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नेक नियत वादे के साथ विदा हुआ ‘बॉलीवुड इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल’

Written by Tejas Poonia

आज के समय में फ़िल्म फेस्टिवल्स की लाइनें लगीं हुईं हैं। हर गली-नुक्कड़, चौराहे पर सब्जी के ठेले जैसे लगते हैं वैसी सी हालत अब इन फिल्म समारोहों की हो चली हैं। लेकिन इस बीच कुछ फिल्म फेस्टिवल्स आज भी सराहे जाते हैं और कुछ अपनी नेक नियत और वादों इरादों के चलते उनकी रखी गई नीवं को मजबूत तथा कुछ सार्थक करने की दिशा में काम करते भी नजर आते हैं। हाल ही में मुंबई में 17-18 दिसम्बर को ‘बॉलीवुड इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल’ अभिनेता एवं ‘दादा लखमी’ फिल्म से पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में उतरे ‘यशपाल शर्मा’ तथा ‘प्रतिभा शर्मा’ की देखरेख में सम्पन्न हुआ।

इस समारोहो का संचालन ‘अल्पना सुहासिनी’ तथा ‘सुनील बैनीवाल’ ने किया। गणेश वंदना से आरम्भ हुए इस फेस्टिवल का आयोजन गत दो वर्षों से ऑनलाइन हो रहा था। पहली बार ऑफ़लाइन हुए इस फेस्टिवल का आयोजन पहले श्री गंगानगर में किया जाना था। फिल्म फेस्टिवल में मुख्य अतिथि हिमाचली तथा हिंदी फिल्मों के निर्देशक ‘पवन शर्मा’ के साथ हरियाणा में अभिनय रंगमंच के माध्यम से थियेटर जगत को जीवित रखने वाले ‘मनीष जोशी’ रहे। संचालन के आरम्भ में इस फेस्टिवल का मंतव्य तथा इसकी दशा और दिशा के बारे में दर्शकों को अवगत करवाया गया। इस मौके पर पवन शर्मा ने कहा कि ‘अभी तो यह फेस्टिवल आरम्भ हुआ है और मुझे पूरा यकीन है कि यह एक दिन गोवा के इफ्फ़ी फेस्टिवल की तरह ऊँचाइयाँ छूयेगा।’

इस फेस्टिवल के फाउंडर मेम्बर के तौर पर अभिनेत्री प्रतिभा सुमन शर्मा’ ने इस फेस्टिवल की शुरुआत को लेकर कहा कि ‘यह एक छोटे से हमारे नुकसान की वजह से शुरू किया गया था। कई सारे समारोहों में जब एक बार हमारी फ़िल्म दिखाई जा रही थी और अवार्ड्स भी मिल रहे थे तो इसके बावजूद जब हम क्षेत्रीय सिनेमा देखते फेस्टिवल्स में तो वहां के आयोजनों को देखते हुए महसूस होता था हमेशा की इनमें कुछ कमियां बाकी हैं जिन्हें हम अपने फेस्टिवल के माध्यम से शुरुआत करके उन फिल्मों को मंच तथा ऊँचाइयाँ प्रदान करने में सहायता कर सकते हैं। साथ ही सिने मित्रकों, अच्छे दर्शकों तथा फिल्म मेकर्स को सही न्याय उनकी फिल्मों को दिलाने की मांग पर यह फेस्टिवल शुरू किया गया।’

इस मौके पर अभिनेता यशपाल ने अपनी पत्नी प्रतिभा की बातों पर चुटकी लेते हुए कहा कि ‘हर साल ये और इसकी टीम मेहनत करती है और अंत में मजमा मैं लूटने आ जाता हूँ।’ साथ ही वे बोले की ‘हम गुणवत्ता में विश्वास रखते हैं मात्रा में नहीं। यही वजह है कि हम बेहद सीमित फिल्मों का चयन करते हैं लेकिन हमारी कोशिश यही रहती है कि इस फेस्टिवल में आने वाला हर दर्शक कुछ ना कुछ सीखकर या अपने जेहन में कुछ लेकर जाए फिल्मों से। साथ ही उन्होंने कहा कि यह गुणवत्ता और मात्रा हमारी जिन्दगी में हर मोड़ पर रहती है। इसलिए हमें गुणवत्ता की ओर ही हमेशा ध्यान देना चाहिए फिर वो फ़िल्में हों, लोग हों, दोस्त हों, पैसा या कुछ और। किसी भी फेस्टिवल के आरम्भ में आलोचनाएं तो आपको झेलनी ही पड़ती हैं। कांस फिल्म फेस्टिवल का उदाहरण देते हुए यशपाल ने आगे कहा कि जब कांस शुरू हुआ था तो यकीनन उसे भी आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा होगा। थियेटर जगत के महान देशी-विदेशी कलाकारों को याद करते हुए फेस्टिवल्स के आरम्भ पर बात की।

