Tuesday, September 27, 2022

रिव्यू: सिनेमा को पोषण देती है ‘आटा’ जैसी फ़िल्में

इस दुनियां में सबसे ज़्यादा सताया गया है किसी को तो वह है औरत। हम सब साहित्य, सिनेमा, समाज में दलितों की बातें करते हैं यह अच्छा है। वे भी पीड़ित हैं सदियों से इसलिए उनके लिए भी आवाज उठाई जानी चाहिए। लेकिन आधी आबादी जिन्हें हम कहते हैं वे महिलाएं उन दलितों में भी दलित हैं आज भी हिंदुस्तान के एक बड़े क्षेत्र में।

14 वें जयपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में दो सौ पचास से भी ज़्यादा फिल्में दिखाई जा रही हैं। पांच दिनों के इस महोत्सव में राजस्थान की ओर से राजस्थानी फ़िल्म किंतु हिंदी भाषा में बनी ‘आटा’ को ‘बेस्ट फीचर फिल्म इन राजस्थान’ और ‘बेस्ट वीमेन फ़िल्म’ का अवॉर्ड मिलना ऐसी फिल्मों के जरिए उस सिनेमा समाज का पोषण बनकर सामने आता है, जिसके माध्यम से दर्शक वर्ग भी तृप्ति प्राप्त करता है।

फूलण नाम की लड़की जिसका गांव में भेड़-बकरी चराने के लिए आने वाले भैरा पर दिल आ गया। अब मालूम हुआ वह नीची जात का है तब भी उसने उसे दिल दिया। ऊंची जात की फूलण को पाने के लिए, अपने बिस्तर तक लाने के लिए गांव का हर मर्द लालयित है। ऐसे में उसका उस भैरा को चुनना उस मर्दवादी समाज को अपनी इज्ज़त के खिलाफ लगता है। अब क्या कुछ होता है वह तो जब यह फ़िल्म रिलीन होगी तभी आप देख सकेंगे। लेकिन इतना तो तय है कि यह एक सीमित बौद्धिक वर्ग के बीच यह अपनी खास पहचान बनाएगी।

इसके इतर इसके निर्देशन में कुछ कमियां रहने तथा एक दो कलाकारों को छोड़ दें तो बाकी किसी का अभिनय आला दर्जे का न होने के कारण इसकी आलोचना भी की जाएगी। हां बेहद सीमित संसाधनों के चलते इसमें जो कमियां रहीं है वह बताती है कि इनकी टीम को और अधिक बजट मिला होता, और अधिक सिनेमा के मंझे हुए कलाकारों का साथ मिलता तो यह मिसाल बन सकती थी।

movie review aata

एक्टिंग, डायरेक्शन, प्रोड्यूसर का इस पर दांव लगाने का फैसला, सिनेमैटोग्राफी, कैमरामैन, बैकग्राउंड स्कोर, फ़िल्म का लुक, मेकअप, कॉस्ट्यूम, कास्टिंग, एडिटिंग, डायलॉग्स फ़िल्म की कहानी, स्क्रिप्टिंग आदि सभी मिले जुले रूप में इतना तो कर ही जाते हैं कि यह आपके दिलों में महिलाओं के प्रति कुछ भाव जगा सके। इस फ़िल्म को बेहतर होता राजस्थानी भाषा में बनाया जाता। लेकिन एक बार ‘राजस्थान पत्रिका’ दैनिक अखबार के लिए लिखे लेख में भी मैंने राजस्थानी सिनेमा के प्रति उपेक्षाओं को लेकर जो बातें लिखीं थीं कहीं-न-कहीं वे भी ऐसी फिल्मों के लिए सटीक बैठती है।

फ़िल्म में कुछ एक संवाद उम्दा तरीके से लिखे गए हैं मसलन – ‘इंसान के पेट की भूख मिटाने के बजाए अपनी हवस की भूख मिटाने वाला देवता नहीं रागस होवे है रागस। और हर रागस का अंत बुरा होवे है।”औरत में इतनी ताकत होती ना तो रोज मर्दों का बलात्कार होता। भगवान ने मर्दों को ललचाने के लिए औरत तो बनाई मगर उसे कमजोर रखा ताकि मर्द का जब उसका मन करे उसे लूट सके। माने तो ठीक नहीं तो जोर-जबरदस्ती।’

‘इंसान का मन किसी न किसी वजह से मिलता है। पर म्हारा मन तो बेवजह मिल गया।’

‘चंपा, चमेली, कमला, विमला कई देखी लेकिन फूलण जैसी कोई नहीं।’

‘असली मर्द औरतों की इज्ज़त किया करते हैं लूटते नहीं।’ लिहाज़ा इन डायलॉग्स को मात्र डायलॉग्स न समझकर आप इसे देखें तो यह काफ़ी कुछ समाज की उन जातिगत खाईयों को भी पाटती नज़र आएगी जो हमीं ने बनाई हैं। कुलमिलाकर इसे देखना घाटे का सौदा तो नहीं ही होगा। बस काश कि कुछ और बेहतर हो सकती तो हम भी सिने-शैदाई लोग इसे लेकर गर्व करते।

उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि के इलाकों की रियल लोकेशन और अच्छे-अच्छे राजस्थानी वातावरण को देखकर तथा राजस्थान की सच्ची घटनाओं पर आधारित इस फ़िल्म के रिलीज़ होने का इंतज़ार अवश्य कीजिएगा।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

Related Articles

Stay Connected

21,986FansLike
3,503FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest Articles