूंढा जा सकता था? साथ ही ऐसे ही बिहार की लड़की के दक्षिण भारत में अपने ही पति की शादी में नाचने वाले जो सीन हैं। उन्हें बदल देते तो क्या फ़िल्म अच्छी नहीं हो जाती? और भाई ये बताओ दिल्ली के रेलवे स्टेशन से जापान जाने के लिए ट्रेन की सुविधा कब से शुरू हुई? कुछ तो लॉजिक लगाते!

हां एक अच्छी बात यह है कि छिपे रूप में ही सही मानसिक विकार को और पिता-पुत्री के सम्बधों को अच्छा दिखाकर कुछ बेहतर किया है। बाकी कमियां तो हजार निकाली जा सकती हैं। सिनेमाघरों में जाने का मन अभी नहीं है या थोड़ी यूनिक, थोड़ी सतरंगी, अतरंगी फ़िल्म देखने का विचार है तो देख सकते हैं।

अपनी रेटिंग – 2.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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