Wednesday, January 19, 2022

रिव्यू: सिनेमा और क्रिकेट का परचम लहराती ’83’

साल 1983 जब भारत का कोई नाम विशेष नहीं था क्रिकेट की दुनिया में। न ही इस टीम को उतनी तवज्जो मिलती थी जितनी कि आज। आज क्रिकेट को क्रिकेटरों को भगवान तक का दर्ज़ा जो दिया जा रहा है उसकी नींव साल 83 में ही रखी गई थी। यह नींव इतनी सुदृढ़ बनी की अब भारत क्रिकेट के हर तरीके के मैच में अपने झंडे गाड़ चुका है। शायद आगे भी यूँ ही गाड़ता रहेगा।

जब ओलम्पिक में भारत पदक हासिल करता है तो कहते हैं हरियाणा की भाषा में ‘लठ्ठ गाड़ दिया’। बस यही लठ्ठ उस समय गाड़ा गया जब रेडियो और टीवी भी इतना प्रचलन में नही था। क्रिकेट देखने और सुनने के मामले में।

लेकिन जब इस एक अदनी सी टीम का वहां पहुंचना हुआ जो पहले से ही अपनी वापसी की टिकटें लेकर बैठी हुई थी और समझ चुकी थी कि जल्दी ही लौट आना होगा अपने वतन, तब यह कीर्तिमान रचा गया। और भारतीय टीम के हर खिलाड़ियों को 25-25 हजार रुपए भी दिए गए। ऐसे ही एक क्रिकेटर की शादी भी टूट गई कारण उसकी कमाई थी। लड़की के परिवार वालों का मानना था कि वह क्या ही पेट पाल सकेगा।

लेकिन तब उस सपने को सच कर देने वाले खिलाड़ियों की रखी गई नींव पर आज हर कोई वर्तमान के खिलाड़ियों से शादियां करना चाहता है। कितनी अजीब विडम्बना है इस समाज की। लेकिन यह कड़वी सच्चाई है इस समाज कि पहले पेट भरा हो तो ही दुनिया सपनीली और रंगीन नजर आएगी।

इस फ़िल्म में एक संवाद है जब कपिल देव बने रणवीर सिंह पहला मैच खेलने से पूर्व हुई प्रेस कांफ्रेंस में अंग्रेज़ी पत्रकार से कहते हैं कि ‘आप एक फ़ास्ट बॉलर की तरह बोल रहे हैं। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आप स्पिनर की तरह धीरे बोलिए ताकि मैं आपकी अंग्रेज़ी समझ सकूं…’, तब मानों वे धीरे-धीरे ही सही एक मजबूत नींव रख रहे हों।

निर्देशक ‘कबीर खान’ की फ़िल्म 83 जितनी ‘कपिल देव’ की है उतनी ही ‘रणवीर सिंह’ की साथ ही उतनी ही उन 15 अन्य टीम मेम्बर की। जिन्होंने जीत का सेहरा भारत के सिर बांधा। रुपए उधार लेकर इंग्लैण्ड पहुंचे भारत के वर्ल्ड कप की जीत की इस सच्ची कहानी के सिनेमाई रूपांतरण में कप्तान कपिल देव के रोल में रणवीर सिंह हैं। रणवीर सिंह हमेशा अपनी अभिनेय कला से दिल तो जीतते ही हैं साथ ही पैसा भी वसूल होने देते हैं।

फ़िल्म में दूसरे सबसे बड़े कैरेक्टर में मैनेजर पीआर मान सिंह के रूप में पंकज त्रिपाठी चाय में गिरे उन मसालों की तरह लगते हैं जो चाय के स्वाद को कई गुना बढ़ा देते हैं। इसके अलावा दीपिका पादुकोण का तो कहना ही क्या। जैसे रणवीर सिंह को देखते हुए आप भूल जाते हैं कि वे रणवीर सिंह नहीं बल्कि कपिलदेव ही हैं वैसे ही दीपिका पादुकोण भी लुभाती है, सुहाती है।

ये फ़िल्म उस वक़्त के खिलाड़ियों के हालात, उनकी मसखरी, उनकी इमोशनल दुनिया, पर्सनल लाइफ , संघर्ष सबको बराबर इस कदर समेटती है कि इसे देखते हुए हर दर्शक के भीतर जोश, जूनून ऐसे उबालें मारने लगता है कि आप हिप-हॉप करने लगें। अपनी कुर्सियों पर बैठे ही।

यह सिनेमा के साथ-साथ असल जीवन का वह स्वाद आपकी आंखों, कानों और जेहन को परोसती है कि आप अपनी मुठ्ठियों को कसकर भींच लें फिर जो उसकी गर्माहट से पसीना आने लगे या हाथ नम होने लगें तो वह हाथ नहीं दरअसल आपकी सीने में धड़कने वाली वह सिने ख्वाईश नजर आएगी जो आप सिने-शैदाईयों ने बरसों से छिपा रखी है।

म्यूजिक इस फ़िल्म का सबसे मजबूत पहलू है। उसके अलावा मेकअप, लुक, सिनेमैटोग्राफी, कैमरामैन का काम, एडिटिंग, कास्टिंग राजनीतिक चालबाजी सब एक से बढ़कर एक। कास्टिंग तो इतनी रियल रही है कि आप उसके लिए अलग से दाद देंगे।

“लहरा दो, लहरा दो, सरकशी का परचम लहरा दो।
गर्दिश में फिर अपनी, सरज़मीं का परचम लहरा दो।।”

गाना जब बजता है तो लगता है यह क्रिकेट के साथ-साथ उस सिनेमा के परचम को भी लहरा रहा होता है जो इस कोरोना काल में या काफी समय से सिनेमा की हवा के विपरीत लहरा रहा था।

फ़िल्म के लेखक सुमित अरोड़ा, वसन बाला, संजय पूरन सिंह चौहान और डायरेक्टर कबीर खान सबने मिलकर एक ऐसा करिश्मा रचा है जिसे देखने के बाद और देखते समय आप कई बार दाद देंगे। टीम के सदस्यों के रूप में आने वाले ‘एमी विर्क’, ‘ताहिर राज भसीन’, ‘साकिब सलीम’, ‘जतिन सरना’, ‘जीवा’, ‘चिराग पाटिल’, ‘निशांत दहिया’, ‘साहिल खट्टर’ , ‘बृजेंद्र काला’ , ‘बोमन ईरानी’ आदि सबने करियर की अपनी बेस्‍ट परफॉरमेंस दी है।

ऐसी फ़िल्मों को पहले फ़िल्म फेस्टिवल्स में भी भेजा जाना चाहिए ताकि वे कई सारे अवॉर्ड भी अपने नाम कर सकें। हालांकि अभी भी इसे कुछ अवॉर्ड मिलें या नेशनल अवॉर्ड तक के लिए।नामित की जाए तो बुरा नहीं होगा। एक-दो कोई हल्की-फुल्की गलतियों को छोड़ इस हफ्ते इस फ़िल्म को बिना देर किए लपक लीजिए। हां ज्यादा आनन्द लेना चाहें तो इसे थ्री डी में देखना बेहतर रहेगा। कुलमिलाकर कहें तो चक दिए फट्टे सिनेमा के कलाकारों ने।

अपनी रेटिंग – 4.5 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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