Tuesday, September 27, 2022

रिव्यू: आज के दौर का सिनेमा है ‘फ़ॉर सम’ में

भारत का एक गांव भिलाई जहां कुछ लड़के एक कॉलेज में पढ़ रहे हैं। दोस्ती में हंसी मजाक करते हैं। नशा करते हैं उच्च स्तर का। जिसे देखते हुए आपको ‘कबीर सिंह’ फ़िल्म की याद भी आने लगे। लेकिन यह उससे भिन्न होकर उससे कहीं आगे तो कहीं पीछे रह जाती है। ख़ैर अब इनमें से चार लोगों की जिंदगी में किस तरह की उठा पटक है वह तो जब यह फ़िल्म रिलीज होगी तभी आप देख सकेंगे।

जयपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गई यह फ़िल्म कई मायनों में अलग है। कहानी के लेवल पर देखा जाए तो यह ज्यादा कुछ नहीं परोसती लेकिन जिस तरह से कहानी लिखी गई होगी उसकी स्क्रिप्टिंग में अवश्य ही कोई उलझनें बाकी रही हैं कि यह फ़िल्म वह मजा नहीं दे पाती। फिर इसके डायलॉग्स आज के समय के हैं। इसलिए यह आज के दौर के सिनेमा को भी बखूबी पकड़ कर रखती है।

इस फ़िल्म को देखते हुए इसके अंदर के बीच-बीच में छेदों से आप बच निकलें या उन पर ज्यादा ध्यान न दें तो आप इसे बढिया तरीके से इंजॉय कर सकेंगे। इस फ़िल्म को अगर ‘एमएक्स प्लेयर’ जैसे ओटीटी प्लेटफार्म का साथ मिले तो यह आम दर्शकों के बीच खासी पहुंच बना सकेगी।

इस तरह की फिल्मों के डायलॉग्स ऐसे ही होने चाहिए भी। हालांकि सभ्य समाज, साहित्य जगत से ताल्लुक रखने वाले लोग, इमोशनल या फिर जातिगत या क्षेत्रगत भेदभाव को न मानने वाले लोग भी इसे पचा लेंगे। वहीं अगर यही समाज इसे देखेगा तो इसके एक-दो संवादों पर आपत्ति भी जता दे तो यह लाज़मी है।

अभी फ़िल्म फेस्टिवल्स की राह चल रही यह फ़िल्म खासी प्रशंसा भी हासिल करेगी। साथ ही इसके लिए बेस्ट एक्टर, बेस्ट स्पोर्टिंग एक्टर, बेस्ट कलरिंग आदि के लिए भी अवॉर्ड इस फ़िल्म की झोली में आएंगे। फ़िल्म का एक आपत्तिजनक डायलॉग्स कुछ इस तरह का है। जिसके अंदर शामिल की गई गालियों से बचते हुए यह रिव्यू लिखा जा रहा है।

‘क्या बात है बिहारी नया कलेक्शन आया है मार्केट में।’
‘अब आदमी क्या चैन से हिला भी नहीं सकता क्या।’
‘हिला ना भाई’
“तेरी माल मर गई क्या जो ये सब देखकर हिला रहा है तू।”

यह संवाद खास करके महिलाओं के लिए तथा संवेदनशील दर्शकों के लिए अवश्य ही आपत्ति का कारण बनेगा। फ़िल्म में किसी एक एक्टर की एक्टिंग की तारीफ की जाए यह तो गलत होगा। ‘सौरभ बुराडे’ , ‘अरुण कुमार मिश्रा’ , ‘यशवंत आंनद गुप्ता’ , ‘प्रणव चंद्राकर’ आदि सभी का अभिनय बढिया रहा। यशवंत आनन्द गुप्ता को इस फ़िल्म के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड दिया जाना भी एकदम सही फैसला रहा है। वे अपने अभिनय से कुछ ऐसा करते हैं जैसे हम-आप अपने आम जीवन में करते हैं। वे इससे पहले एक बेहतरीन फ़िल्म ‘चमन बहार’ में भी नज़र आ चुके हैं।

फ़िल्म ‘फ़ॉर सम’ की सिनेमैटोग्राफी कमाल की है। कैमरामैन का काम भी एक आध सीन छोड़ दें तो रंग-बिखेरने में कामयाब हुआ है। एडिटिंग कसी हुई नजर आती है इतनी कि लगता है या तो लेखक , निर्देशक ‘नीरज ग्वाल’ से कम लिखा गया या फिर एडिटर ने उसे अपनी कैंची की धार से कुछ ज्यादा ही कस दिया। साउंड डिपार्टमेंट, वीएफएक्स, कास्टिंग, म्यूजिक, गीत-संगीत काफी अच्छे रहे हैं। बावजूद इसके साउंड में कुछ जगह और डबिंग में कुछ जगह सुधार की गुंजाइश बाकी रहती है। फ़िल्म को अभी तक सेंसरशिप नहीं मिली है इसलिए हो सकता है आप आम लोग बाग तक जब यह पहुंचे तो सम्भव है फ़िल्म के डायरेक्टर इसमें कुछ बदलाव करके इसे बेहतर कर सकें। एक बात और ‘शशि जैसा दिल और बच्चन जैसा दिमाग।’ की बातें करने वाली ऐसी हॉस्टल लाइफ जी रही फिल्मों में सुहाने लगते हैं।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

Tejas Poonia
Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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