INTERVIEW: आने वाले कल का माध्यम है टेलीविजन : शबाना आजमी

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अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त और पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली अभिनेत्री शबाना आजमी ने सिनेमा के अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में अपना एक खास मुकाम बनाया है। जी टीवी के यथार्थवादी वीकेंड प्राइमटाइम शो ‘एक मां जो लाखों के लिए बनी अम्मा’ में लीड रोल निभा रहीं इस एक्ट्रेस ने टेलीविजन पर अपनी शुरुआत करने और अपने अन्य प्रोजेक्ट्स के बारे में चर्चा की…

यह रोल स्वीकार करने के लिए आपको किस बात ने प्रेरित किया?

मुझे इस शो का कॉन्सेप्ट बहुत पसंद आया क्योंकि यह टीवी पर दिखाए जा रहे दूसरे शोज से बिल्कुल अलग है। इसके अलावा यह एक सीमित सीरीज वाला वीकेंड शो है, इसलिए मुझे इसके लिए महीने में 26 दिन काम नहीं करना पड़ता है। इस किरदार में बहुत संभावनाएं है। मैं यह भी मानती हूं कि इस समय टेलीविजन में बदलाव का दौर है और निश्चित रूप से यह आने वाले कल का माध्यम है। इसकी पहुंच बहुत ज्यादा है। यदि हम अमेरिका के शोज का स्तर देखें तो पता चलता है कि टेलीविजन में बड़ी क्रांति आ सकती है और यह आप पर पूरी तरह छा जाने वाला है। यदि किसी को टीवी पर कुछ बड़ा और दिलचस्प काम करने का अवसर मिलता है तो यह निश्चित ही आपके समय का सदुपयोग है।

शबाना आजमी
शबाना आजमी

‘अम्मा’ में अपने किरदार के बारे में बताएं?

मैं इसमें जीनत (अम्मा) का रोल निभा रही हूं, जो वक्त से आगे चलने वाली महिला है। वह एक साधारण महिला है जो असाधारण परिस्थितियों का सामना करती है और समाज की सारी हदों को लांघते हुए ताकत हासिल करती है और उस मुकाम पर पहुंचती है जहां लोग उसे मसीहा की तरह देखते हैं। जीनत कुछ लोगों के लिए विलेन है लेकिन बहुतों के लिए वह नायिका है। वह रॉबिनहुड की तरह है जो अमीरों से लेकर गरीबों में बांटती है। यह किरदार कुछ हद तक सत्य घटनाओं से भी प्रेरित है लेकिन इसे ज्यादातर काल्पनिक ही रखा गया है। निर्माता इसे पूरी तरह वास्तविक दिखाने का प्रयास कर रहे हैं, और इसे टीवी पर कहानी के मापदंड के अनुरूप रखना चाहते हैं। इस शो में मुझे अपने पिता की कविता पढ़ने का भी अवसर मिला और यह जबर्दस्त एहसास है। पहली बार मैं अपने किरदार के लिए इतनी ज्वैलरी पहन रही हूं। मैं क्रिएटिव टीम का धन्यवाद देना चाहती हूं जिन्होंने मेरा लुक तैयार करने में गहराई से रिसर्च की है। मुझे लगता है कि हर कलाकार को हर माध्यम पर काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। मैंने फिल्मों और थिएटर में काम किया है लेकिन टीवी पर पहली बार काम कर रही हूं। यह मेरी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। फिल्मों की तुलना में टीवी पर आपको ज्यादा देर तक काम करना पड़ता है और आपके पास किसी भी दूसरी बात के लिए समय नहीं बचता है लेकिन मैं इसे अपना बेस्ट शॉट देना चाहती हूं।

इस रोल की तैयारी कैसे की?

चार दशकों के अनुभव के साथ मैं ज्यादातर किरदारों को पूरे अध्ययन के साथ निभाने के लिए तैयार रहती हूं। स्क्रिप्ट को किरदारों के इर्द गिर्द बुना जाना चाहिए ताकि हर दृश्य में वो प्रभाव साफ नजर आए। एक बार स्क्रिप्ट का अध्ययन करने और किरदार के लुक में आने के बाद मैं शॉट देने के लिए तैयार रहती हूं। अपने किरदार जीनत के लिए मैं जरूरत पड़ने पर क्रिएटिव टीम से भी अपने विचार बांटती हूं। शुरुआत में हमने जीनत की बोली को साधारण रखा था लेकिन बाद में मैंने महसूस किया कि जनता से इतने साल तक जुड़े रहने के बाद उसे बंबइया लहजे में हिन्दी बोलनी चाहिए।

क्या ‘अम्मा’ में आपका रोल फिल्म ‘गॉडमदर’ में आपके द्वारा निभाए गए किरदार जैसा नहीं है?

