Ishtiyak Short Film Review: "आज दुनिया की भीड़ में 'मर्द' कहीं खोता हुआ नजर आता है। उसकी पहचान अक्सर सिर्फ एक 'एटीएम मशीन' या जिम्मेदारियों को ढोने वाले एक 'सहारे' तक सिमट कर रह गई है।"
एक फिल्म क्रिटिक
के तौर पर, अक्सर हम उन कहानियों की तलाश में रहते हैं जो सिर्फ
मनोरंजन न करें, बल्कि आईना भी दिखाएं। 4PM Films द्वारा प्रस्तुत और प्रान्शु श्रीवास्तव द्वारा निर्देशित शॉर्ट फिल्म 'इश्तियाक' (Ishtiyak) एक ऐसी ही कोशिश है। लगभग 17 मिनट की यह फिल्म भारतीय मध्यमवर्गीय पुरुष के उस दर्द को टटोलती है, जिसे अक्सर "मर्द को दर्द नहीं होता" के जुमले के
नीचे दबा दिया जाता है।
"आइए, इस
फिल्म की परतों को थोड़ा और गहराई से टटोलते हैं:"
कहानी (Story &
Concept)
फिल्म की कहानी एक
मध्यमवर्गीय व्यक्ति (इश्तियाक खान) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो आर्थिक तंगी के चक्रव्यूह में फंसा है। सब्जी वाले से
लेकर स्कूल की फीस तक, हर जगह उसका एक ही जवाब होता है— "एक तारीख को दे दूंगा।"
कहानी का केंद्र "पुरुषों की मानसिक स्थिति" और समाज द्वारा उन पर थोपी गई "मर्दानगी" की परिभाषा है। फिल्म की शुरुआत में डॉक्टर इश्तियाक से पूछता है— "दिन में कितनी बार रो लेते हो?" यह सवाल इश्तियाक को असहज करता है और पूरी फिल्म का आधार बनता है। क्लाइमैक्स में इश्तियाक का जवाब (मोनोलॉग) रोंगटे खड़े कर देता है।
कांसेप्ट पूरी तरह
नया नहीं है, लेकिन इसकी प्रस्तुति बहुत यथार्थवादी (realistic) है। फिल्म की शुरुआत और मध्य भाग दर्शक को उस तनाव (stress) का अनुभव कराते हैं जो एक आम आदमी रोज झेलता है। क्लाइमैक्स
में एक थिएटर परफॉरमेंस के जरिए जो 'कथैसिस' (catharsis) होता है, वह कहानी को एक
ऊंचे मुकाम पर ले जाता है।
पटकथा और संवाद (Screenplay & Dialogues)
पटकथा कसी हुई है।
शुरुआती सीन्स में एक ही बात का दोहराव (Repetition) है— उधारी और अपमान। यह दोहराव जानबूझकर रखा गया है ताकि दर्शक उस घुटन को
महसूस कर सके।
संवाद बहुत ही स्वाभाविक और चुभने वाले हैं। जैसे पत्नी का ताना— "जिम्मेदारी के नाम पर रोना ही तो आता है तुम्हें" या सब्जी वाले का अपमानजनक व्यवहार। क्लाइमैक्स का मोनोलॉग (एकल संवाद) बहुत सशक्त है, जहां इश्तियाक कहते हैं:
"हम मर्द हैं ना... हम सब कमाल का रो लेते हैं... कभी बीवी के तानों में, कभी बॉस की फटकार में।" और जमाना ये कहता है कि हम मर्द हैं, मर्द कहां रोते हैं।"
यह मोनोलॉग समाज के उस ढांचे पर चोट है जो
पुरुषों को रोने की इजाजत नहीं देता।
"फिल्म का अंत बहुत मार्मिक है। जब
इश्तियाक की बेटी मासूमियत से पूछती
है— 'पापा, आप क्यों रो रहे थे?'
तो इश्तियाक का जवाब
होता है— 'बेटा,
हम थोड़ी रो रहे थे हम तो एक्टिंग कर
रहे थे, वो तो मर्द रो रहा
था।'
बेटी फिर सवाल करती
है— 'पापा, मर्द क्यों रो रहा था?'
इस पर इश्तियाक जो
जवाब देते हैं, वह सीधा दिल पर लगता
है— 'मर्द हमेशा इस इंतज़ार में रहता है कि
काश कोई उससे पूछे— भाई, कितना
रो लेते हो?'
और तब बेटी का यह
कहना— 'मैं पूछूंगी ना पापा...'