अपने तथा अभिनेता इरफ़ान खान के साथ एक बार फिल्म फेस्टिवल में हुए अन्याय को लेकर भी यशपाल बोले कि यह बड़ी वजह रही मेरी इस फेस्टिवल से जुड़ने की और उस कारण से हमने इस फेस्टिवल को आरम्भ करने के बारे में सोचा। उन्होंने कहा कि हमारी यही कोशिश है कि हम कुछ भी करके अच्छे और सार्थक सिनेमा को बाहर लेकर आएंगे तथा उसके लिए सदा खड़े रहेंगे। साथ ही हम अच्छे सिनेमा के माध्यम से अच्छे दर्शक खींच कर लायेंगे तथा एक मंच स्थापित अवश्य करेंगे।’

फेस्टिवल में बतौर निर्णायक ज्यूरी ‘अशोक राणे’, ‘अमित राय’, ‘संदीप शर्मा’, फ्रांसीसी अभिनेत्री ‘मरीन बोरबो’ और बांग्लादेश के ‘तौकीर अहमद’, ‘अशोक शर्मा’ रहे। बॉलीवुड इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल का आरम्भ मराठी भाषा की फीचर फिल्म ‘मौर्या’ से हुआ। दलितों की पीड़ा दिखाती इस फिल्म के लिए इसके निर्देशक, एक्टर ‘जितेंद्र बर्डे’ ने बेस्ट स्टोरी का अवार्ड अपने नाम किया। फीचर फिल्मों के अलावा शॉर्ट फिल्मों, लॉन्ग शॉर्ट फ़िल्में, वेब सीरीज, मोबाइल सिनेमा, एनिमेशन की कैटेगरी में इस फेस्टिवल के लिए फ़िल्में चुनी गईं।

एनिमेशन फिल्म तथा मोबाइल फिल्म कैटेगरी में बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड क्रमशः ‘बेलोप्रोपेलो’ की फिल्म ‘द गेम जस्ट गॉट रियल’ , ‘एलिजाबेथ मार्लो’ की फिल्म ‘टाइम’ को मिला। वहीं सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री (विदेशी भाषा कैटेगरी) के लिए निर्देशक ‘मौरिस मिकालेफ’ की फिल्म ‘द फोनीशियन’ , सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री (देशी भाषा कैटेगरी) में ‘बिग सोशल’ के लिए निर्देशक ‘अन्ना बोहलमार्क’ की फिल्मों को चुना गया। शॉर्ट फिल्म कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘अक्षय गौरी’ की ‘बेहोल्डन’ रही तथा इसी में बेस्ट एक्टर्स फिमेल ‘दीक्षा जुनेजा’ चुनी गईं।

फीचर फिल्म कैटेगरी में ‘को अहम्?’ के लिए सर्वश्रेष्ठ बैकग्राउंड स्कोर ‘अभिनव सिंह’, ‘चेतन शर्मा’ बेस्ट एक्टर तथा ‘रसिका चंदानी’ को बेस्ट एक्टर्स फिमेल चुना गया। वहीं बेस्ट डायलॉग के लिए ‘इशरत आर खान’ की फिल्म ‘गुठली’ चुनी गई। इस फिल्म को निर्देशक ने ‘गुठली लड्डू’ तथा ‘गुठली’ दोनों नाम दिए हैं। फीचर फिल्म कैटेगरी में ही ‘आशीष नेहरा’ निर्देशित फिल्म ‘पिंजरे की तितलियाँ’ बेस्ट स्क्रीनप्ले की दौड़ में अव्वल रही। आशीष की इस फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर्स फिमेल कैटेगरी के लिए ‘रुचिता देओल’ चुनी गईं। सबसे ज्यादा अवार्ड फिल्म ‘गुठली लड्डू’ के नाम रहे। इससे पहले भी कई सारे फिल्म फेस्टिवल तथा इफ्फी गोवा के फिल्म बाजार में दिखाई जा चुकी यह फिल्म दलितों के लिए पढ़ने-पढ़ाने की बातें करती नजर आई। फेस्टिवल में अंतिम फिल्म ‘दादा लखमी’ की स्पेशल स्क्रीनिंग भी रखी गई जिसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ी। इस स्पेशल स्क्रीनिंग में इस फिल्म के लिए संगीत देने वाले महान संगीत निर्देशक ‘उत्तम सिंह’ स्वयं मौजूद रहे।

धुमाधाम से आयोजित हुए इस फेस्टिवल ने अच्छी फिल्मों को प्रोत्साहन देने का वादा करते-कराते हुए विदा ली साथ ही अवार्ड्स देने की प्रक्रिया के बीच तथा बाद में गीत-संगीत तथा नृत्य आदि से भी दर्शकों का मनोरंजन किया गया।

About the author

Tejas Poonia

लेखक - तेजस पूनियां स्वतंत्र लेखक एवं फ़िल्म समीक्षक हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज पर 200 से अधिक लेख, समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पोर्टल आदि पर प्रकाशित हो चुके हैं।

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