निश्चित रूप से लोग मेरे ‘गॉडमदर’ वाले किरदार से इस किरदार की तुलना करेंगे। यह एक पावरफुल फिल्म है और मुझे इसके लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। लेकिन इन दोनों किरदारों में बहुत अंतर है। गॉडमदर में मेरा रंभी का किरदार राजनीतिक प्रकृति का था और ‘अम्मा’ की जीनत लोगों की समस्याओं से जुड़ी है। वह खुद न्याय करती है और आम लोगों की समस्याएं सुलझाती है। जीनत मानती है कि यदि कानून-व्यवस्था प्रभावी होती तो उसे हस्तक्षेप करने की जरूरत ही नहीं होती।

शबाना आजमी
शबाना आजमी

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इस शो में जीनत (अम्मा) और उनकी बेटी रेहाना (युविका चौधरी) के बीच कैसे संबंध हैं?

दोनों का आपस में गहरा रिश्ता है। अम्मा पढ़ी लिखी नहीं हैं और अपनी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव से गुजर चुकी हैं। लेनिक वह यह नहीं चाहती कि उनकी बेटी भी उन्हीं स्थितियों का सामना करे या उनके कदमों पर चले। उनका एकमात्र सपना यह है कि वे उनकी बेटी जिंदगी में सफलता हासिल करके समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाए। जब भी रेहाना गलत होती है तो अम्मा जानती हैं कि उसे वापस सही रास्ते पर कैसे लाना है। हर मां की तरह अम्मा भी यही चाहती है उनकी बेटी उसे मिले अवसरों का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाए।

आज के समय में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री किस तरह का आकार ले रही है?

यह न सिर्फ मेरे लिए बल्कि भारतीय सिनेमा के लिए भी बहुत अच्छा समय है। आज बहुत सी फिल्में बनाई जा रही हैं – चाहे वह मेनस्ट्रीम हो, मिडल-ऑफ-द-रोड सिनेमा हो या आर्ट हाउस। ‘अम्मा’ करने से पहले मैंने शिकागो में एक अमेरिकी प्रोडक्शन के लिए भी शूटिंग की है। एक्टर्स के लिए दुनिया के दरवाजे खुल चुके हैं और उन्हें हर तरह के रोल्स मिल रहे हैं। सबसे बड़ा बदलाव तो यह है कि यदि आप 15 साल पहले की बात करें तो एक महिला का करियर 30 साल की उम्र में खत्म हो जाता था जिसके बाद वह भाभी या मां का रोल ही कर सकती थी लेकिन आज माहौल बदल गया है। महिलाओं को अलग-अलग तरह के रोल्स मिल रहे हैं। मैंने हाल ही में एक कॉमेडी फिल्म भी की है और अब मैं अम्मा से भी जुड़ गई हूं। इस समय मैं एक इंग्लिश फिल्म और एक अमेरिकी फिल्म भी कर रही हूं। मैंने अपर्णा सेन की फिल्मों के दो गाने भी रिकॉर्ड किए हैं।

एक एक्ट्रेस के रूप में आपने लगभग सभी तरह की भूमिकाएं की हैं। क्या ऐसा कोई किरदार है जो अब भी निभाना बाकी है?

मैं ऐतिहासिक किरदार के प्रति आकर्षित हूं। मुझे नहीं पता मैं वह रोल कैसे निभाऊंगी क्योंकि भारत में हमारे पास पर्याप्त संदर्भ उपलब्ध नहीं है। इस तरह की ज्यादातर भारतीय फिल्में अन्य फिल्मों पर आधारित होती हैं। मुझे लगता है कि इस तरह के किरदार के लिए अध्ययन करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। मुझे यह किरदार निभाना बेहद अच्छा लगेगा।

शबाना आजमी
शबाना आजमी

युवा टैलेंट के लिए कोई सलाह?

एक एक्टर को अपना किरदार सबसे शानदार ढंग से निभाने के लिए अपनी जिंदगी भरपूर ढंग से जीना चाहिए। यदि अश्मित और युविका कोई किरदार निभाते हैं तो उन किरदारों को दिलचस्प बनाने के लिए उन्हें इनमें अपने व्यक्तिगत अनुभव जोड़ने की जरूरत है। एक एक्टर के लिए उनकी जिंदगी ही उनका स्रोत होती है। मैं सभी नए कलाकारों से कहना चाहूंगी कि वे खूब पढ़ें, अपना इतिहास जानें और अपनी खुद की एक विचार प्रक्रिया विकसित करें।

देश की महिलाओं के लिए कोई संदेश?

मुझे लगता है कि देश में महिला सशक्तिकरण अब नजर आ रहा है। आज महिलाएं अपने मूल अधिकारों से वाकिफ हैं। ज्यादा से ज्यादा महिलाएं शिक्षित होकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। हालांकि हमें अब भी उस पुरुषवादी सोच को खत्म करना होगा, जहां लड़कियों से ज्यादा लड़कों को तरजीह दी जाती है। यह बड़ी दयनीय स्थिति है कि आज भी देश में कन्या भ्रूण हत्या की जाती है। आज वक्त बदल गया है और हमें पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से देखना चाहिए और उन्हें समान अवसर देना चाहिए। तब ही हम एक विकसित दुनिया की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं।

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