यह एक उम्मीद की किरण है। यह दिखाता है कि शायद अगली पीढ़ी पुरुषों के इस छिपे हुए दर्द को न केवल समझेगी, बल्कि उसे साझा भी करेगी।"
अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी
ताकत इश्तियाक खान हैं। हम उन्हें अक्सर कॉमेडी रोल्स में देखते हैं, लेकिन यहाँ उन्होंने अपनी संजीदगी से चौंका दिया है। उनकी
आँखों में लाचारी और कंधों पर जिम्मेदारी का बोझ साफ़ झलकता है। पर शुरू होने वाले
उनके मोनोलॉग में उनकी आवाज़ का कंपन और आँखों की नमी रोंगटे खड़े करती है।
सपोर्टिंग कास्ट: पत्नी और अन्य किरदारों दुकानदार, टीचर ने भी अच्छा काम किया है, जिससे माहौल विश्वसनीय लगता है।
निर्देशन (Direction)
निर्देशक प्रान्शु श्रीवास्तव का विजन स्पष्ट है। उन्होंने मेलोड्रामा से बचते हुए 'रियलिज्म' को चुना है। उन्होंने नायक की बेबसी को ग्लोरिफाई करने के
बजाय उसे नंगा सच बनाकर पेश किया है। सीन ट्रांज़िशन घर के झगड़ों से लेकर रिहर्सल और फिर स्टेज तक सहज हैं। भावनाओं को धीरे-धीरे बिल्ड-अप किया गया है जो अंत
में फूटती हैं।
सिनेमैटोग्राफी (Cinematography)
कैमरा वर्क: फिल्म में बहुत ज्यादा स्टाइलिश शॉट्स नहीं हैं, जो कहानी की मांग भी नहीं थी। हैंडहेल्ड कैमरा मूवमेंट्स का इस्तेमाल नायक की
अस्थिर मानसिक स्थिति को दिखाने के लिए किया गया लगता है।
लाइटिंग: घर के अंदर की लाइटिंग थोड़ी डिम और क्लॉस्ट्रोफोबिक (घुटन भरी) है, जो मिडिल क्लास तंगी को दर्शाती है। स्टेज सीन की स्पॉटलाइट
का इस्तेमाल अच्छा है, जो सीधे किरदार की आत्मा पर फोकस करता है।
बैकग्राउंड म्यूज़िक और साउंड डिज़ाइन
साउंड डिज़ाइन
यथार्थवादी है। बाज़ार का शोर, घर के बर्तनों की
खनक और ताने ये सब मिलकर एक
शोर पैदा करते हैं जो नायक के दिमाग में चल रहा है।
अंत में चलने वाला
गाना "मुसाफिर मेरा दिल" फिल्म के मूड को बहुत अच्छे से समेटता है और दर्शक को सोचने पर मजबूर करता है।
एडिटिंग (Editing)
फिल्म की लंबाई 17 मिनट है जो बिल्कुल सही लगती है। कट्स स्मूद हैं। बार-बार
"एक तारीख" वाले सीन्स का मोंटाज (Montage) थोड़ा और क्रिस्प हो सकता था, लेकिन यह फिल्म की
लय को नहीं तोड़ता।
इमोशनल और सोशल मैसेज
यह फिल्म एक बहुत
ज़रूरी सवाल पूछती है: "क्या मर्द वाकई नहीं रोते?" यह समाज को आईना दिखाती है कि कैसे आर्थिक जिम्मेदारियों के बोझ तले एक पुरुष
अपनी भावनाओं की हत्या कर देता है। यह हर उस पिता, भाई और पति की कहानी है जो मुस्कुराते हुए अंदर ही अंदर घुट रहा है।
कमज़ोरियां (Weak Points)
प्रेडिक्टेबिलिटी: फिल्म का मध्य भाग थोड़ा अनुमानित (predictable) हो जाता है। हमें पता होता है कि अब अगला तकादा (payment demand) आने वाला है।
प्रोडक्शन वैल्यू: कुछ जगहों पर वीडियो क्वालिटी और ऑडियो मिक्सिंग थोड़ी और बेहतर हो सकती थी, हालांकि यह इंडिपेंडेंट फिल्म मेकिंग की सीमाओं के कारण हो
सकता है।
मजबूत पक्ष (Strong Points)
इश्तियाक खान का अभिनय: यह वन-मैन शो है।
क्लाइमैक्स: स्टेज पर बोला गया
मोनोलॉग फिल्म की जान है। यह प्रीची (उपदेशात्मक) नहीं लगता, बल्कि एक स्वीकारोक्ति (confession) लगता है।
कुल मिलाकर
'इश्तियाक' सिर्फ एक शॉर्ट
फिल्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है। यह उन दर्शकों के लिए है जो
मसाला फिल्मों से दूर, हकीकत से रूबरू कराने वाला सिनेमा पसंद करते हैं। अगर आप
अभिनय के छात्र हैं या मानवीय संवेदनाओं को समझने में रुचि रखते हैं, तो यह फिल्म आपको देखनी चाहिए।
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4/5)
आखिरी बात: इसे ज़रूर देखें, और देखने के बाद अपने घर के पुरुषों (पिता/पति) से एक बार ज़रूर पूछें— "आज दिन कैसा था?" शायद उन्हें भी रोने के लिए एक कंधे की ज़रूरत हो।


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