Monday, October 25, 2021

रिव्यू: ‘अनकही कहानियां’ अच्छी कहानियां, सच्ची कहानियां

इस हफ्ते शुक्रवार को ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर प्यार बरसा है। एंथोलॉजी के रूप में ये कहानियां कही गईं हैं। एंथोलॉजी सिनेमा का वह प्रकार है जिसमें एक ही फ़िल्म में तीन,चार कहानियां एक ही थीम पर आधारित होती हैं। जैसे कुछ समय पहले ‘रे’ आई थी नेटफ्लिक्स पर ही। इस शुक्रवार प्रेम को आधार बनाकर तीन कहानियां कही गईं हैं जो अनकही है, अनसुनी भी हैं उनमें से दो, अच्छी और सच्ची तो खैर तीनों ही हैं।

पहली प्रेम कहानी है प्रदीप लाहोरिया की। जो मध्यप्रदेश के एक गांव से मुंबई आ कर मजदूरी कर रहा है। डिलाइट नाम के कपड़े के शोरूम में, जहां वो लेडीज़ सेक्शन सम्भाल रहा है। इसका एक साथी है जो उसके साथ जिस कमरे में रहता है लेकिन बस पूरे दिन अपनी गर्लफ्रेंड से बतियाने में लगा रहता है। सब उसे आस-पास के लोग प्रेम करते हुए दिखाई देते हैं, सिवाय उसके। फिर एक दिन एक पुतले के रूप में लड़की आती है जिसका नाम रखता है वो ‘परी’ उसके साथ दिल की बातें शुरू होती हैं। लेकिन दुनिया उसके इस प्रेम को नहीं समझती। अब उस पुतले का वह क्या करता है उसके लिए आपको यह अनसुनी,मजेदार कहानी देखनी होगी।

दूसरी कहानी प्रेम कहानी है नंदू और मंजरी की। नंदू सिनेमा घर में काम करता है। सारे काम उसी के जिम्मे हैं। वहीं मंजरी है जिसका उसकी मां ने कॉलेज छुड़वा दिया। कढ़ाई करके अपना गुजारा करती है लेकिन उसे हर हफ्ते फिल्में देखने भी जाना होता है। भाई उसे मारता है पड़ोसी तंग करता है। सिनेमाघर में उसकी मुलाकात नंदू से होती है। और फ़िल्म की इस दूसरी कहानी का क्लाइमेक्स आते-आते यह अच्छी कहानी बन जाती है।

तीसरी कहानी इससे पहले देखी जा चुकी दो कहानियों से काफी अलग है। ये कहानी प्यार की न होकर आपसी तालमेल और सम्बन्धों की बन जाती है। मानव और तनु नाम के हीरो-हीरोइन के जीवन में एक सी परेशानी है। अब क्या वे परेशानी को सुलझाते हैं? इसी क्रम में यह बन जाती है आज के समय की सच्ची कहानी।

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इन तीनों फ़िल्म की पहली कहानी को ‘निल बटे सन्नाटा’, ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्में बना चुकी ‘अश्वनी अय्यर तिवारी’ ने डायरेक्ट किया है। और तीनों फ़िल्म को ‘पियूष गुप्ता’, ‘श्रेयस जैन’, ‘नितेश तिवारी’ ‘हुसैन हैदरी’, ‘जीनत लखानी’ ने मिलकर लिखा है। कायदे से पहली कहानी एक प्रेम कहानी न होकर अकेलेपन को ज्यादा दिखाती है। और मुंबई जैसे बड़े शहरों में रह रहे लाखों लोगों की कहानी भी लगती है। ‘अभिषेक बैनर्जी’ लीड रोल में अच्छा काम करते हैं। उसके अलावा राजीव पांडे का काम भी अच्छा है।

दूसरी कहानी को ‘उड़ता पंजाब’, ‘सोनचिरैया’ फ़िल्म और ‘रे’ जैसी सीरीज बनाने वाले अभिषेक चौबे ने इस फ़िल्म की दूसरी कहानी को डायरेक्ट किया है। नब्बे के दशक को खूबसूरती से इस फ़िल्म में कैप्चर किया गया है। निरमा वॉशिंग पाउडर के जिंगल, पुराने नोट, कपड़ों जैसी कई चीजें उस समय का अच्छा खासा अहसाह करा देती है। इस फ़िल्म की यह दूसरी कहानी ‘जयंत कैकिनी’ की लिखी कन्नड़ कहानी ‘मध्यांतर’ पर आधारित है। जिसमें डायलॉग्स कम हैं, लेकिन सीन प्यारे और लुभावने हैं।

इस फ़िल्म में पहले ‘सैराट’ में नजर आ चुकी ‘रिंकू राजगुरु’ और उनके को एक्टर ‘डेलज़ाद हिवाले’ है। दोनों की एक्टिंग काफी अच्छी है। रिंकू राजगुरु का नाम कुशल अभिनेत्रियों में गिना जाता है वैसे ही। इसकी कहानी थोड़ी कमजोर लेकिन डायरेक्शन बेहतर है। तीसरी और आखरी कहानी ‘हिंदी मीडियम’ के डायरेक्टर ‘साकेत चौधरी’ ने डायरेक्ट की है। पहली दो कहानियों से यह एकदम उल्ट है। ‘कुणाल कपूर’, ‘ज़ोया हुसैन’ का काम काफी सराहनीय रहा।

‘सिर्फ अपने मन की करने से शादी नहीं चलती…और बेमन की करने से ज़िंदगी नहीं चलती। तो फिर क्या चुने इंसान – शादी या ज़िंदगी?’ तीनों कहानियों का सार लगता है आखरी कहानी में बता दिया गया हो जैसे। कमलेश रॉबिन पारूई की एडिटिंग, ऋषभ शाह का म्यूज़िक, इशित नारायण की सिनेमैटोग्राफी, गणेश एस हेगड़े का कैमरावर्क, बैकग्राउंड स्कोर, फॉली साउंड आदि पूरी फ़िल्म को एक-एक दशक के अंतराल में मानों बांट देता है। जिसके कारण लव स्टोरीज पसन्द करने वाले लोगों को यह खासी पसन्द आ सकती है।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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