Friday, September 17, 2021

रिव्यू: दलित जीवन का दस्तावेज ‘200 हल्ला हो’

साल 2004 में हमारे देश में एक बड़ी घटना घटी अक्कू मर्डर केस। उस बलात्कारी के कोर्ट में मर्डर होने के बाद उन 200 महिलाओं पर क्या गुजरी कोई नहीं जानता। वे महिलाएं जिन्होंने मिलकर घरेलू औजारों से उसके एक-एक अंग को काट डाला था। बेरहमी से उसे पुलिस के सामने ही मारकर भले उन महिलाओं ने सालों से अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का बदला ले लिया हो लेकिन यह केस आज भी लोगों को ज्यादा मालूम नहीं है। कारण दलितों से इसका जुड़ा होना। वैसे भी जब यह जाति हजारों सालों से दबी कुचली है तो उनकी आवाज उठेगी कैसे?

लेकिन इस आवाज को फिर से हल्की मगर गहरी हवा देती है ‘200 हल्ला बोल।’ अंबेडकर ने एक बार गांधी से कहा था – ‘I Have No Home Land’ ठीक ऐसा ही अमोल पालेकर जो प्रतिष्ठित रिटायर्ड जज बने हैं फ़िल्म में, वे कहते हैं – ‘दलित का कोई गांव नहीं होता।’ लेकिन हमारे देश में खास लोग, आम लोग, फिर मामूली , फिर गरीबी रेखा से नीचे वाले और फिर आती हैं उन करोड़ों लोगों की भीड़ के नीचे दबी हुई जाति के दलित लोग और दलित महिलाएं। यह फ़िल्म भी उन्हीं दलित महिलाओं के जीवन में झांकती है। न केवल झांकती है बल्कि उनके एक पूरे गांव को भी दस्तावेज के रूप में दिखाती है।

बल्ली चौधरी जो सालों से बलात्कार कर रहा है एक-एक करके दलित महिलाओं का, उसकी एक दिन कोर्ट रूम में हत्या कर दी जाती है। अब उसकी हत्या के बाद उन महिलाओं पर क्या गुजरी उस सच्ची घटना को यह फ़िल्म दिखाती है। राही नगर की इस दलित बस्ती की महिलाओं को साथ मिलता है बड़े रिटायर दलित जज का। बस्ती में आशा सुर्वे नाम की लड़की भी है जो काफी सालों बाद आती है और उस बस्ती को, अपने दलित साथियों को दुखों से भरा हलाहल पिला देती है। वह कहती है कि ‘जहां वह रहती है वहां सब अच्छा है लेकिन सच्चा नहीं है। मुझे यहां रहकर अपने सच को अच्छा करना है।’ अब वह क्या अच्छा कर पाई है उसे ही यह फ़िल्म बिना किसी मसालों और धूमधाम के साथ सहज, सीधे, गम्भीर तरीके से बात करते हुए दिखाती है।

यह फ़िल्म हमारी आँखों और दिमाग पर पूर्वधारणाओं की जो दलितों को लेकर धूल चढ़ी है उसे भी उतारने का काम करती है। फ़िल्म कहती है कि – ‘तुम हमदर्दी दिखा सकते हो पर कभी समझ नहीं सकते। दलित होना क्या होता है। एक ऐसे समाज में जहां हर वक्त तुम्हें याद दिलाया जाए तुम सबसे अलग हो, एक दलित हो।’

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फ़िल्म दलितों के जीवन को खूबसूरत तरीके दिखाते हुए अपने खत्म होने के साथ सोचने पर मजबूर कर जाती है। हमारे देश में रोजाना 80 से ज्यादा बलात्कार के केस दर्ज होते हैं फ़िल्म के मुताबिक। फ़िल्म में उन सभी के बारे में न बताकर एक केस को ही समेटा गया है। जिसमें 10 सालों से महिलाओं को बलात्कार का शिकार होना पड़ रहा है। फ़िल्म की कहानी अभिजीत दास, सार्थक दास गुप्ता, सौम्यजीत रॉय , गौरव शर्मा के द्वारा अच्छी लिखी गई है। यह फिल्म आशा भी जगाती है अपनी कहानी से कि ‘हमारे चारों तरफ अंधेरा हो तब भी हम इसी आशा में रहते हैं कि हालात बदलेंगे। लेकिन हमें आदत हो गई है चाय पीते हुए ऐसी खबरें पढ़ने की और पढ़कर कुछ महसूस न करने की। दलित मुद्दा जाति का मुद्दा है जो एक धर्म की प्रथा है। धर्म का पालन करने की या न करने की आजादी सभी को है।

एक्टिंग के लिहाज से लम्बे समय बाद पर्दे पर वापसी कर रहे अमोल पालेकर अपना बेहतरीन देते हैं। सलोनी बत्रा, सुषमा देशपांडे, इश्तियाक खान, विनय, बरुण सोबती, पुनीत तिवारी सभी ने अपने-अपने हिस्से का किरदार निभाया नहीं बल्कि जिया है पर्दे पर। एक पल के लिए भी वे अपनी लीक से नहीं हटते। ऐसी फिल्मों में कॉस्ट्यूम और मेकअप खास तौर पर मायने रखता है। इसलिए फ़िल्म इस मामले में भी ठीक बन पड़ी। बैकग्राउंड स्कोर हिलाता, डुलाता, रोंगटे खड़े करता तथा कुछ एक जगह निराश भी करता है। गीत-संगीत ज्यादा नहीं है जो है जितना है जरूरी और काफी है। निर्देशक सार्थकदास गुप्ता, आलोक बत्रा ने मिलकर कोर्ट रूम ड्रामा को बिखरने से बचाया है। ऐसी फिल्मों में या कोर्ट रूम ड्रामा कायदे से पिछली बार कब दिखाया गया किसी फ़िल्म में शायद ही याद हो। यह फ़िल्म अपने विषय, स्वाद, संवाद, अंदाज से सराही जाएगी तथा बार-बार देखी तथा पसन्द की जाएगी। सिनेमा में ऐसा सार्थक दलित जीवन का दस्तावेज काफी समय बाद देखा गया है ऐसे हस्तक्षेप होते रहने चाहिए।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

Tejas Poonia
लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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